डाकिया डाक लाया…….

आज विश्व डाक दिवस है।।।

विश्व डाक दिवस के अवसर पर….

डाकिया डाक लाया…..✉️ 💌

“”मै कुशलपूर्वक हूं, भगवान से आपकी कुशलता की कामना करता हूँ ।””
“”थोड़ा लिखे को बहुत समझना “”
“”अत्र कुशलम तत्रास्तु””
“”आपके पत्र के इंतज़ार में””
ये होते थे पत्रो के कुछ आम शब्द …

कभी कबूतरों ने संदेश पहुंचाए थे। फिर यह काम डाकियों ने किया। जिस घर के लोग परदेशी हुआ करते थे, उन घरों के बड़े – बूढों, ब्याह कर आई दुल्हनों को डाकिए का इंतजार घर की चौखट पर बैठ कर बड़ी शिद्दत से होता था। तब कुशलता जानने का यही माध्यम होता था । अंतर्देशीय पत्रों, पोस्टकार्डों, लिफाफों से रिश्तेदारों के यादों की, उनके चिरंजीवी आर्शीवादों की वो कैसी भीनी भीनी खुशबू आती थी!!!!!

सीधा-साधा डाकिया जादू करे महान,
एक ही थैले में भरे आंसू और मुस्कान

एक डाकिए पर बहुत गाँवों की जिम्मेदारी होती थी, सभी उसका बेसब्री से इंतजार करते थे, जब कोई पत्र आता था तो त्यौहार जैसा माहौल हो जाता था। चिट्ठियों को लोग सहेज कर रखते थे। अपने प्रियजनों की चिट्ठियों को सहेज कर रखना और पुरानी यादों को फिर ताजा करना बहुत ही सरल था।
जिनके घर के सदस्य बाहर नौकरी करते थे उनके द्वारा भेजी गई धनराशि भी मनीआर्डर से आती थी।
अगर हम मुख्य रूप से पत्रों की बात करें और बारीकी से उसकी तह तक जाएं तो हममें से शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति मिले जिसने कभी किसी को पत्र ना लिखा हो, या ना लिखवाया हो या फिर पत्रों का बेसब्री से इंतजार ना किया हो।
पूर्व समय में हमने कई ऐसी फिल्में देखी हैं जिसमें सैनिक अपने परिवार वालों से बात करने के लिए पत्र लिखते थे और वहाँ से आने वाले पत्रों का जिस उत्सुकता से इंतजार करते थे उसकी कोई मिसाल ही नहीं दी जा सकती।
पत्रों की उपयोगिता हमेशा से ही बनी रही है । पत्र जो काम कर सकते हैं वह संसार का आधुनिक साधन नहीं कर सकता है । पूर्व समय में जिस प्रकार का संतोष हमारे मन में पत्र को पढ़कर मिलता था ।आजकल की पीढी के लिए ये सब एक दिवास्वप्न की तरह है ।
पत्रों की एक खास बात यह भी है कि यह हमारी यादों को सहेजकर रखते हैं यह हमारे भावनाओं को प्रकट करने का जरिया भी प्रदान करते हैं। इनमें हम अपने विचारों को पूर्ण रूप से लिख सकते हैं ।आज भी देश में कई ऐसे लोग है जिन्होंने अपने पुरखों की चिट्ठियों को संजोकर विरासत के रूप में रखा हैं। जब हम ख़त लिखते थे तो सब कुछ लिखते थे, शब्द होते थे , संवेदनाएं होती थी । खतों में लिखी पंक्तियों को हम पढ़ते ही नही थे बल्कि लिखने वाले के उस समय और परिस्थिति को भी जी लेते थे । ख़त में लिखी इबारत हमे लिखने का सहूर , श्रद्धा,सम्मान और आदर तक सिखाती थी। तब किसी के दुख – सुख की खबर खत में पढ़कर आँखे भर आती थी और अब मौत के मंजर की खबर पढ़कर हमारे उत्सव नही रुकते हैं। वो दिन जैसे भी थे बहुत सुकून भरे दिन थे।
आज वह संतोष फोन में एसएमएस पढ़कर कहां मिलता है।हम आज पल पल मोबाइल से कुशलता पूछते रहते हैं मतलब अब पल का भरोसा नहीं है इस मोबाइल ने इन पत्रों का अस्तित्व ही समाप्त कर दिया ।वर्तमान के तकनीकी युग के फैक्स, ईमेल और मोबाइल ने चिट्ठियों की गति को रोक रखा है । पर पत्रों की यह विशेषता है कि आप पत्रों को आसानी से सहेज कर रख सकते हैं लेकिन SMS संदेशों को आप जल्दी ही भूल जाते हैं क्या आप बता सकते हैं आप कितने संदेशों को सहेज कर रख सकते हैं मेरे ख्याल से तो बहुत कम? अगर वह संदेश आपके फोन में हैं फिर भी आप उसे कभी दोबारा नहीं देखते।पत्र जो काम कर सकते हैं, वह संचार का आधुनिकतम साधन नहीं कर सकता है। पत्र जैसा संतोष फोन या एसएमएस का संदेश कहाँ दे सकता है।
तकनीकी बदलावों की वजह से एक ही थैले में खुशी और गम के समाचार लेकर चलने वाले डाकिए अब भले कम दिखाई देते हों, लेकिन परंपरागत डाक सेवा की उपयोगिता आज भी बरकरार है।
भारतीय डाक विभाग का राष्ट्र के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास में बहुमूल्य योगदान है। पत्रों और चिट्ठियों के द्वारा सामाजिक संवाद एवं संपर्क का सबसे सस्ता माध्यम है। डाकखानों द्वारा संचालित बचत खाता योजनाओं ने ग्रामीण भारत में घरेलू बचत को प्रोत्साहन दिया, मनीआर्डर द्वारा रुपयों ,पैसों का सुलभ आदान प्रदान संभव हुआ, वही रक्षाबंधन जैसे त्योहारों में बहनों की राखियां, भाइयों तक पहुंचाकर डाक विभाग सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ाने में भी अपना योगदान देता है।
“विश्व डाक दिवस” की हार्दिक शुभकामनाएं।

मदद-हमारा अधिकार भी,कर्तव्य भी….


