चौंसठ योगिनी मंदिर, भेड़ाघाट

कल दोपहर बाद हमारा भेड़ाघाट देखने का कार्यक्रम बना । वहीं भेड़ाघाट व धुआंधार जलप्रपात के नजदीक एक ऊंची पहाड़ी के शिखर पर स्थापित “चौंसठ योगिनी मंदिर” दिखा और उसे देखने की इच्छा मन में जागी तो सीढियां चढ़कर पसीने से लथपथ जब ऊपर पहुंचे तो वहां शिखर से हरी भरी भूमि और बलखाती नर्मदा नदी के विहंगम दृश्य ने मन मोह लिया ।
चौंसठ योगिनी मंदिर” जबलपुर की ऐतिहासिक संपन्नता में एक और अध्याय जोड़ता है। प्रसिद्ध संगमरमर चट्टान के पास स्थित “चौंसठ योगिनी मंदिर” का निर्माण सन् 1000 के आसपास “कलीचुरी वंश” ने करवाया था। शिल्पकला तभी विकसित हो गई थी, जब मानव सभ्यता का विकास हुआ लेकिन कलचुरि काल की पाषाणकला दूसरी शिल्पकला से एकदम हटकर है। इस काल की मूर्तियां महज एक कलाकृति नहीं बल्कि मूर्तियों के पार्श्व में किसी घटना, गूढ़ रहस्य अथवा ब्रह्मांड के किसी दर्शन के संकेत मिलते हैं।
मंदिर में प्रवेश के लिए केवल एक तंग द्वार बनाया गया है। चारदीवारी के अंदर खुला प्रांगण है, जिसके बीचों-बीच एक चबूतरा बनाया गया है। चारदीवारी के साथ दक्षिणी भाग में मंदिर का निर्माण किया गया है।

मंदिर के चारों तरफ़ करीब ऊंची गोलाई में चारदीवारी बनाई गई है, जो पत्थरों की बनी है । गोलाकार आकृति में बने इस मन्दिर की बाहरी दीवालों पर चौसठ योगिनियों की अद्भुत प्रतिमाएँ बनी हुई है । यह देखकर दुख हुआ कि सभी प्रतिमाएँ खण्डित है । कहानी वही मुस्लिम आक्रमण कारियों द्वारा इन प्रतिमाओं को खंडित किये जाने की ।
ये सभी चौंसठ योगिनी बहनें थीं तथा तपस्विनियां थीं, जिन्हें महाराक्षसों ने मौत के घाट उतारा था। राक्षसों का संहार करने के लिए यहां स्वयं दुर्गा को आना पड़ा था। इसलिए यहां पर सर्वप्रथम मां दुर्गा की प्रतिमा कलचुरी के शासकों द्वारा स्थापित कर दुर्गा मंदिर बनाया गया था तथा उन सभी चौंसठ योगिनियों की मूर्तियों का निर्माण भी मंदिर प्रांगण की चारदीवारी पर किया गया। लोगों का मानना है कि यह स्थली महर्षि भृगु की जन्मस्थली है, जहां उनके प्रताप से प्रभावित होकर तत्कालीन कलचुरी साम्राज्य के शासकों ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था । कालांतर में मां दुर्गा की मूर्ति की जगह भगवान शिव व मां पार्वती की मूर्ति स्थापित की गई है, ऐसा जानकारी एकत्र करने में पाया ।
मंदिर के अंदर भगवान शिव व मां पार्वती की नंदी बैल पर वैवाहिक वेशभूषा में बैठे हुए पत्थर की मनमोहक प्रतिमा स्थापित है।
इसके आगे एक बड़ा-सा बरामदा है, जो खुला है। बरामदे के सामने चबूतरे पर शिवलिंग की स्थापना की गई है । यहां नियमित पूजा होती है । यह मूल प्रतिमा खण्डित नही है । मन्दिर के पुजारी के अनुसार यह विश्व में इस तरह की एकमात्र ऐसी प्रतिमा है । मैंने भी कभी इस तरह नन्दी पर विराजमान शिव पार्वती की प्रतिमा देखी या सुनी नहीं है । सामान्यतः शिव मंदिर में शिवलिंग ही प्रतिष्ठित होते है । प्रतिमा भी बड़ी आकर्षक है । मेरी तो नज़र ही नहीं हट रही थी उस प्रतिमा से । शिव-पार्वती के बगल में ही कार्तिकेय और गणेश की प्रतिमाएं विराजमान हैं, मतलब पूरा शिव परिवार ही विराजमान है यहाँ।

मंदिर को बाहर से जब आप देखते हैं तब मालूम होता है कि यह मंदिर एक विशाल परिसर में फैला हुआ है और इसके हर एक कोने से भव्यता झलकती है। फोटोग्राफी के लिए भी बहुत सुंदर जगह है । मैं इतनी बार भेड़ाघाट गई हूं पर कभी भी यह मंदिर नहीं क्यो नही देखा इसका अफसोस हुआ।
शाम हो चली थी हमे लौटना पड़ा पर मन नहीं भरा सो जल्द ही अगली बार आने का निर्णय भी ले लिया । अगर आप जबलपुर आ रहे हैं तो इस मंदिर में ज़रूर जाएं।

रानी दुर्गावती महल, मदन महल जबलपुर

रानी दुर्गावती जी के जन्मदिन पर विशेष…. 05 अक्टूबर

रानी दुर्गावती जी के बारे में कम जानने वालों में मैं भी शुमार हूँ । बचपन में जबलपुर शहर में रहते हुए भी मैं रानी दुर्गावती जी के विषय में ज्यादा नहीं जान पाई थी बस इतना ही पता था कि शहर में मदन महल क्षेत्र में रानी दुर्गावती का किला है ।
मदन महल का किला मैंने पहली बार 1976 में देखा था उसके बाद मुझे ये किला दोबारा देखने का मौका 2015 में कार्यालयीन यात्रा के दौरान मिला लेकिन इस वर्ष पदोन्नति पर जबलपुर पोस्टिंग होने के बाद अगस्त में मुझे एक बार फिर इसे देखने का अवसर प्राप्त हुआ ।
मदन महल किला उन शासकों के अस्तित्व का साक्षी है जिन्होंने यहां 11वीं शताब्दी में काफी समय के लिए शासन किया था।
राजा मदन सिंह द्वारा बनवाया गया यह किला एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। विश्व के सबसे छोटे किले दर्जे का हकदार है मदनमहल का किला….। किला इतनी उंचाई पर है .जिससे पूरा जबलपुर दिखाई पड़ता है…!! मदन शाह द्वारा निर्मित मदन महल नष्ट हो चुका है। वर्तमान में जो स्वरूप मौजूद है वह महल के पास बनाया गया वॉच टावर है, जो ऊंचाई पर होने के चलते देखरेख के काम आता था। मदन महल में कमरे हैं उंची छत है, इस मदन महल किले के पिछले कमरे में सुरंग भी है,जिसके बारे में कुछ कहा नही जा सकता कि यह सुरंग कहाँ जाकर खुलती है.. इस किले के चारों तरफ हरियाली और ग्रेनाइट की चट्टानें हैं। कई गुफाएं भी हैं, जो आकर्षण का केन्द्र हैं। यहां सुबह या फिर शाम को सूर्यास्त के समय का नजारा अद्भुत रहता है।

इस किले की जानकारी एकत्र करने पर पाया कि रानी दुर्गावती जन्म 5 अक्टूबर 1524 में उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले में कालिंजर के राजा कीर्तिसिंह चंदेल के यहाँ हुआ था। वे अपने पिता की इकलौती संतान थीं। दुर्गाष्टमी के दिन जन्म होने के कारण उनका नाम दुर्गावती रखा गया। नाम के अनुरूप ही तेज, साहस, शौर्य और सुन्दरता के कारण इनकी प्रसिद्धि सब ओर फैल गयी।

दुर्गावती चंदेल वंश की थीं और कहा जाता है कि इनके वंशजों ने ही खजुराहो मंदिरों का निर्माण करवाया था और महमूद गज़नी के आगमन को भारत में रोका था। लेकिन 16वीं शताब्दी आते-आते चंदेल वंश की ताकत बिखरने लगी थी।