आप मदद करना मत छोड़िए। ये जानते हुए भी कि आप जिसकी मदद करते हैं, वो आख़िर में आपका दुश्मन बन जाता है। लेकिन इससे क्या होता है? मदद करना एक आदत होती है। ऐसी आदत जिसमें सुकून है।

बाल गंगाधर तिलक ने एक अनाथ बच्चे को अपने पास रख कर उसे पाला, पढ़ाया और नौकरी तक में उसकी मदद की थी। वो बच्चा जब बड़ा हो गया, तो इस कुंठा में जीता था कि जीवन में उसने जो कुछ भी पाया, किसी की मदद से पाया है। ऐसे में जब वो तिलक से अलग रहने चला गया तो जब कभी मौका मिलता तिलक की बुराई करता। तिलक तक उसकी बातें पहुंचती थीं, पर तिलक कभी प्रतिक्रिया नहीं जताते थे।
उसके जाने के बाद तिलक के साथ कोई और रहने लगा। वो बच्चा को जो तिलक की मदद से सेटल हो चुका था, जब उसे पता चला कि तिलक के साथ कोई और रह रहा है, तो एक दिन तिलक के पास आया और बात-बात में उसने उनसे कहा कि बाबा, आप जिस व्यक्ति को अपने साथ रखे हैं, वो बाहर आपकी निंदा करता है।
तिलक मुस्कुराए। फिर उन्होंने कहा, “मेरी निंदा? पर क्यों? मैंने तो उसकी कोई मदद ही नहीं की। जब मैंने उसकी कोई मदद ही नहीं की तो वो मेरी निंदा भला क्यों करेगा?”

कहानियां सच होती हैं। वो होती ही इसलिए हैं ताकि हम जीवन को समझ पाएं। समझ पाएं कि आपके साथ जो हो रहा है, वो सिर्फ आपके साथ नहीं हो रहा। असल सच्चाई यही है कि जब भी आप किसी की मदद करते हैं तो मदद लेने वाला खुद को छोटा समझ कर आपके किए को स्वीकार नहीं करना चाहता। बस यहीं से शुरू होता है द्वंद्व। ये द्वंद्व कृत्घनता को जन्म देता है। आदमी शुक्रगुज़ार होने की जगह नाशुक्रा हो जाता है। मूल रूप से सच इतना ही है कि एक आदमी की मदद कीजिए, एक दुश्मन तैयार कीजिए।

“मदद पाने वाला अहसान के तले नहीं दबना चाहता, इसलिए आपके विरुद्ध होकर वो अहसान को नकारता है। अगर थोड़ा रंग-रोगन लगा कर बात कहूं तो मदद के बदले की जाने वाली शिकायत मूल रूप से किए गए अहसान का नकारात्मक विरोध भर है। पर इसका बुरा नहीं मानना चाहिए या बुरा लगे भी तो तिलक की तरह उसे भूल कर फिर किसी की मदद करने की कोशिश शुरू कर देनी चाहिए।
इस सच को जानते हुए भी बाद में शिकायत मिलेगी, अपमान मिलेगा। पर जैसा कि मैंने कहा है कि मदद ही सुकून है, तो तमाम तकलीफों के बाद भी मदद के हाथ बढ़ाना मत छोड़िेगा।
उसका किया उसके साथ। आपका किया आपके साथ।

हम एक दूसरे की मदद करते रहते हैं। मदद लेते भी हैं और करते भी हैं। मदद पाना हमारा अधिकार है और मदद करना हमारा कर्तव्य।
ईश्वर ने एक मदद बैंक बनाई है। आपके द्वारा की गई किसी को मदद उस मदद बैंक में जमा हो जाती है। जब आपको मदद की जरूरत होती है तो आपको उसी मदद बैंक से मदद मिल जाती है। ठीक बैंक की तरह, वह नोट आपको नहीं मिलेंगे, जो आपने जमा किये।
मेरा तो यही अनुभव रहा है, जब मदद की जरूरत पड़ी, नए मददगार सामने आ गए। वह नहीं आये, जिनकी मैंने मदद की थी।

“जो तोकूँ कॉटा बुवै, ताहि बोय तू फूल।
तोकूँ फूल के फूल हैं, बाकूँ है तिरशूल ।।”

हमें अपना मूल स्वभाव किसी भी परिस्थिति में नहीं छोड़ना चाहिये । इसी सन्दर्भ में लगातार साधु को बार-बार काटने वाले बिच्छू और उसे बार-बार बचाने वाले साधु की कहानी अत्यन्त लोकप्रिय है, जिसमें साधु कहते हैं कि जब बिच्छू अपना स्वभाव नहीं छोड़ता तो मैं कैसे छोड़ दूँ ?

इसका कारण हर कोई ढूँढना चाहता है, जो आज आपने अपनी कहानी में स्पष्ट कर दिया ।

इस संसार में सबको मदद लेनी और देनी पड़ती है । दूसरे को तो हम नहीं बदल सकते , कम से कम स्वयम् को कृतघ्नता के भाव से बचा सकें इसके लिये, संकल्प बद्ध होना चाहिये ।

अगर आप यश प्राप्ति की चाह में किसी की मदद करते हैं तो सही मानिए आप सहज स्वभाववश उसकी मदद नहीं कर रहे हैं बल्कि एक डील कर रहे हैं कि मैं तेरी सहायता कर रहा हूँ बदले में तू मेरे लिए यश इकट्ठा कर ।
और भाई , डील में तो नफा होता है तो नुकसान भी होता है कभी कभी फिर रोना काहे का ।
याद रखिये , सहायता तभी सार्थक है जब वो सहज स्वभाववश की जाती है । यश की इच्छा से की गई सहायता एक व्यसन ही है ।

वृक्ष माता’ सालूमरदा थिमक्का,

वृक्ष माता’ सालूमरदा थिमक्का,
सालूमरदा थिमक्का कर्नाटक की रहने वाली पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता हैं । इन्होने अपने जीवन में कुल आठ हजार पेड़ लगाये हैं। इसमें चार सौ पेड़ बरगद के शामिल हैं। उन पेड़ों को लगाकर उनकी देखभाल करते हुए उन्हें बड़ा किया है और आज वो फल भी दे रहे है और प्राणवायु ओक्सिजन भी।
थिमक्का का जन्म कर्नाटक के तुमकुरु जिले के गुब्बी तालुक में हुआ था। उनका विवाह कर्नाटक के रामनगर जिले के मगदी तालुक के हुलिकल गांव के निवासी चिककैया से हुआ था। उसने कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली और पास के खदान में एक आकस्मिक मजदूर के रूप में काम किया। उसकी शादी चिक्कैया से हुई थी जो एक मजदूर था लेकिन वे दुर्भाग्यवश उनके कोई संतान नहीं हुई । इनकी शादी के कई साल बाद तक इनके घर कोई संतान नहीं हुई। इससे परेशान और मानसिक रूप से तंग आकर इन्होने आत्महत्या करने का विचार किया। ये उस समय उम्र के चौथे दशक में थी और बच्चे की उम्मीद अब पूरी तरह से छोड़ चुकी थीं लेकिन इन्होने कुछ और सोचा और ये फैसला कर लिया की अब वो पेड़ों को अपनी संतान बनाएगी और ऐसी हजारो संताने उत्पन्न करेगी। फिर क्या था शुरू कर दिए पेड़ लगाने…. । उनके लिए इन्होने अपना जीवन समर्पित कर रखा है। थीमक्का सालूमदरा को अब तक कई सारे सम्मान मिल चुके हैं। प्रकृति के प्रति उनका लगाव देखते हुए थिमक्का  का नाम ‘सालूमरादा’ रख दिया गया. लगातार एक ही पंक्ति में कई सारे पेड़ लगाने के बाद इन्हें ये सम्मान मिला। 65 साल का ये सफ़र आज भी जारी है। इनके पति की मौत साल 1991 में हो गई थी लेकिन उसके बाद इनके अंदर और अधिक हिम्मत आ गई और इन्होने पेड़ लगाने शुरू कर दिए। इसके बाद इन्होने एक बेटा गोद लिया जिसका नाम इन्होने उमेश रखा है।
थिमक्का की कहानी धैर्य और दृढ़ संकल्प की कहानी है.। साल्लुमरदा थिमक्का को अब तक कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। उनको दिए गए पुरस्कारों पद्म श्री, राष्ट्रीय नागरिक पुरस्कार
इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्षमित्र पुरस्कार के साथ कई पुरस्कार दिए गए है ।

पर्यावरण की पुनर्कल्पना करें, फिर से बनाएं और पुनर्स्थापित करें…….