दुर्गावती बचपन से ही अस्त्र-शस्त्र विद्या में रूचि रखती थीं। उन्होंने अपने पिता के यहाँ घुड़सवारी, तीरंदाजी, तलवारबाजी जैसे युद्धकलायों में महारत हासिल की। अकबरनामा में अबुल फज़ल ने उनके बारे में लिखा है, “वह बन्दुक और तीर से निशाना लगाने में बहुत उम्दा थीं। और लगातार शिकार पर जाया करती थीं।”

1542 में, 18 साल की उम्र में दुर्गावती की शादी गोंड राजवंश के राजा संग्राम शाह के सबसे बड़े बेटे दलपत शाह के साथ हुई। मध्य प्रदेश के गोंडवाना क्षेत्र में रहने वाले गोंड वंशज 4 राज्यों पर राज करते थे- गढ़-मंडला, देवगढ़, चंदा और खेरला। दुर्गावती के पति दलपत शाह का अधिकार गढ़-मंडला पर था।

दुर्गावती का दलपत शाह के साथ विवाह बेशक एक राजनैतिक विकल्प था। क्योंकि यह शायद पहली बार था जब एक राजपूत राजकुमारी की शादी गोंड वंश में हुई थी। गोंड लोगों की मदद से चंदेल वंश उस समय शेर शाह सूरी से अपने राज्य की रक्षा करने में सक्षम रहा।
1545 में रानी दुर्गावती ने एक बेटे को जन्म दिया, जिसका नाम वीर नारायण रखा गया। लेकिन 1550 में दलपत शाह का निधन हो गया। दलपत शाह की मृत्यु पर दुर्गावती का बेटा नारायण सिर्फ 5 साल का था। ऐसे में सवाल था कि राज्य का क्या होगा?

लेकिन यही वह समय था जब दुर्गावती न केवल एक रानी बल्कि एक बेहतरीन शासक के रूप में उभरीं। उन्होंने अपने बेटे को सिंहासन पर बिठाया और खुद गोंडवाना की बागडोर अपने हाथ में ले ली। उन्होंने अपने शासन के दौरान अनेक मठ, कुएं, बावड़ी तथा धर्मशालाएं बनवाईं। वर्तमान जबलपुर उनके राज्य का केन्द्र था। उन्होंने अपनी दासी के नाम पर चेरीताल, अपने नाम पर रानीताल तथा अपने विश्वस्त दीवान आधारसिंह के नाम पर आधारताल बनवाया।

रानी का प्रजा के प्रति व्यवहार इतना अच्छा था की प्रजा रानी के लिए कुछ भी कर सकती थी ,रानी का मदन महल में एक किला था जिसमें रानी अपने परिवार के साथ रहने आया करती थी |
रानी के राज में प्रजा इतनी खुश थी की स्वेच्छा से कर के रूप में रानी को हाथी, घोडे, सोने के सिक्के दिये जाते थे ,जब इस बात का पता उस वक़्त के बादशाह अकबर को पता चला तो उन्होंने रानी दुर्गावती को एक सोने का पिंजरा भेजा जिसका अर्थ था कि स्त्रियों को पिंजरे में कैद रहना चाहिए प्रजा संभालना उनका काम नहीं ,तब रानी ने इसके जवाब में अकबर को रुई धुनने का समान भेजा था जिससे अकबर रानी से बुरी तरह से नाराज़ हो गया था ।
अकबर ने रानी पर आक्रमण करने के लिए तीन बार बाज़ बहादुर को भेजा पर रानी तीनों बार विजयी रहीं..रानी का शौर्य और पराक्रम किसी से कम ना था ये रानी ने दिखा दिया था ।
जब कुछ समय पश्चात पुनः रानी पर आक्रमण किया तब आसफ खान ने रानी के पुत्र वीरनारायण की हत्या कर दी वीरनारायण की मृत्यु से रानी विचलित हो गयी और मुगलों द्वारा घेर ली गयी और रानी पर आक्रमण होने लगे तथा रानी घायल हो गयी ,तब रानी ने गुलाम बनना स्वीकार नहीं किया ,रानी नहीं चाहती थी कि कोई उसकी देह को हाथ भी लगाये ..तब रानी ने अपनी कटार निकाल कर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली । रानी दुर्गावाती जब तक जी सम्मान से जी . । 39 वर्ष की आयु में रानी ने 24 जून 1564 को अपने प्राण त्याग दिए थे ।
जबलपुर के पास जहां यह ऐतिहासिक युद्ध हुआ था, उस स्थान का नाम बरेला है, जो मंडला रोड पर स्थित है, वही रानी की समाधि बनी है, जहां गोंड जनजाति के लोग जाकर अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। जबलपुर में स्थित रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय भी इन्हीं रानी के नाम पर बना हुआ है।

इसके अलावा भारत सरकार ने साल 1988 में रानी दुर्गावती के सम्मान में एक पोस्टल स्टैम्प भी जारी किया था ।

रानी दुर्गावती की जीवन गाथा पढ़ने पर मैंने यह पाया कि रानी दुर्गावती और रानी लक्ष्मीबाई के शौर्य में कोई फर्क नहीं है दोनों का इतिहास गौरवशाली है..फर्क सिर्फ इतना है कि रानी दुर्गावती की लडाई मुगल साम्राज्य से थी और लक्ष्मीबाई जी की लडाई अँग्रेज़ों से थी..।रानी दुर्गावती के समय के इतिहासकार रानी दुर्गावती के विषय में इतिहासकारों ने अधिक वर्णन नहीं किया क्योंकि उस वक्त के इतिहास्कार अकबर के विरुद्ध नहीं लिख सकते थे । रानी दुर्गावती ,रानी लक्ष्मी बाई, रानी अवन्ती बाई लोधी इन तीनो रानियों के शौर्य में एक बात की समानता थी कि इन तीनों ने अपने स्वभिमान को सर्वोपरी रखा अपने आत्मसम्मान की रक्षा करते हुए तीनो ने गुलाम बनना स्वीकार ना करते हुए कटार स्वयं को मारकर अपने प्राण त्याग दिये ..।
रानी दुर्गावती उस वक्त के शक्तिशाली बादशाह से अपने स्वाभिमान और आत्मसम्मान के लिये लडी..यह लडाईयाँ बादशाह अकबर के अहम की थी क्योंकि रानी ने अकबर को यह बता दिया था कि वो मुगल साम्राज्य से लडने की हिम्मत रखती है । अकबर का रानी के हाथों इस तरह अपमानित होना युद्ध का कारण बना.।
इसे इत्तेफाक ही कह सकते हैं कि तीनों रानी की शौर्यगाथा एक सी है..।
रानी के शौर्य और पराक्रम के बारे में सुनकर मैं सोच में डूब गई कि उस वक्त की महिला इतनी सशक्त थी..और हम आज नारी सशक्तिकरण के लिये आवाज़ उठा रहे हैं जबकि नारी शताब्दियो से सशक्त ही रही है, जरुरत है तो बस नारी को अपनी शक्ति पहचानने की..!!
राज्य व धर्म की रक्षा के लिए रणभूमि को चुनकर अपने अदम्य साहस व शौर्य का परिचय देने वाली अमर वीरांगना रानी दुर्गावती जी की जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन 💐🙏।
अभी हाल में ही मदन महल को देखने जाने के दौरान लिए गए कुछ छायाचित्र …

शिक्षक…..


सुन्दर सुर सजाने को साज बनाता हूँ,
नौसिखिये परिंदों को बाज बनाता हूँ!
चुपचाप सुनता हूँ शिकायतें सबकी,
तब दुनिया बदलने की आवाज बनाता हूँ!
समंदर तो परखता है हौंसले कश्तियों के,
मैं डूबती कश्तियों को जहाज बनाता हूँ !
बनाए चाहे चांद पे कोई बुर्ज ए खलीफा,
अरे मैं तो कच्ची ईंटों से ही ताज बनाता हूँ!

हम सभी को शिक्षक कई रूप में मिलते हैं, कई प्रारूप में मिलते हैं। उनके पढ़ाने से हम शून्य से मूल्य में परिवर्तित होते हैं। वे अपनी अमुल्य शिक्षा हममें गढ़ते हैं…यूँ ही नहीं हम उन्हें पूज्य कहते हैं। माता-पिता प्रारम्भिक शिक्षक होते हैं तो विद्यालय आते ही प्राथमिक शिक्षक मिलते हैं। यद्यपि, हर शिक्षक का पढ़ाने का तरीक़ा अलग अलग होता है परंतु उनके शिक्षण को हम जीवन के अलग-अलग अनुभवों में घुला हुआ पाते हैं….भिन्न परिस्थितियों के प्रश्न में खड़ा पाते हैं और हर दशा में उत्तर पाने की दिशा में प्रेरित करते पाते हैं । एक शिक्षक का महत्व जन्मदाता के सामान होता है क्यूंकि वह व्यक्ति को जीवन जीने का ज्ञान प्रदान करता है । जैसे कुछ ने हमें साहित्य का वर्ण सिखाया तो कुछ ने हमें विज्ञान की दुनिया की सैर कराई। कुछ ने गणित का मान बताया, कुछ ने हमें भूगोल, इतिहास से सजाया । स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक के अलावा ऐसे कई लोग हमारे आस पास होते हैं जिनसे हम व्यावहारिक ज्ञान की सीख लेते हैं। आज अवसर है हर छोटी या बड़ी शिक्षा देने वाले गुरुजनों को अभिवादन करने का और उनसे मिली हर उस सीख को प्रणाम करने का जिनसे जीवन का आधार बना।
मेरे अन्दर जिज्ञासा का बीज बोने और मेरी कल्पना को प्रज्ज्वलित करने के लिए ताकि मैं जीवन में आगे बढ़ सकूँ और सफलता प्राप्त कर सकूँ मैं आपकी तहे दिल से आभारी हूँ ।
गुरु अनंत तक जानिए, गुरु की ओर न छोर,
गुरु प्रकाश का पुंज है, निशा बाद का भोर।

शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं🙏🌷

सम्पूर्ण व्यक्तित्व भगवान श्रीकृष्ण


जीवन की समग्रता और जीवन की परिपूर्णता ही कृष्ण हो जाना है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि केवल और केवल एकमात्र भगवान श्रीकृष्ण ऐसे देव अथवा व्यक्तित्व हैं जो चौसठ कलाओं से परिपूर्ण हैं। जीवन का चौसठ कलाओं से परिपूर्ण होने का अर्थ ही जीवन की परिपूर्णता है। जीवन में सभी गुणों की परिपूर्णता ही श्रीकृष्ण हो जाना भी है।
भगवान् श्रीकृष्ण के जीवन का सब कुछ एक आदर्श है। उन्होंने बचपन जिया तो ऐसा कि आज भी माँ अपने छोटे बच्चे को कान्हा कह कर बुलाती है, उन्होंने जवानी जी तो ऐसी कि आज भी प्रेम में पागल किसी लड़के को देख कर लोग कहते हैं कि बड़ा कन्हैया बना फिरता है, जिसने युद्ध रचाया तो ऐसा कि पाँडवों को अनंत अक्षौहिणी सेना के सामने जिता दिया और जिसने गीता का ज्ञान दिया जो आज भी उतनी ही प्रेरक है । ऐसा शायद ही कोई हुआ हो, जो कभी सारथी बना, कभी गुरु बना, कभी प्रेमी बना तो कभी दोस्त बना और न सिर्फ बना, बल्कि हर भूमिका को बखूबी निभाया ।
एक तरफ युद्ध में परिपूर्ण हैं तो दूसरी तरफ शांति में परिपूर्ण हैं। एक तरफ शस्त्र में परिपूर्ण हैं तो दूसरी तरफ शास्त्र में परिपूर्ण हैं।परिपूर्ण वक्ता हैं तो परिपूर्ण श्रोता भी हैं। परिपूर्ण नृत्यकार हैं तो परिपूर्ण गीतकार भी हैं। परिपूर्ण भगवान हैं तो परिपूर्ण भक्त भी हैं।
जिस प्रकार से संसार की सभी नदियाँ गिरकर सागर में मिल जाती हैं उसी प्रकार मनुष्य के समस्त गुणों का मिलकर परिपूर्ण मात्रा में एक जीवन में अथवा एक चरित्र विशेष में आ जाना ही श्रीकृष्ण बन जाना है। इसलिए श्रीकृष्ण ने जब भी किया और जो भी किया सदा परिपूर्ण ही किया है।प्रत्येक कार्य की स्वीकारोक्ति और उसके साथ साथ कार्य कुशलता और कार्य निपुणता वर्तमान समय में योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की सबसे प्रधान शिक्षा है।
कृष्ण अकेले ही इस समग्र जीवन को पूरा ही स्वीकार कर लेते हैं। जीवन की समग्रता की स्वीकृति उनके व्यक्तित्व में फलित हुई है। इसलिए इस देश ने और सभी अवतारों को आंशिक अवतार कहा है, लेकिन कृष्ण को पूर्ण अवतार कहा है। कृष्ण पूरे ही परमात्मा हैं। और यह कहने का, यह सोचने का, ऐसा समझने का कारण है और वह कारण यह है कि कृष्ण ने सभी कुछ आत्मसात कर लिया ।
आप सभी को लीला पुरूषोत्तम योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के मंगलमय जन्म महोत्सव “जन्माष्टमी” की बहुत-बहुत शुभकामनाएं एवं मंगल बधाइयां…!🙏🌷🌷

स्नेह-पर्व ‘रक्षाबंधन’ आज के परिपेक्ष्य में…

भाई – बहन का रिश्ता मां और संतान के बाद दुनिया का शायद सबसे खूबसूरत रिश्ता होता है। एक ऐसा रिश्ता जिसकी अभिव्यक्ति के तरीके बहनों की उम्र के साथ बदलते रहते हैं। बहनों का पूरा बचपन अपने भाईयों से लड़ते-झगड़ते बीत जाता है। साथ रहें, साथ खाएं, साथ सोएं या साथ खेलें – एकदम दुश्मनों वाला सलूक ! राखी के दिन मिठाई खिलाने के बाद भी नेग के लिए झगड़ा। फिर लड़ते-झगड़ते हम बहनें जाने कब सयानी हो जाती हैं और भाईयों की फ़िक्र करने लगती हैं। ब्याह के बाद ससुराल जाकर वे भाईयों को अपनी प्रार्थना और प्रतीक्षा में शामिल कर लेती हैं। राखी के दिन भाईयों का इंतज़ार करती हैं। बूढ़ी हुई तो बहन से सीधे मां की भूमिका में उतर आती हैं। बूढ़े भाईयों को बात-बात में स्नेह-भीगी हिदायतें और डांट-फटकार ! ये तो थी पारम्परिक राखी और बहन के प्यार की बात ।
आज बदलते परिवेश में हम सबको रक्षाबंधन के स्वरूप को इससे ऊपर भी सोचना है वो यह कि जो बहन कमज़ोर हो तो भाई उसकी मज़बूती बन जाए । जब भाई कमज़ोर हो तो बहन उसकी मज़बूती बन जाए । जब भाई बहन कमज़ोर हों तो परिवार उनकी मज़बूती बन जाए । जब परिवार कमज़ोर हो तो समाज उनकी मज़बूती बन जाए । हमें ऐसे ही तो रक्षाबंधन मनाना होगा । यह ज़रूरी नही की हमेशा बहन की रक्षा ही ज़रूरी है, बहुत बार बहन भी भाई की रक्षा ज़्यादा बेहतर कर सकती हैं ।
हाथों पर बंधने वाली राखी दोनों को बराबर कर्तव्य और अधिकार देती है । इनमें से जिसे भी रक्षा की ज़रूरत होगी,दूसरा उसके सामने अपने को हमेशा समर्पित करेगा ।
रक्षाबंधन एक डोर है, जो परिवार को जोड़ती है, एक धागा है, जो परिवार को बुनता है । एक खलिस मोहब्बत में डूबी रस्म है, जो कहती है, अपनी जान की बाज़ी लगा दो मगर इस बंधन में बंधे रिश्ते और इंसान को बचाने से पीछे मत हटो ।

रक्षाबंधन हमसे कहता है, जिसको ज़रूरत पड़े उसके लिए आप मज़बूती से खड़े हो । यह भाई का बहन के लिए खड़ा होना पहली व्याख्या तो हो सकता है मगर दर्शन कहता है कि जो कमज़ोर हो,जिसे ज़रूरत हो,उसके लिए वह खड़ा होए,जो मज़बूत है । कमज़ोर और मज़बूत भाई बहन दोनों हो सकते हैं, इसलिए इसको और बड़े नज़रिए से देखें और जाने,ज़रूरत पर हमें अपना कर्तव्य निभाना है, चाहे हम बहन हों या भाई ।
ईश्वर यह बीमारी भरा कोरोनाकाल जल्द खत्म करे, यह प्रार्थना है। इस रक्षाबंधन हम सबकी एक राखी समस्त देश को भी होनी चाहिए । जहाँ जो भी देशवासी कमज़ोर और असहाय हो, उसकी मदद और उसे सेहत के साथ ज़िन्दा रखने का हम सभी समेत हर मज़बूत व्यक्ति का कर्तव्य है । एक दूसरे के साथ खड़े होइए । बिना रँग,जाति,धर्म,वर्ग के भेद के रक्षा का एक धागा उनसे बंधवा लीजिये,जिन्हें आपकी ज़रूरत है । आज के परिपेक्ष्य में ऐसा रक्षाबंधन मनाने में ही सार्थकता है ।

सभी लोगों को रक्षाबंधन की बहुत बहुत बधाई💐💐💐

पिता…..