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यह आपकी दुनिया है, यह मेरी दुनिया है, यह हमारी दुनिया है.!! प्रकृति ..सबसे अविश्वसनीय उपहार जो हम सभी साझा करते हैं। जन और जीवन की रक्षा के लिए जल, जंगल, ज़मीन का संरक्षण और संवर्धन आवश्यक होता है। इन सभी का रक्षण-संवर्धन सरकार के साथ हम पर भी है। पेड़ों की कमी के कारण वर्षा भी अनियंत्रित व अनियमित हो रही है और विश्व भर में आ रहीं प्राकृतिक आपदाओं का मूल कारण भी यही है। बात सिर्फ जंगल के पेड़ों पौधे की भी नही है असली बात है जंगल के अंदर रह रहे असंख्य जीवों, उनके घरों और उनकी सांस्कृतिक समृद्धता की भी है। ध्यान में रखने योग्य बात यह है कि एक पेड़ 230 लीटर ऑक्सिजन एक दिन में वायुमंडल में छोड़ता है जो सात मनुष्यों को जीवन देने का काम करती है। वन्य पशु-पक्षियों जिनका जीवन ही जंगल हैं और जो मनुष्य के जैसे ही प्रकृति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यदि इसी प्रकार प्रकृति का दोहन होता रहा तो भविष्य में हमारी भावी पीढ़ियां कंधों पर आक्सीजन सिलेंडर लेकर चलेंगी। आक्सीजन की महत्ता हमने मार्च 2021 से प्रत्यक्ष रूप से देखी व भुगती है। सही मायनों में यदि वास्तविकता से जीवन को समझा जाए तो प्रकृति ने हमें जिस प्रकार जीवन दिया है और जीवन के बढ़ने के लिए प्राकृतिक भोजन हवा जल और पर्यावरण में अनेकों सहायक तत्व दिए हैं उनका स्थान मानव निर्मित कोई भी चीज नहीं ले सकती और जो व्यक्ति इस सत्य को समझ लेता है उसे किसी प्रकार के कृत्रिम रसायनों की आवश्यकता नहीं होती। हमारे पर्यावरण को बहाल करने और सुरक्षित रखने में सहायता प्रदान करने वाले कुछ उपायों को अपनी रोजमर्रा जिंदगी में शामिल करें, जैसे 1.वृक्षारोपण करके 2.पानी पर्याप्त मात्रा में उपयोग करके, व्यर्थ होने से बचाकर 3.ऊर्जा संरक्षण करके 4.जैव प्रदूषित कचरे और गैर-जैव प्रदूषित कचरे को अलग-अलग रखकर 5.वस्तुओं की recycling & reuse करके 6.सार्वजनिक परिवहन और कारपूलिंग का उपयोग करके 7.प्लास्टिक के उपयोग को कम करके विशेषकर एक बार में उपयोग आने वाली प्लास्टिक की तिलांजलि देकर 8. अंतिम लेकिन महत्वपूर्ण, पर्यावरण का सम्मान करना , उपरोक्त सभी कार्यों को हम अपनी दैनिक दिनचर्या का अंग बनाएं।आपने महसूस किया होगा कि पहाड़ी स्थलों या समुद्र तटों पर जितना आनंद हमें पहले प्राप्त होता था उतना अब नहीं होता कारण वही प्रकृति का दोहन । अगर हम अपने पर्यावरण की रक्षा करने और आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे संरक्षित करने में सक्षम नहीं हो पाए, तो वे हमसे प्रश्न करेंगी कि आपने पर्यावरण के खिलाफ खिलवाड़ क्यों किया, जिसने पृथ्वी की पारिस्थितिकी को ही बदल दिया। तो आइए बात करना और प्रकृति से लेना बंद करके देना और करना शुरू करें। सरल कदम स्थायी परिवर्तन ला सकते हैं। पर्यावरण संरक्षण एक ऐसा कार्य है जो प्रगति पर है,चलिए आज से ही शुरू करते हैं और जो शुरुआत कर चुके हैं वे उन सभी कार्यों को करना जारी रखते हैं । हममें से हर एक को स्वयंसेवी संस्थाओं या समुदाय द्वारा पर्यावरण संरक्षण के लिए उठाए जा रहे कदमों के प्रति (साप्ताहिक या मासिक जैसा सम्भव हो ) कुछ समय निकालना चाहिए। ये संगठन /समुदाय आज-कल पर्यावरण में आने वाली समस्याओं के बारे में जागरूकता फैलाने में सहायता कर रहे हैं। पर्यावरण की इस मुहिम में हमें अपनी इच्छा से शामिल होना बहुत जरूरी है, क्योंकि एक सुरक्षित और स्वच्छ वातावरण के बिना हमारा अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।
जल है तो जीवन है,
जीवन है तो पर्यावरण है,
पर्यावरण से ये धरती है,
और इस धरती से हम सब है।


पर्यावरण संरक्षण के लिए चिंतित न हों ,सक्रिय हों ।डरपोक नहीं,साहसी बनें,

🌍🌿🌿🌿🌿🌿विश्व पर्यावरण की शुभकामनाएं🌿🌿🌿🌿🌿🌎

दृढ़ निश्चय की शक्ति…..

Motivational Story

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(एक खिलाड़ी की कहानी ,जो अपंग होने के बाद कैसे बना दुनिया का सबसे तेज धावक)
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ग्लेन कनिंघम (Glenn Cunningham)
और उनके बड़े भाई फ्लॉएड जब स्कूल पढ़ते थे, तब उन्हें एक जिम्मेदारी दी गई। उनकी जिम्मेदारी थी कि वे सुबह स्कूल पहुंचकर स्कूल के कमरे को केरोसिन स्टोव जलाकर गर्म करें। उस समय ग्लेन की आयु आठ वर्ष थी। एक दिन किसी ने गलती से केरोसिन के कंटेनर में पेट्रोल डाल कर रख दिया। स्टोव जलाते ही कमरे में धमाका हुआ और आग लग गई।

फ्लॉएड और ग्लेन भी आग में बुरी तरह झुलस गए। फ्लॉएड की मृत्यु हो गई और वह बच तो गए लेकिन ग्लेन के शरीर का निचला हिस्सा बुरी तरह झुलस गया। डॉक्टर की टीम का कहना था कि अगर वह जीवित रहे, तो वह जीवन भर अपंग रहेंगे ।उनके पैरों को जहर से बचाने के लिए डॉक्टर ने उन्हें काटने का सुझाव दिया।
ग्लेन ने डॉक्टर का सुझाव ठुकरा दिया और बोले, ‘मैं इन्हीं पैरों से चलना शुरू करूंगा।’ डॉक्टर ग्लेन की बात सुनकर अचंभित हुए।
बहादुर लड़का मरना नहीं चाहता था और न ही वह अपंग बनना चाहता था। डॉक्टर की बहुत कोशिश के बाद वह बच गया।

लेकिन दुर्भाग्य से उसकी कमर से नीचे, उसके पास कोई हिलने की क्षमता बिल्कुल नहीं थी। उनके पतले पैर सिर्फ बेजान थे। इसलिए उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