सिर पर रखी मज़बूत हथेली की मीठी सी थपकी….!!
हमारे जीवन में पिता का महत्व बेहद खास होता है । मां तो हमेशा अपने प्यार को दर्शा देती है, लेकिन ऊपर से सख्त रहने वाले पिता बहुत कम ही मौकों पर अपना प्यार दिखाते हैं । हम सब के लिए पिता नारियल की तरह होते हैं, जो ऊपर से सख्त और अंदर से काफी नर्म होते हैं । में ये बात अपनी पीढ़ी की कर रही हूँ क्योंकि आजकल के पिता ऊपर से भी नरम हो गए हैं और प्यार भी दर्शाते हैं । हमारे बच्चों के पिता इसी श्रेणी के हैं ।
पिता पर लिखना मतलब अपने अंतर्मन की भावनाओं को खगालना और छिपी हुई स्नेह वाली स्याही को कलम से उकेरना ।
पिता तो वह आईना है जो हमें हमारा प्रतिबिंब दिखाता है, जो कभी झूठ नहीं बोलता, हमें हमारी कमियां दिखाता है, हमें हमसे मिलवाता है। पिता गीता के वो श्लोक हैं, जिन्हें पढ़ते तो सब है, समझते कम ही लोग है……!!
आज मैं आपसे उन्हीं पिता के बारे में बात करूंगी जिनके बारे में बहुत कम कहा जाता है। मां अगर प्यार की बहती नदी है तो पिता उस नदी पर सब्र और शांति का बांध हैं। नदी के प्रवाह में बहना हमें अच्छा लगता है पर बांध की अहमियत तब पता चलती है जब बांध में दरारें पड़ जाती हैं और हम लड़खड़ा जाते हैं। पिता नारियल की तरह है अंदर से कोमल और बाहर से सख्त परंतु लाभदायक। वह एक पेड़ की तरह है जो खुद तो वर्षा और कड़कती धूप में खड़ा रहता है पर हमें छाया और रक्षण देता है। वह चंद्र के समान हमें शीतलता प्रदान करते हैं और सूर्य के समान हमें संसार के हर उजाले से अवगत कराते हैं ,परंतु हमें तो सिर्फ उनकी डांट और फटकार दिखाई देती है उनका प्यार और समर्पण नहीं। जब आप अपना प्रारम्भिक जीवन अपने माता पिता के साथ जीते हो तो कई घटनाओं और बिताए हुए पलों की स्मृतियाँ आपके दिल और दिमाग में अंकित होती जाती हैं । तब हम उन पलों की अहमियत बिल्कुल भी नहीं समझते । पर जैसे जैसे हम हमारे माता पिता के बिना जीवन जीना शुरू करते हैं तो वे स्मृतियाँ कदम कदम आ खड़ी होती हैं जो उनकी मधुर याद दिलाती हैं और मार्गदर्शक भी बनती है ।
मुझे लगता है जीवन क्या है स्मृतियों से भरी एक किताब ही तो है । उस किताब के पन्नों में हमारे बचपन से लेकर आज तक की जीवन यात्रा के विभिन्न पड़ाव की यादें ही तो दर्ज है । इस किताब में से यदि हम
जीवन में हमें मिले संस्कारो को याद करें तो उस कड़ी में सबसे पहले माँ बाप ही याद आते हैं ।
जब हम बड़े हो रहे होते हैं तो हमें उस वक्त पता ही नहीं चलता कि कितने संस्कार हम प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सीख रहे होते हैं । अप्रत्यक्ष संस्कार हमारे जीवन में गहरा प्रभाव डालते हैं । ये बात हमें तब समझ आती है जब हम हमें कोई संस्मरण याद आता है अथवा उन्हीं परिस्थितियों में अपने को पाते हैं । इस बिन्दु पर भूमिका बनाने के पीछे मेरा इशारा मेरे पिता से सीखी गई बातों और संस्कारों से था । मेरे पिता बहुत ही खुले विचारों के थे । मैंने मेरे जीवन मे कभी भी उनको संकुचित विचारधारा और रूढ़िवादी टाइप महसूस ही नहीं किया । घर के बेसिक नियमों के अलावा मैंने उनको हम पर कोई बंधन लगाते नहीं देखा । रक्षात्मक व्यवहार न होने के कारण हम सभी भाई बहन डरपोक नहीं बने । मुझे याद आता है कि जब हम छोटे थे तब मैंने यह पाया कि मेरे पिताजी को किताबें पढ़ने का बहुत शौक था और उन्होंने घर में एक लाइब्रेरी बना रखी थी उस लाइब्रेरी में बहुत सारी माइथोलॉजीकल किताबें ,ज्योतिष की किताबें होती थी । उनकी लाइब्रेरी के कलेक्शन में रामायण, महाभारत ,सत्यार्थ प्रकाश, योगी की आत्मकथा और रामकृष्ण परमहंस,विवेकानंद जी आदि की बहुत सारी किताबें थी । गर्मियों की छुट्टियों में पिताजी हम लोगों के लिए विक्रम बेताल, चाचा चौधरी, साबू और ढेर सारी अमर चित्र कथाएं लेकर आते थे ।हम छुट्टियों में इन सबकी कहानियां पढ़ते थे ।आज समझ आता है उन्होंने कभी नहीं कहा कि किताबें पढ़ो पर घर पर किताबें लाकर रखना और उन्हें खुद के द्वारा पढा जाना उनके द्वारा दिया गया अप्रत्यक्ष संस्कार था । मैंने हमेशा उनको अपने घर वालों को कितनी ही बार वित्तीय सहायता करते देखा और उसके बाद न कभी उसका गुणगान किया और न ही कभी उसके बदले घर वालों से कुछ आशा रखी। इस कारण मैने कई बार महसूस किया कि घर में आर्थिक तंगी भी हो जाती थी । व्यक्तिगत जीवन में भी वे कभी किसी से कोई आशा रखते थे और न ही किसी पर आश्रित भाव रखते थे । एक और बात जो मैंने उनसे सीखी कि आपके पास जितना है उतना पर्याप्त है यानी संतुष्ट प्रवर्त्ति के इंसान थे । मुझे उनका व्यावसायिक जीवन भी देखने का मौका मिला तो मैंने पाया कि उनमें अपने साथ के लोगों के लिए जरा भी ईर्ष्याभाव न था मैंने उनको कभी किसी की बुराई करते नहीं देखा ।काम के प्रति समर्पण भी गजब का था ।
उन्होंने व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन में कभी किसी का बुरा नहीं किया ।इसके कारण मैने पाया कि उन्हें बहुत चैन की नींद आती थी । आत्म अनुशासन भी गजब का था । मैंने उनको कभी सुबह 7 बजे तक सोते नहीं देखा । 60 वर्ष की आयु तक कभी बीमार होते नही देखा ।
ऊपर उल्लिखित बाते बताने के पीछे मेरा आशय ये था कि ये सब बातें उन्होंने हमें कह कर नहीं सिखाई पर अपने व्यवहार में लाई और उनके व्यवहार से हमने यह सीखा कि ईमानदारी,आत्म अनुशासन से रहो ।
ज़रूरत पड़ने पर हमेशा लोगों की मदद करो, किसी का भला करो तो उसके बदले कोई आशा मत रखो । अपनी सन्तुष्ट होने की प्रवृत्ति रखो । किसी का बुरा मत करो और न ही किसी के लिए बुरा बोलो । हमेशा सकारात्मक रहो और खुश रहो। किताबें हमारी मित्र हैं, पथ प्रदर्शक हैं ।
मैंने उनके द्वारा अपनाई फिलॉसफी को अपने जीवन मे भी उतारने की कोशिश की और पाया कि अगर आपका दिल साफ है। आप किसी का बुरा नही करते हो तो आपके साथ भी बुरा नहीं होगा । आप लोगो की भलाई करो ज़रूरत पड़ने पर मदद करो तो जब आपको ज़रूरत पड़ेगी तो ईश्वर किसी न किसी के माध्यम द्वारा आपकी भी मदद करेगा । आज उनका हमारे बीच न होना बड़ा सालता है मुझे । बहुत जल्दी इस दुनिया को अलविदा कह दिया । कितनी ही बातें थी जो में जीवन की आपाधापी में कह नहीं पाई,पर कहना चाहती थी । कहते हैं न ..इंसान के जाने के बाद ही उसकी कदर होती है । पिता के होने का महत्व उनके जाने के बाद ही ज्यादा समझ आया है । बहुत याद आते हो पापा ।
यूँ तो हमारी सभ्यता में माता-पिता का दर्जा ईश्वर से भी ऊँचा है। इस जीवन यात्रा के तमाम रास्तों पर अपने मज़बूत कंधों का सहारा देने और मनुष्यता का पाठ पढ़ाने वाले पिताजी को इस विशेष अवसर पर असंख्य प्रणाम…!


आज के युग में हम राम और श्रवण तो नहीं बन सकते पर अपने जन्मदाता के थकते कंधों को सहला सकते हैं, उनके कांपते हाथों को थाम सकते हैं और कह सकते हैं …..हम हैं । तभी सही मायने में हम फादर्स डे को सार्थक कर पाएंगे ।

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पर्यावरण संरक्षण और हमारी भारतीय परम्पराएं

हम अगर हमारे चारों ओर देखें तो ईश्वर की बनाई इस अद्भुत पर्यावरण की सुंदरता देख कर मन प्रफुल्लित हो जाता है पर्यावरण की गोद में सुंदर फूल, लताएं, हरे-भरे वृक्ष और प्यारे चहचहाते पक्षी है, जो हमारे आकर्षण का केंद्र बिंदु है । आज मानव ने अपनी जिज्ञासा और नई नई खोज की अभिलाषा में पर्यावरण के सहज कार्यो में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया है जिसके कारण हमारा पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है।पर्यावरण  का मतलब है-जलवायु, स्वच्छता, प्रदूषण तथा वृक्ष । और ये सभी चीजें हमारे दैनिक जीवन से सीधा संबंध रखती है और उसे प्रभावित करती है। पर्यावरण के जैविक संघटकों में सूक्ष्म जीवाणु से लेकर कीड़े-मकोड़े, सभी जीव-जंतु और पेड़-पौधों के अलावा उनसे जुड़ी सारी जैव क्रियाएं और प्रक्रियाएं भी शामिल हैं। जबकि पर्यावरण के अजैविक संघटकों में निर्जीव तत्व और उनसे जुड़ी प्रक्रियाएं आती हैं, जैसे: पर्वत, चट्टानें, नदी, हवा और जलवायु के तत्व इत्यादि।
मनुष्यों द्वारा की जाने वाली समस्त क्रियाएं पर्यावरण को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। आज पर्यावरणीय समस्याएं जैसे प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन इत्यादि मनुष्य को अपनी जीवनशैली के बारे में पुनर्विचार के लिये प्रेरित कर रही हैं और अब पर्यावरण संरक्षण और पर्यावरण प्रबंधन की आवश्यकता महत्वपूर्ण हो चुकी है।मानव और पर्यावरण एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। पर्यावरण जैसे जलवायु प्रदूषण या वृक्षों का कम होना मानव शरीर और स्वास्थ पर सीधा असर डालता है। मानव की अच्छी आदतें जैसे वृक्षों को सहेजना, जलवायु प्रदूषण रोकना, स्वच्छता रखना भी पर्यावरण को प्रभावित करती है। मानव की बूरी आदतें जैसे पानी दूषित करना, बर्बाद करना, वृक्षों की अत्यधिक मात्रा में कटाई करना आदि पर्यावरण को बूरी तरह से प्रभावित करती है। जिसका नतीजा बाद में मानव को प्राकर्तिक आपदाओं का सामना करके भुगतना ही पड़ता है।
भौतिक विकास के पीछे दौड़ रही दुनिया ने आज इस कोरोनाकाल में जरा ठहरकर सांस ली तो उसे अहसास हुआ कि चमक-धमक के फेर में क्या कीमत चुकाई जा रही है। आज ऐसा कोई देश नहीं है जो पर्यावरण संकट पर मंथन नहीं कर रहा हो। भारत भी चिंतित है। लेकिन, जहांं दूसरे देश भौतिक चकाचौंध के लिए अपना सब कुछ लुटा चुके हैं, वहीं भारत के पास आज भी बहुत कुछ बाकी है।प्रकृति संरक्षण का कोई संस्कार अखण्ड भारत भूमि को छोड़कर अन्यत्र देखने में नहीं आता है।
हमारी पृथ्वी और उसके पर्यावरण की चिंता भारतीय संस्कृति की परंपरागत सोच रही है। हिन्दू धर्म में प्रकृति पूजन को प्रकृति संरक्षण के तौर पर मान्यता है। भारत में पेड़-पौधों, नदी-पर्वत, ग्रह-नक्षत्र, अग्नि-वायु सहित प्रकृति के विभिन्न रूपों के साथ मानवीय रिश्ते जोड़े गए हैं। पेड़ की तुलना संतान से की गई है तो नदी को मांं स्वरूप माना गया है।
ग्रह-नक्षत्र, पहाड़ और वायु देवरूप माने गए हैं। प्राचीन समय से ही भारत के वैज्ञानिक ऋषि-मुनियों को प्रकृति संरक्षण और मानव के स्वभाव की गहरी जानकारी थी। वे जानते थे कि मानव अपने क्षणिक लाभ के लिए कई मौकों पर गंभीर भूल कर सकता है। अपना ही भारी नुकसान कर सकता है। इसलिए उन्होंने प्रकृति के साथ मानव के संबंध विकसित कर दिए। ताकि मनुष्य को प्रकृति को गंभीर क्षति पहुंचाने से रोका जा सके। यही कारण है कि प्राचीन काल से ही भारत में प्रकृति के साथ संतुलन करके चलने का महत्वपूर्ण संस्कार है।  हिन्दू परंपराओं ने कहीं न कहीं प्रकृति का संरक्षण किया है। हिन्दू धर्म का प्रकृति के साथ कितना गहरा रिश्ता है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि दुनिया के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद का प्रथम मंत्र ही अग्नि की स्तुति में रचा गया है ।
हिन्दुत्व वैज्ञानिक जीवन पद्धति है। प्रत्येक हिन्दू परम्परा के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक रहस्य छिपा हुआ है। इन रहस्यों को प्रकट करने का कार्य होना चाहिए। हिन्दू धर्म के संबंध में एक बात दुनिया मानती है कि हिन्दू दर्शन ‘जियो और जीने दो’ के सिद्धांत पर आधारित है। यह विशेषता किसी अन्य धर्म में नहीं है। हिन्दू धर्म का सह अस्तित्व का सिद्धांत ही हिन्दुओं को प्रकृति के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है। वैदिक वाङ्मयों में प्रकृति के प्रत्येक अवयव के संरक्षण और सम्वद्र्धन के निर्देश मिलते हैं। हमारे ऋषि जानते थे कि पृथ्वी का आधार जल और जंगल है। इसलिए उन्होंने पृथ्वी की रक्षा के लिए वृक्ष और जल को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा है- ‘वृक्षाद् वर्षति पर्जन्य: पर्जन्यादन्न सम्भव: ‘ अर्थात् वृक्ष जल है, जल अन्न है, अन्न जीवन है। वृक्षों की रक्षा के लिए हमारे पूर्वजों ने देवताओं में त्रिदेव के समानांतर पर्यावरण पर सबसे सकारात्मक प्रभाव डालने वाले तीन वृक्षों की त्रिमूर्ति तैयार की और उन्हें काटना वर्जित कर दिया। ये तीन वृक्ष हैं – पीपल, बरगद और नीम। पीपल को ब्रह्म देव का, बरगद को शिव का और नीम को देवी दुर्गा का आवास बताकर उन्हें पूजनीय बनाया। औषधीय गुणों के कारण आंवले और शमी के वृक्ष और तुलसी के पौधे को पूज्य घोषित किया।
जंगल को हमारे ऋषि आनंददायक कहते हैं- ‘तेरे जंगल हमारे लिए सुखदाई हों । यही कारण है कि हिन्दू जीवन के चार महत्वपूर्ण आश्रमों में से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास का सीधा संबंध वनों से ही है। हम कह सकते हैं कि इन्हीं वनों में हमारी सांस्कृतिक विरासत का सम्वद्र्धन हुआ है। हिन्दू संस्कृति में वृक्ष को देवता मानकर पूजा करने का विधान है। वृक्षों की पूजा करने के विधान के कारण हिन्दू स्वभाव से वृक्षों का संरक्षक हो जाता है।
हमारे महर्षि यह भली प्रकार जानते थे कि पेड़ों में भी चेतना होती है। इसलिए उन्हें मनुष्य के समतुल्य माना गया है। उद्दालक ऋषि अपने पुत्र श्वेतकेतु से आत्मा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वृक्ष जीवात्मा से ओतप्रोत होते हैं और मनुष्यों की भाँति सुख-दु:ख की अनुभूति करते हैं। हिन्दू दर्शन में एक वृक्ष की मनुष्य के दस पुत्रों से तुलना की गई है-
घर में तुलसी का पौधा लगाने का आग्रह भी हिन्दू संस्कृति में क्यों है? यह आज सिद्ध हो गया है। तुलसी का पौधा मनुष्य को सबसे अधिक प्राणवायु ऑक्सीजन देता है। तुलसी के पौधे में अनेक औषधीय गुण भी मौजूद हैं। पीपल को देवता मानकर भी उसकी पूजा नियमित इसीलिए की जाती है क्योंकि वह भी अधिक मात्रा में ऑक्सीजन देता है।
देवों के देव महादेव तो बेल-पत्र और धतूरे से ही प्रसन्न होते हैं। यदि कोई शिवभक्त है तो उसे बेलपत्र और धतूरे के पेड़-पौधों की रक्षा करनी ही पड़ेगी।
वट पूर्णिमा और आंवला नवमी का पर्व मनाना है तो वटवृक्ष और आंवले के पेड़ धरती पर बचाने ही होंगे। सरस्वती को पीले फूल पसंद हैं। धन-सम्पदा की देवी लक्ष्मी को कमल और गुलाब के फूल से प्रसन्न किया जा सकता है। गणेश दूर्वा से प्रसन्न हो जाते हैं। हिन्दू धर्म के प्रत्येक देवी-देवता भी पशु-पक्षी और पेड़-पौधों से लेकर प्रकृति के विभिन्न अवयवों के संरक्षण का संदेश देते हैं।