Glenn Cunningham ने चलने का संकल्प ठान लिया था। घर में, जब वह बिस्तर पर नहीं होते थे, तो वह व्हीलचेयर तक ही सीमित थे। उनको ऐसी जिंदगी बिल्कुल पसन्द नही थी इसलिए एक दिन, Glenn Cunningham ने कुर्सी से खुद को नीचे गिरा दिया और अपने आप को घास के ऊपर खींचने लगे अपने हाथो के सहारे थे,और अपने पैरों को शरीर के पीछे खींच लिया। वो बाड़ तक पहुँच गये, अपने आप को ऊपर उठाया और फिर अपने हिम्मत को दांव पर लगाते हुए, उसने अपने आप को बाड़ के साथ घसीटना शुरू कर दिया।

उनका चलने का संकल्प पूरी तरह ठान रखा था। उन्होंने हर दिन ऐसा किया, क्योकि उनको खुद पर विश्वास था कि वह बिना सहारे खुद चल पाएगे। देखते ही देखते अपने दृढ़ता और अपने दृढ़ संकल्प के साथ, उन्होंने खड़े होने की क्षमता विकसित कर ली, फिर रुक-रुक कर चलने की, फिर खुद से चलने की और फिर दौड़ने की। इसके लिये उन्हें काफी महीने लगे।इसके बाद ग्लेन अपने पैरों को काम लायक बनाने के लिए वह सब कुछ करते, जो वह कर सकते थे।

फिर वे स्कूल भी खुद चल के जाने लगे जबकि उनका स्कूल घर से काफी दूरी पर था, उनको बहुत महीनो के बाद चलने की इतनी खुशी थी कि कई बार तो दोड़ते हुए स्कूल जाया करते थे। उन्होंने अपने स्कूल की रनिंग टीम में भाग लिया, कई बार असफल हुए लेकिन रुके नही। बारह साल की आयु में ही ग्लेन दौड़ने लगे और अपने स्कूल में तेज दौड़नेवाले धावक बन गए।
आखिर बहुत कोशिश के बाद उनका सलेक्शन हो गया और लगातार आगे कोशिश करते रहे और कई स्कूल लेवल के गेम जीते।बाद में कॉलेज में भी उन्होंने ट्रैक टीम में भाग लिया और राज्य लेवल तक जीते।
तेरह साल की आयु में उन्होंने पहली एक मील की रेस जीती। कंसास रिले में उन्होंने सबसे कम समय के साथ एक मील की दूरी तय कर विश्व रेकॉर्ड बनाया। 1932 में लॉस एंजलिस ओलिंपिक में हुई पंद्रह सौ मीटर की दौड़ में वह चौथे रहे। फरवरी 1934 में, न्यूयॉर्क शहर के प्रसिद्ध मैडिसन स्क्वायर गार्डन में, जिस युवा व्यक्ति के जीवित रहने की उम्मीद नहीं थी, जो निश्चित रूप से कभी किसी ने नहीं सोचा होगा , जिसके कभी भी चलने की उम्मीद तक नहीं थी – यह दृढ़ संकल्पित युवा व्यक्ति, डॉ ग्लेन कनिंघम, दुनिया का सबसे तेज धावक बन गया।
1936 के बर्लिन ओलिंपिक में उन्होंने पंद्रह सौ मीटर की रेस में सिल्वर जीता। इसके बाद उन्होंने पंद्रह सौ मीटर और एक मील की रेस में सात बार इंडोर का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया। आगे चलकर ग्लेन कनिंघम यूथ रांच की स्थापना की, जहां उन्होंने करीब दस हजार गरीब बच्चों का पालन-पोषण किया। अपने दृढ़ संकल्प से ग्लेन ने यह साबित कर दिया कि यदि जीने की इच्छा और कुछ करने की चाहत हो तो हर बाधा सीढ़ी बन जाती है।
Conclusion
स्वयं में सकारात्मक सोच और विश्वास की शक्ति का एक प्रतीक, ग्लेन कनिंघम कई लोगों के लिए प्रेरणा बन गए और उनकी कहानी, एक शानदार गवाही है कि कैसे कोई भी वापस जिंदगी जी सकता है जब सभी बाधाएँ आपके खिलाफ हो, फिर भी जीता जा सकता हैं। सिर्फ मौत ही बेहतर विकल्प नही होता।
जन्म: 4 अगस्त 1909
मृत्यु: 10 मार्च 1988
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प्रेरक कहानी…निस्वार्थ भलाई का कार्य….


एक आदमी को नाव पेंट करने के लिए कहा गया।
वह अपने साथ पेंट और ब्रश ले आया और नाव को एक चमकदार लाल रंग देना शुरू कर दिया, जैसा कि मालिक ने उसे निर्देशित किया था।

पेंटिंग करते समय, पेंटर ने देखा कि नाव में एक छोटा सा छेद है, तो उसने चुपचाप उसकी मरम्मत कर दी।

जब नाव की पेंटिंग समाप्त हो गई, तो उसने अपने पैसे प्राप्त किए और चला दिया।

अगले दिन, नाव का मालिक पेंटर के पास आया और उसे एक अच्छी राशि का चेक भेंट किया, जोकि पेंटिंग के लिए भुगतान की तुलना में बहुत अधिक था।
पेंटर आश्चर्यचकित हो गया और बोला “नाव को पेन्ट करने के लिए आपने मुझे पहले ही भुगतान कर दिया है सर!”