जीवनदायिनी नदियों को देवी और मां तथा जलाशयों को देवताओं की क्रीड़ा-भूमि बताकर उनकी निर्मलता की रक्षा के प्रयास हुए।
जलस्रोतों का भी हिन्दू धर्म में बहुत महत्व है। ज्यादातर गांव-नगर नदी के किनारे पर बसे हैं। ऐसे गांव जो नदी किनारे नहीं हैं, वहां ग्रामीणों ने तालाब बनाए थे। बिना नदी या ताल के गांव-नगर के अस्तित्व की कल्पना नहीं है। हिन्दुओं के चार वेदों में से एक अथर्ववेद में बताया गया है कि आवास के समीप शुद्ध जलयुक्त जलाशय होना चाहिए। जल दीर्घायु प्रदायक, कल्याणकारक, सुखमय और प्राणरक्षक होता है। शुद्ध जल के बिना जीवन संभव नहीं है। यही कारण है कि जलस्रोतों को बचाए रखने के लिए हमारे ऋषियों ने इन्हें सम्मान दिया। पूर्वजों ने कल-कल प्रवाहमान सरिता गंगा को ही नहीं वरन सभी जीवनदायनी नदियों को मांं कहा है। हिन्दू धर्म में अनेक अवसर पर नदियों, तालाबों और सागरों की मांं के रूप में उपासना की जाती है।
हमारे उपनिषद में अन्न की अपेक्षा जल को उत्कृष्ट कहा गया है।  महान ज्ञानी ऋषियों ने धार्मिक परंपराओं से जोड़कर पर्वतों की भी महत्ता स्थापित की है। देश के प्रमुख पर्वत देवताओं के निवास स्थान हैं। अगर पर्वत देवताओं के वासस्थान नहीं होते तो कब के खनन माफिया उन्हें उखाड़ चुके होते। कैलाश पर्वत महाशिव की तपोभूमि है। हिमालय को तो भारत का किरीट कहा गया है। महाकवि कालिदास ने ‘कुमारसम्भवम्’ में हिमालय की महानता और देवत्व को बताते हुए कहा है- उत्तर दिशा में देवतात्मा हिमालय नाम का पर्वतराज है, जिसकी भुजाएं पूर्व और पश्चिम में समुद्रपर्यंत फैली हुई हैं और जो पृथ्वी के मानदंड की तरह स्थित है।
भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन की पूजा का विधान इसलिए शुरू कराया था क्योंकि गोवर्धन पर्वत पर अनेक औषधि के पेड़-पौधे थे, मथुरा-वृन्दावन सहित पूरे देश में दीपावली के बाद गोवर्धन पूजा धूमधाम से की जाती है।
इसी तरह हमारे महर्षियों ने जीव-जन्तुओं के महत्व को पहचानकर उनकी भी देवरूप में अर्चना की है। मनुष्य और पशु परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर हैं। सिंह, हाथी, सांप, गाय, बैल, घोड़ों, मछलियों, कछुओं सहित पशुओं की कई प्रजातियों को देवताओं का अवतार, वाहन या प्रिय बताकर उनके साथ हमारे सौहार्दपूर्ण रिश्ते बनाने की चेष्टाएं हुईं। पक्षी तो हमेशा से ही पर्यावरण के बैरोमीटर रहे हैं। जहां प्रकृति का सौंदर्य होता है, पक्षियों के गीत वहीं गूंजते हैं। पक्षी जिस जगह से दूरी बना लेते हैं, उसे अपवित्र और रहने लायक नहीं माना जाता। हमारी आदिवासी परंपराओं में मनुष्य और पक्षियों का सनातन रिश्ता आज भी क़ायम है। वहां जब तक पक्षियों का कलरव नहीं गूंजे, घर में किसी धार्मिक अनुष्ठान का आरंभ नहीं होता।
हिन्दू धर्म में गाय, कुत्ता, बिल्ली, चूहा, हाथी, शेर और यहां तक की विषधर नागराज को भी पूजनीय बताया है। प्रत्येक हिन्दू परिवार में पहली रोटी गाय के लिए और आखिरी रोटी कुत्ते के लिए निकाली जाती है। चींटियों को भी बहुत से हिन्दू आटा डालते हैं। चिडिय़ों और कौओं के लिए घर की मुंडेर पर दाना-पानी रखा जाता है। पितृपक्ष में तो कौए को बाकायदा निमंत्रित करके दाना-पानी खिलाया जाता है। इन सब परम्पराओं के पीछे जीव संरक्षण का संदेश है। हिन्दू गाय को माँ कहता है। उसकी अर्चना करता है। नागपंचमी के दिन नागदेव की पूजा की जाती है। नाग-विष से मनुष्य के लिए प्राणरक्षक औषधियों का निर्माण होता है। नाग पूजन के पीछे का रहस्य ही यह है। हमारी संस्कृति में देवों में प्रथम पूज्य गणेश की कल्पना प्रकृति और पर्यावरण के रूपक की तरह की गई है। गणेश का मस्तक हाथी का है। चूहे उनके वाहन हैं। बैल नंदी उनका मित्र और अभिभावक। मोर और सांप उनके परिवार के सदस्य। पर्वत उनका आवास है और वन क्रीड़ा-स्थल। उन्हें गढ़ने में नदी गंगा की भूमिका रही थी। गणेश का रंग हरा प्रकृति का और लाल शक्ति का प्रतीक है। महंगी पूजन सामग्रियों से नहीं, इक्कीस पेड़-पौधों की पत्तियों से उनकी पूजा होती है। जबतक इक्कीस दूबों की मौली समर्पित न की जाय, उनकी पूजा अधूरी मानी जाती है। कहा गया कि आम, पीपल और नीम के पत्तों वाली गणेश की आकृति प्रवेश द्वार पर लगाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
हिन्दू धर्म की विशेषता है कि वह प्रकृति के संरक्षण की परम्परा का जन्मदाता है। हिन्दू संस्कृति में प्रत्येक जीव के कल्याण का भाव है। हिन्दू धर्म के जितने भी त्योहार हैं, वे सब प्रकृति के अनुरूप हैं। मकर संक्रान्ति, वसंत पंचमी, महाशिवरात्रि, होली, नवरात्र, गुड़ी पड़वा, वट पूर्णिमा, ओणम्, दीपावली, कार्तिक पूर्णिमा, छठ पूजा, शरद पूर्णिमा, अन्नकूट, देव प्रबोधिनी एकादशी, हरियाली तीज, गंगा दशहरा आदि सब पर्वों में प्रकृति संरक्षण का पुण्य स्मरण है।
हमारे पूर्वजों ने पर्यावरण का महत्व समझा था और लोगों को उसके प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से असंख्य  मिथक और प्रतीक गढ़े। कालांतर में वे मिथक और प्रतीक हमारे आदर्श हो गए और उनके पीछे छुपे पृथ्वी और पर्यावरण को संरक्षित करने के उद्देश्य पीछे छूट गए। अपनी परंपराओं की अधकचरी समझ के कारण हमारी पृथ्वी और उसका पर्यावरण आज अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से जूझ रहे हैं। पर्यावरण के प्रति सचेत करने के उद्देश्य से   संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1972 से 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जाने लगा ।पर्यावरण दिवस का मुख्य उद्देश्य हमारी प्रकृति की रक्षा के लिए जागरूकता बढ़ाना और दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे विभिन्न पर्यावरणीय मुद्दों को देखना है।
प्रत्येक व्यक्ति अगर अपनी अपनी जिम्मेदारी समझे तो सभी प्रकार की कचरा ,गंदगी और बढ़ती आबादी के लिए स्वयं उपाय करके पर्यावरण संरक्षण में अपनी भागीदारी दे सकता है, लेकिन प्रगति के नाम पर पर्यावरण को मानव ने ही विकृत करने का प्रयास किया है, पर्यावरण व्यापक शब्द है जिसका सामान्य अर्थ प्रकृति द्वारा प्रदान किया गया समस्त भौतिक और सामाजिक वातावरण इसके अंतर्गत जल, वायु, पेड़, पौधे, पर्वत, प्राकृतिक संपदा सभी पर्यावरण सरक्षण के उपाए में आते है।  आज पर्यावरण का ध्यान रखना हर व्यक्ति का कर्तव्य और जिम्मेदारी है।
पर्यावरण सुरक्षा और उसमें संतुलन हमेशा बना रहे इसके लिए हमें जागरुक और सचेत रहना होगा। प्रत्येक प्रकार के हानिकारक प्रदूषण जैसे जल, वायु, ध्वनि, इन सब खतरनाक प्रदूषण से बचने के लिए अगर हमने धीरे-धीरे भी कोई उपाय करते रहें तो हमारी पृथ्वी की सुंदरता जो कि पर्यावरण है। उसे बचा सकते हैं और अपने जीवन को भी स्वस्थ और स्वच्छ रूप में प्राप्त कर सकते हैं पर्यावरण संरक्षण विश्व में प्रत्येक मनुष्य के लिए अनिवार्य रूप से घोषित करना चाहिए।  पर्यावरण है तो हमारा जीवन है।  हमारी भारतीय संस्कृति में प्रकृति संरक्षण एक महत्वपूर्ण कर्तव्य है। पेड़-पौधे, नदी-पर्वत, अग्नि-वायु सहित प्रकृति के विभिन्न रूप हमारे लिए वंदनीय हैं।
तो आइए,आज ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ पर अपनी प्राकृतिक संपदा के संरक्षण और संवर्धन हेतु हम सब संकल्पित हों।
विश्व पर्यावरण दिवस की शुभकामनाएं

इंसान से खतरनाक कोई वायरस नहीं…..

शांति और एकांत पसंद करने वाले प्राणी ने अपने बच्चे, अपने परिवार को खो दिया, क्योंकि मनुष्यों के एक समूह ने उसके साथ एक खेल खेलने का फैसला किया। एक ऐसा खेल जिसकी कीमत उसकी जान को चुकानी पड़ी।
एक भयानक घटना में, एक 15 वर्षीय गर्भवती हाथी की केरल में मृत्यु हो गई, पानी में खड़े होकर, 27 मई को, पटाखों से भरे अन्नानास खिलाए जाने के बाद, उसे कुछ स्थानीय लोगों ने कथित तौर पर पेश किया। उसके मुंह में फल फट गया था, जिससे उसकी मौत हो गई।
अधिकारी मोहन ने इस घटना को सोशल मीडिया पर लेने का फैसला किया क्योंकि वह हर किसी को बतलाना चाहता था कि जब वह भूखा था, तो हानि-रहित जानवर ने हम पर भरोसा कैसे किया।

मोहन_कृष्णन, वन_अधिकारी ने अपने फेसबुक पर भी इसकी जानकारी देते हुए लिखा।

“जब वह गाँव की गलियों में दुख दर्द में दौड़ती थी तो एक भी इंसान को नुकसान नहीं पहुँचाती थी। उसने एक भी घर को नहीं कुचला। यही कारण है कि मैंने कहा, वह अच्छाई से भरी है। ” मोहन कृष्णन, वन अधिकारी”
“अधिकारी ने कहा, “हमने वहां एक चिता में उनका अंतिम संस्कार किया। हमने उनके सामने झुककर अपने अंतिम सम्मानों का भुगतान किया।”


सोर्स : https://www.facebook.com/mohan.krishnan.1426/posts/2979525145456462

हम कितने अमानवीय हो गए है अपने आचरणों से ….!! मानव के सोचने का समय है कि…. जानवर कौन है???

केरल में केवल हाथी नहीं…..मानवता मरी है ।

केरल की घटना ने पुनः सिद्ध कर दिया कि शिक्षित होना और सभ्य होना, दोनों अलग अलग बातें हैं ।
जब से मानव ने सभ्यता सीखनी शुरू की और अपना विकास करना प्रारम्भ किया, लगभग तभी से उसने जानवरों के महत्व को भी समझ लिया था। हमने जानवरों की वफ़ादारी को देखा और उसे अपना साथी बना लिया, मानव सभ्यता के विकास में जो पशु लाखों साल से हमारे कंधे से कन्धा मिलाकर चल रहे हैं, अगर हम उन्हें ही आधुनिकताऔर सनक के नाम पर मार देते हैं तो फिर हमें किसी भी तरह सभ्य इंसान कहलाने का हक़ नहीं बनता है! धन्य है वो अनपढ़ ,गँवार अंधविश्वास जो हाथी को भगवान गणेश , कुत्ते को भैरव , भैंस को यमराज का वाहन मान कर श्रद्धा से नमन कर रोटी खिलाते हैं । शिक्षितों की तरह अन्ननास में पटाखे डाल कर नहीं खिलाते ।ऐसी वीभत्स घटना के लिए जिम्मेदार लोगों को गिरफ्तार किया जाना चाहिए और सार्वजनिक रूप से एक उदाहरण प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
अब कोई प्राकृतिक आपदा आ जाए तो ये मत पूछना हम ही क्यों… हमने क्या किया था क्योंकि जो हिसाब इंसान नही रख पाता उसका हिसाब ऊपर वाला जरूर रखता है ।
जितनी बार भी मस्तिष्क में इस वीभत्स अपराध का दृश्य उभर कर आ रहा है उतनी ही बार यह भयावह दृश्य हृदय को झकझोर कर रख दे रहा है । ऐसे नरपिशाचों के कृत्यों को देखकर लगता है मानो कोरोना तो मात्र एक झांकी है ।
इस माँ को श्रद्धांजलि अपने बच्चे के साथ बेहतर दुनिया मे जाने के लिए…. इस धरती पर तुम्हारे लायक कोई जगह नहीं थी ।
🙏😔