“लेकिन यह पेंट करने के लिए नहीं है। यह नाव में छेद की मरम्मत के लिए है।”

“आह! लेकिन वह इतनी छोटी सेवा थी … उसके लिए मुझे इतनी भारी राशि का भुगतान करने की आवश्यकता नहीं है।”

“मेरे प्यारे दोस्त, आप नहीं समझे। चलिए आपको बताते हैं कि क्या हुआ।
जब मैंने आपको नाव को पेंट करने के लिए कहा, तो मैं छेद के बारे में बताना भूल गया।
जब नाव सूख गई, तो मेरे बच्चे नाव लेकर मछली पकड़ने की यात्रा पर चले गए।
उन्हें नहीं पता था कि एक छेद था। मैं उस समय घर पर नहीं था।
जब मैं वापस लौटा और देखा कि वे नाव ले गए हैं, तो मैं हताश था क्योंकि मुझे याद आया कि नाव में छेद था।

मेरी राहत और खुशी की कल्पना कीजिए जब मैंने उन्हें मछली पकड़ने से लौटते हुए देखा।
फिर, मैंने नाव की जांच की और पाया कि आपने छेद की मरम्मत की थी! अब आप देखें, आपने क्या किया? आपने मेरे बच्चों की जान बचाई!
तो मेरे दोस्त उस महान कार्य के लिए तो ये पैसे भी बहुत थोड़े हैं …
मेरी औकात नहीं कि उस कार्य के बदले तुम्हे ठीक ठाक पैसे दे पाऊं …।

इसलिए कोई फर्क नहीं पड़ता कि कब, कहाँ या कैसे। बस मदद जारी रखें, लोगों के आंसू पोंछें, उन्हें ध्यान से सुनें और ध्यान से उन सभी ‘लीक’ की मरम्मत करें ।
जीवन मे “भलाई का कार्य” जब मौका लगे हमेशा कर देना चाहिए, भले ही वो बहुत छोटा सा कार्य ही क्यों न हो …क्योंकि कभी कभी वो छोटा सा कार्य भी किसी के लिए बहुत अमूल्य हो सकता है…।

✨इसलिए अच्छा काम करना जारी रखें

मैं उन सभी का शुक्रिया अदा करना चाहती हूँ जिन्होंने हर तरह से… शुभकामनाओं, विचार, प्रेम, देखभाल और प्रार्थना के रूप में मेरी नाव की मरम्मत की …🌹🙏

हम अपने रास्ते में आई कई छेद वाली नावों की मरम्मत लोगों को यह एहसास कराए बिना कि आपने कितने लोगों की जान बचाई है, कर सकते हैं और सदैव प्रयत्नशील रहें कि हम भी किसी की नाव रिपेयरिंग करने के लिए हमेशा तत्पर रहें…।

खुद भी मुस्कुराइए और दूसरों को भी मुस्कुराने की एक वजह जरुर दीजिए….

COVID-19 महामारी के इस चुनौतीपूर्ण समय में, जब मानव जाति अत्यधिक भावनात्मक उथल-पुथल से गुजर रही है, व्यक्ति अतीत के सुखों से चिपका, भविष्य की चुनौतियों और कुशंकाओं से ग्रस्त है। सतत बीमारी के एकालाप से अवसादित और एकरसता व जड़ता से पीड़ित भी। ऐसे कठिन समय में तुरंत इस नकारात्मकता की धारा को तोड़ने की सामर्थ्य सिर्फ हास्य से ही संभव है।

हँसी सबसे शक्तिशाली भावना है जो दुनिया को शांतिपूर्ण और सकारात्मक तरीके से ठीक कर सकती है। यह हमारी सेहत को बेहतर बनाने के लिए एक अच्छा व्यायाम भी है। हम भले ही किसी संकट से गुज़र रहे हों, लेकिन हमेशा खुश रहने के हमारे कारण हो सकते हैं। अच्छी हँसी का एक विस्फोट जादू की तरह काम करता है और किसी भी तनावपूर्ण स्थिति को एक अनुकूल में बदल देता है । हंसी दुनियाभर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर सकती है। जब मनुष्य हंसता है तो वह कुछ पलों के लिए सबसे अलग हो जाता है। उसके विचारों की श्रृंखला टूट जाती है। एकाग्रता आती है। मन-मस्तिष्क खाली व हल्के होने लगते हैं। हंसने से ना केवल एक व्यक्ति बल्कि उसके आस-पास के लोग, साथी-संगी भी हंसी के प्रभाव से वंचित नहीं रह पाते। एक हंसता हुआ चेहरा सभी को अच्छा लगता है। आप दुखी हों और अचानक से आपको कोई हंसता हुआ व्यक्ति टकरा जाए तो आप भी उसे देख खिलखिला उठते हैं। हंसने से सकरात्मक उर्जा का जहां संचार होता है ।

यह अटल सत्य है कि हम लाख चाहें फिर भी इस बात को नहीं जान सकते कि, हमारे आने वाले कल में क्या होगा ?? कल की बात तो बहुत दूर है, हम यह भी नहीं जान सकते कि हमारे आने वाले अगले पल में क्या होगा ??तो फिर किस बात की चिंता ? किस बात की फिक्र और किस बात की टेंशन ???
आज के समय में हमारे जीवन में जो सबसे जरूरी बात है……वो यह कि हम अपने आज में जियें, अपने हर पल को अपने जीवन का सबसे हसीन और खुबसूरत पल बनाएं । अपने परिवार के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताएं, अपने आप को स्वस्थ बनाएं और जो कुछ भी पाना चाहते हैं, उसी दिशा में पूरी निडरता और ईमानदारी से अपना पूरा प्रयास करें । इस तरह से हम न केवल वो पा लेंगे, जो हम पाना चाहते हैं, बल्कि हम एक स्वस्थ, सुखी और समृद्ध जीवन के मालिक भी बन जाएंगे ।
तो आएं निरायास हास्य का ही शुभ और स्वास्थकर संक्रमण फैलाएं और इस संकटकाल में एक स्वस्थ और खुशहाल समाज के लिए हंसते-हंसते अपना योगदान दें।
इस हास्य दिवस,
आइए एक हंसी दिल से साझा करें, लेकिन सुरक्षित दूरी 😃—–😃—- से

हारना मना है…🪴🪴


आज जब हर जगह ‘उदासी’ स्पष्ट तौर पर महसूस की जा रही है, तब भी हम ‘उम्मीद’ नहीं छोड़ सकते।
हम आज उन सभी संसाधनों को खोज नहीं पाएं हैं जिनकी हमें आवश्यकता है फिर भी, हम उनकी तलाश करना, या उन्हें बनाना बंद नहीं करेंगे। हम सभी को नहीं बचा पाएंगे, फिर भी हमें प्रयास किसी के लिए भी बंद नहीं करना चाहिए। हम भयभीत हैं, फिर भी आशान्वित हैं; क्योंकि जब तक हम हार नहीं मानते … हम असफल नहीं हो सकते।

विलियम अर्नस्ट हेनली की खूबसूरत कविता Invictus का खूबसूरत हिंदी अनुवाद को प्रस्तुत किया है प्रसिद्ध कहानीकार विनीत पंछी जी ने….जो आज के संदर्भ में बिल्कुल सटीक बैठती है।

आ अब लौट चलें..📘📒📙

यूनेस्कों ने 23 अप्रैल 1995 को इस दिवस को मनाने की शुरुआत की थी. पेरिस में यूनेस्को की एक आमसभा में फैसला लिया गया था कि दुनिया भर के लेखकों का सम्मान और श्रद्धांजली देने व किताबों के प्रति रुचि जागृत करने के लिए हर साल विश्व पुस्तक दिवस मनाया जाएगा ।
23 अप्रैल को वर्ल्ड बुक डे के रूप में मनाने की एक वजह ये भी है कि इस दिन कई प्रमुख लेखक या पैदा हुए थे या उनकी मृत्यु हो गई थी. विलियम शेक्सपियर, मिगुएल डे सर्वेंट्स और जोसेप प्लाया का 23 अप्रैल को निधन हुआ था जबकि मैनुएल मेजिया वल्लेजो और मौरिस ड्रून 23 अप्रैल के दिन पैदा हुए थे. 23 अप्रैल 1564 को एक ऐसे लेखक दुनिया से अलविदा हुए, जिनकी कृतियों का विश्व की लगभग सभी भाषाओं में अनुवाद किया गया है। जिसने अपने जीवन काल में करीब 35 नाटक और 200 से अधिक कविताएं लिखीं। यह लेखक थे शेक्सपीयर। साहित्य जगत में शेक्सपीयर का जो स्थान है उसे देखते हुए ही यूनेस्को ने 1945 से विश्व पुस्तक दिवस का आयोजन शुरू किया।भारत सरकार ने 2001 से इस दिन को मनाने की घोषणा की।

पिछले एक वर्ष से हम सब कोरोनाकाल होने के कारण ज्यादातर समय घर पर ही बिता रहे है और बाहर जाना सीमित करना पड़ा है। घर में हमारे पास हमारे सच्चे मित्र के रूप में किताबें जरूर मौजूद हैं जरूरत है तो बस उन्हे बुक शेल्फ़ के अंधेरे से निकाल कर, उनके साथ अपना समय व्यतीत करने की । यह समय पढ़ने के महत्व का जश्न मनाने का समय है।लॉकडाउन के इस अकेलेपन के समय में किताबें मनोरंजन के साथ जानकारी का अहम जरिया भी हैं तो आईये किताबों की ओर लौटें क्योंकि अभी पिछले कुछ सालों से किताबों पर संकट का समय चल रहा है। इसका कारण है पिछले दशकों में किताबों के विकल्प के तौर पर मोबाइल और इंटरनेट की तेजी से फ़ैल रही दृश्यात्मकता ने अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया है। यह बच्चों को ही नहीं, बड़ों को भी समाज से काटकर अकेला करता जा रहा है। इसके कारण हम में से कई लोग आसपास की दुनिया में दिलचस्पी खोने लगे हैं। बहुत सारे मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि हमारी आने वाली पीढ़ियों को अवसाद से बचाने के लिए उन्हें फिर किताबों की दुनिया में लौटने की जरुरत है। बच्चों की सोच और कल्पना-शक्ति को बढाने में बाल साहित्य बड़ी भूमिका होती है। यह हम सबका दायित्व है कि बच्चों को मोबाइल और टेलीविज़न के ज्यादा इस्तेमाल से बचाकर उन्हें अच्छी किताबों और शिक्षाप्रद कॉमिक्स की ओर मोड़ें। हम खुद उदाहरण प्रस्तुत करेंगे तो बच्चे निश्चित रूप से हमारा अनुकरण करेंगे।
सुना है किताबें आपको जीवन का दर्शन करवाने के साथ साथ आपको अपने आप से भी मिलवाती है, जैसे ही हम उन्हें अपनी बुक शेल्फ़ के अंधरे से निकालेंगे,वैसे ही वे हमारे जीवन के बहुत से अंधकार भरे रास्तों को उजालों से भर देंगी…..। वो कहते हैं ना कि हर एक दोस्त जरूरी होता है… किताबें बहुत अच्छी दोस्त होती हैं..हमारे अकेलेपन की साथी..हमारे एकांत की हमसफर..ये बेहद सुकून देती हैं… ….,!
तो आ अब लौट चलें…..किताबों की दुनिया की ओर📚📙

जब हम घिरे होते हैं अनिश्चितताओं से,
किताबें रास्ता बन जाती हैं
जब हम घिरे होते हैं डर से,
किताबें उम्मीद बन जाती हैं
जब हम होते हैं एकाकी
किताबें यार बन जाती हैं…!!