अन्तर्राष्ट्रीय परिवार दिवस…

परिवार, समाज की मूल ईकाई मानी जाती है। किसी भी समाज की कल्पना बिना परिवार के नहीं की जा सकती। परिवार के महत्व को बनाए रखने के लिए साल 1993 में संयुक्त राष्ट्र जनरल एसेंबली ने हर साल परिवार दिवस मनाए जाने की घोषणा की थी। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय परिवारों को कितना महत्व देता है,यह इससे जाहिर होता है ।परिवारों से संबंधित मुद्दों के बारे में जागरूकता फैलाने, वैश्विक समुदाय परिवारों को जोड़ने, परिवारों को प्रभावित करने वाले आर्थिक और सामाजिक प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी देने के लिए इस खास दिवस को मनाया जाता है।

जन्म और मृत्यु के बीच जो समय हम व्यतीत करते है वह हमारा जीवन काल कहलाता है | इसी जीवन काल में हम अपने संबंधों को जीते है उन्ही संबंधो को जीवित रखने को हम परिवार कहते है जिसमें माता पिता , पति-पत्नी, भाई बहन और भी सदस्य शामिल रहते हैं। इन्ही को हम परिवार कहते हैं । एक छत के नीचे रहने वाले व्यक्तियों का समूह “परिवार” कहलाता है।
परिवार दो प्रकार के होते हैं-

  1. एकल परिवार – इस में परिवार माता-पिता और बच्चे  रहते हैं।
  2. संयुक्त परिवार – संयुक्त परिवार में माता-पिता और बच्चों के साथ दादा-दादी व अन्य घर के सदस्य सभी साथ में रहते हैं। अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस भी महत्वपूर्ण है ताकि हम परिवार के महत्व को न भूल पाएं | परन्तु मानव का स्वार्थ हमेशा संबंधो को कमजोर करता है और वह परिवार की बली चढाने में भी नही हिचकिचाता है |परिवार समाज की सबसे छोटी इकाई है या हम कह सकते हैं सामाजिक संगठन की मौलिक इकाई है। जो हमें कि सामंजस्य के साथ जीना और एक-दूसरे से सहयोगात्मक और सौहार्दपूर्ण संबंध बनाना सिखाती है। आज की वैश्विक महामारी जिसे हम कोरोना वायरस के नाम से जान रहे हैं यह शिक्षा देता है कि परिवार के मूल्य को पहचाने के लिए इससे अच्छी परिस्थिति हो ही नही सकती भले ही मजबूरी ही सही लेकिन परिवार के साथ हम समय बिताने को विवश है| जीवन, पल भर में सब कुछ बदल कर रख देता यदि हम वास्तव में मालिक है तो उस पल के जो हमारे द्वारा किसी को सुकून दे सके वरना कोरोना ने यह दिखा दिया है कि हमारी क्या हैसियत है | इस धरा पर सब कुछ धरा रह जायेगा जिस शान शौकत का हम घमंड करते है वह हमारी भूल है |परिवार हमेशा खुशहाल रहे चाहे वह किसी का भी हो | अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस की शुभकामनाएं 🙏

जीवन एक यात्रा….


हमारा जीवन एक निरन्तर चलने वाली यात्रा है । यहाँ हर किसी को अलग अलग परिस्थितियों में जीवन यात्रा करनी होती है।
इस यात्रा में यह ज़रूरी नहीं होता कि यात्रा में आने वाला हर इंसान आपका हमेशा के लिए सहयात्री बने । इस यात्रा के हर कदम पर एक नया मोड़, नया पात्र, एक नया अनुभव आपका इंतज़ार कर रहा होता है। हमें इस संपूर्ण यात्रा में अपना कर्म करना होता है।
प्रकृति के नियम के अनुसार यहाँ छोटी से छोटी घटना भी किसी कारण से होती है बगैर कारण के कुछ घटित नहीं होता ।
जैसे किताब में आने वाली घटनाओं पर लेखक के सिवा किसी का बस नहीं उसी तरह हमारे जीवन की यात्रा में आने वाली घटनाओं पर हमारा बस नहीं होता । अगर किसी चीज़ पर हमारा बस है तो वो है हमारे अनुभव , जो ज़िन्दगी ने हमें देती हुई चलती है और कुछ सबक जो हम सीखते हुए चलते हैं । हमारे इस जीवन की शुरुआत में आने वाले सहयात्री अंत तक हमारा साथ नहीं देते। कुछ हमें बीच में ही छोड़कर चले जाते हैं कुछ को हम ही पीछे छोड़ आते हैं, कुछ हमें याद आते हैं, कुछ को हम भूल जाते हैं । इस यात्रा के सफर में कहीं खुशियाँ तो कहीं पर ग़म मिलते हैं लेकिन यही इस यात्रा का आनन्द है । जीवन यात्रा में हर तरह के मौसम हमें विभिन्न प्रकार के अनुभव देते हैं ।

हमें निरन्तर चलते रहना जरूरी है ।अगर हम रुक कर एक जगह बैठ जाएंगे तो अगले पड़ाव पर मिलने वाले अनुभवों और आश्चर्यों से वंचित रह जाएंगे । जब मनुष्य सिर्फ एक जगह स्थिर होकर सोचना शुरू कर देता है तो उसकी सोच का दायरा और व्यवहार सीमित हो जाता है। सोच का दायरा सीमित होने की वजह से उसके सामाजिक चरित्र और व्यवहार में भी ठहराव आना शुरू होता है। अंततः वह स्वयं सीमित हो जाता है ।

जीवन चलने का नाम , चलते रहो सुबह- शाम …….. यह फिल्मी गीत जीवन की गति की ओर इशारा करता है। जीवन में उतार- चढ़ाव तो आते रहते हैं पर हम जो भी दिशा चुनते हैं उस पर चलने का अर्थ हो – अपनी शक्तियों का सदुपयोग करना। उन्नति के लिए निरन्तर कर्म करते करना, विकास की ओर उन्मुख होना और सुव्यवस्थित जीवन बिताना ।
इस यात्रा में मिलने वाले हर किरदार और घटना की भी अपनी अहमियत है,ना कोई किसी से ज़्यादा ज़रूरी है और ना कोई किसी से कम । हर सहयात्री का अपना किरदार और समय होता है । हमारी जीवन यात्रा में वह अपनी भूमिका निभाता है और भूमिका खत्म होने के बाद उसे हमारी यात्रा से जाना होता है। ना हम उसके आने का वक़्त तय करते हैं और ना जाने का । जीवन में उसकी आवश्यकता ही उसका निर्धारण करती है। ज़रूरी ये नहीं कि कब तक और किसके साथ आपकी यात्रा जारी रही । पर ज़रूरी ये है कि आपने इस यात्रा में अपने किरदार को पूर्णतः जिया या नहीं। इस यात्रा में कितने ही सफर हमें सिर्फ अकेले ही तय करने होते हैं। नई राहें अपनानी होती हैं । उन राहों पर हमें हमारी सकारात्मक सोच से आगे बढ़ने की शक्ति मिलती है । इस यात्रा में जब तक आप चल रहे हैं तब तक आप खुलकर इस यात्रा का आनंद भी उठाते चलें वरना समय का क्या भरोसा और हमारी जीवन यात्रा कहाँ जाकर रुक जाए।
कभी कभी तो मुझे यह महसूस होता है कि जीवन यात्रा के सफर में आए मुकामों को तय कैसे किया जाए इसका ज्ञान जब होता है तब तक यह सफर समाप्ति की ओर आ गया होता है । आपकी पद प्रतिष्ठा के कारण आपको जीवन में बहुत सारे लोग सम्मान और आदर देंगे परन्तु हमारे इस जीवन की यात्रा समाप्त होने के बाद हमारे कर्म ही याद रखें जाएंगे । हम समय के साथ विलीन हो जाएंगे लेकिन जो भूमिका हमने निभाई और उसके कारण मिलने वाला सम्मान और आदर ही हमारे जीवन की शाश्वतता का प्रमाण है ।

पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार किसी एक की जीवन यात्रा सिर्फ वर्तमान एक जन्म की नहीं अपितु कितने ही बीते हुए जन्मों और आने वाले जन्मों की यात्रा होती है। हमारी यात्रा अनन्त है ।

आपके जीवन की इस यात्रा पर आप सकारात्मक सोच के साथ उन्नति के लिए निरन्तर कर्म करते रहें , विकास की ओर उन्मुख रहकर अपना जीवन सुव्यवस्थित बिताएं , ऐसी मेरी शुभकामनाएं है…….।

ऋतु नायक