विश्व पुस्तक दिवस पर

बची रहे पृथ्वी…🌱🌱🌱

स्कूल में सिखाई जाने वाली एक बात मुझे आज याद आ रही है जब हमें सिखाया जाता था कि पृथ्वी की ऐसी ही स्थिति रही तो देखना एक दिन पानी भी खरीदना पड़ेगा तब हम सबने इस बात को मज़ाक में उड़ा दिया था लेकिन आज सचमुच बंद बोतल में पानी बिक रहा है और तो और आज तो उससे भी भयावह स्थिति से हम गुजर रहे हैं । जो हवा प्रकृति हमे निःशुल्क देती है वो हवा (आक्सीजन) भी अब बिकनी शुरु हो गई है लोग आक्सीजन सिलेंडर के लिए भाग रहे हैं …!! ये सब बातें इंगित करती हैं कि हम हर बीतते दिन के साथ जलवायु संकट से जूझ रहे हैं। ये दिवस हमें ये चेतावनी दे रहा है कि आज जिन समस्याओं से मानव जीवन गुजर रहा है वो भविष्य में और भयावह होंगी अगर हम धरा के प्रति सचेत न रहे तो सब कुछ धरा का धरा रह जायेगा |
आज एक कोरोना नामक बीमारी ने संसार की सम्पूर्ण मानव प्रजाति को हिला के रख दिया है ,सभी जगह ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए मारामारी हो रही है । इसी तरह कल अनेकों बीमारी जन्म लेंगी इसलिये अभी भी वक़्त है हम आने वाली पीढ़ियों के लिये सुखद अतीत बनें…..! पेड़ों की रक्षा करें, अपनी प्रवृत्ति प्रकृति के अनुरूप रखें, शाकाहारी बनें, जीवों पर दया करें….! असहायों की मदद करें ताकि वो जीने के काबिल बन सकें ।
विश्व पृथ्वी दिवस 2021 की थीम है – ‘Restore our Earth’ । इसका उद्देश्य है प्राकृतिक, हरित प्रौद्योगिकी और नवाचार के माध्यम से वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र को बहाल करना । हम सभी को हमारे ग्रह के लिए सकारात्मक कार्रवाई के लिए इस अभियान में अपनी भागीदारी करनी चाहिए। आइए, इस खास अवसर पर हम सब मिलकर भावी पीढ़ियों के लिए वातावरण को प्रदूषण मुक्त करने, अपने आस-पास सफाई रखने एवं धरती को हरी-भरी व सुंदर बनाने का संकल्प लें।
पृथ्वी को बचाने के लिए एक पेड़ जरूर लगाएं और कोशिश करें कि पीपल, बरगद, नीम,तुलसी और बांस के पेड लगाएं क्योंकि पीपल कार्बन डाई ऑक्साइड का 100% एबजार्बर है ,बरगद 80% तथा नीम 75% है । ऑक्सीजन बनाने का काम पेड़ की पत्तियां करती हैं जो एक घंटे में पांच मिलीलीटर ऑक्सीजन बनाती हैं। इसलिए जिस पेड़ में ज्यादा पत्तियां होती हैं वो पेड़ सबसे ज्यादा ऑक्सीजन बनाता है। पीपल का पेड़ अन्य पेड़ों के मुकाबले ज्यादा ऑक्सीजन देता है यह दिन में 22 घंटे से भी ज्यादा समय तक ऑक्सीजन देता है। हवा को फ्रेश करने में बांस का पेड़ काम आता है। अन्य पेड़ों के मुकाबले 30 फीसदी अधिक ऑक्सीजन छोड़ता है। नीम, बरगद, तुलसी के पेड़ भी अधिक मात्रा में ऑक्सीजन देते हैं। नीम, बरगद, तुलसी के पेड़ एक दिन में 20 घंटों से ज्यादा समय तक ऑक्सीजन का निर्माण करते हैं। बड, शीशम, पीपल, आम और सफेदा के वृक्ष भूमि जल संचयन के लिए लगाने चाहिए। बड़, शीशम, पीपल व आम इन पेड़ों की जड़ें भूमि में सीधी नीचे तक फैली होती है, जबकि सफेदे की जड़ भूमि की ऊपरी सतह तक होती है। इसलिए सफेदा की जड़ से पानी छन कर नीचे तक जाता है तथा बड़, शीशम, पीपल और आम की जड़ भूजल को बरकरार रखने के लिए सहायक होती है। यूकेलिप्टस और अन्य सजावटी वृक्ष लगाने से ये काफी मात्रा में जल भूमि से सोख लेते हैं, इन्हें कम लगाया जाना चाहिए । वातावरण को स्वच्छ और वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाने के लिए तुलसी और पीस लिली का पौधा घर में लगाना चाहिए।
जब हम इन जीवनदायिनी पेडों को ज्यादा से ज्यादा लगाएंगे तभी हम एक स्थायी भविष्य के लिए अग्रसर हो पाएंगे ।

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विश्व पृथ्वी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं….!!🌳🌲🌱🌴🌳🌲