पर्यावरण संरक्षण और हमारी भारतीय परम्पराएं

हम अगर हमारे चारों ओर देखें तो ईश्वर की बनाई इस अद्भुत पर्यावरण की सुंदरता देख कर मन प्रफुल्लित हो जाता है पर्यावरण की गोद में सुंदर फूल, लताएं, हरे-भरे वृक्ष और प्यारे चहचहाते पक्षी है, जो हमारे आकर्षण का केंद्र बिंदु है । आज मानव ने अपनी जिज्ञासा और नई नई खोज की अभिलाषा में पर्यावरण के सहज कार्यो में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया है जिसके कारण हमारा पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है।पर्यावरण  का मतलब है-जलवायु, स्वच्छता, प्रदूषण तथा वृक्ष । और ये सभी चीजें हमारे दैनिक जीवन से सीधा संबंध रखती है और उसे प्रभावित करती है। पर्यावरण के जैविक संघटकों में सूक्ष्म जीवाणु से लेकर कीड़े-मकोड़े, सभी जीव-जंतु और पेड़-पौधों के अलावा उनसे जुड़ी सारी जैव क्रियाएं और प्रक्रियाएं भी शामिल हैं। जबकि पर्यावरण के अजैविक संघटकों में निर्जीव तत्व और उनसे जुड़ी प्रक्रियाएं आती हैं, जैसे: पर्वत, चट्टानें, नदी, हवा और जलवायु के तत्व इत्यादि।
मनुष्यों द्वारा की जाने वाली समस्त क्रियाएं पर्यावरण को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। आज पर्यावरणीय समस्याएं जैसे प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन इत्यादि मनुष्य को अपनी जीवनशैली के बारे में पुनर्विचार के लिये प्रेरित कर रही हैं और अब पर्यावरण संरक्षण और पर्यावरण प्रबंधन की आवश्यकता महत्वपूर्ण हो चुकी है।मानव और पर्यावरण एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। पर्यावरण जैसे जलवायु प्रदूषण या वृक्षों का कम होना मानव शरीर और स्वास्थ पर सीधा असर डालता है। मानव की अच्छी आदतें जैसे वृक्षों को सहेजना, जलवायु प्रदूषण रोकना, स्वच्छता रखना भी पर्यावरण को प्रभावित करती है। मानव की बूरी आदतें जैसे पानी दूषित करना, बर्बाद करना, वृक्षों की अत्यधिक मात्रा में कटाई करना आदि पर्यावरण को बूरी तरह से प्रभावित करती है। जिसका नतीजा बाद में मानव को प्राकर्तिक आपदाओं का सामना करके भुगतना ही पड़ता है।
भौतिक विकास के पीछे दौड़ रही दुनिया ने आज इस कोरोनाकाल में जरा ठहरकर सांस ली तो उसे अहसास हुआ कि चमक-धमक के फेर में क्या कीमत चुकाई जा रही है। आज ऐसा कोई देश नहीं है जो पर्यावरण संकट पर मंथन नहीं कर रहा हो। भारत भी चिंतित है। लेकिन, जहांं दूसरे देश भौतिक चकाचौंध के लिए अपना सब कुछ लुटा चुके हैं, वहीं भारत के पास आज भी बहुत कुछ बाकी है।प्रकृति संरक्षण का कोई संस्कार अखण्ड भारत भूमि को छोड़कर अन्यत्र देखने में नहीं आता है।
हमारी पृथ्वी और उसके पर्यावरण की चिंता भारतीय संस्कृति की परंपरागत सोच रही है। हिन्दू धर्म में प्रकृति पूजन को प्रकृति संरक्षण के तौर पर मान्यता है। भारत में पेड़-पौधों, नदी-पर्वत, ग्रह-नक्षत्र, अग्नि-वायु सहित प्रकृति के विभिन्न रूपों के साथ मानवीय रिश्ते जोड़े गए हैं। पेड़ की तुलना संतान से की गई है तो नदी को मांं स्वरूप माना गया है।
ग्रह-नक्षत्र, पहाड़ और वायु देवरूप माने गए हैं। प्राचीन समय से ही भारत के वैज्ञानिक ऋषि-मुनियों को प्रकृति संरक्षण और मानव के स्वभाव की गहरी जानकारी थी। वे जानते थे कि मानव अपने क्षणिक लाभ के लिए कई मौकों पर गंभीर भूल कर सकता है। अपना ही भारी नुकसान कर सकता है। इसलिए उन्होंने प्रकृति के साथ मानव के संबंध विकसित कर दिए। ताकि मनुष्य को प्रकृति को गंभीर क्षति पहुंचाने से रोका जा सके। यही कारण है कि प्राचीन काल से ही भारत में प्रकृति के साथ संतुलन करके चलने का महत्वपूर्ण संस्कार है।  हिन्दू परंपराओं ने कहीं न कहीं प्रकृति का संरक्षण किया है। हिन्दू धर्म का प्रकृति के साथ कितना गहरा रिश्ता है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि दुनिया के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद का प्रथम मंत्र ही अग्नि की स्तुति में रचा गया है ।
हिन्दुत्व वैज्ञानिक जीवन पद्धति है। प्रत्येक हिन्दू परम्परा के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक रहस्य छिपा हुआ है। इन रहस्यों को प्रकट करने का कार्य होना चाहिए। हिन्दू धर्म के संबंध में एक बात दुनिया मानती है कि हिन्दू दर्शन ‘जियो और जीने दो’ के सिद्धांत पर आधारित है। यह विशेषता किसी अन्य धर्म में नहीं है। हिन्दू धर्म का सह अस्तित्व का सिद्धांत ही हिन्दुओं को प्रकृति के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है। वैदिक वाङ्मयों में प्रकृति के प्रत्येक अवयव के संरक्षण और सम्वद्र्धन के निर्देश मिलते हैं। हमारे ऋषि जानते थे कि पृथ्वी का आधार जल और जंगल है। इसलिए उन्होंने पृथ्वी की रक्षा के लिए वृक्ष और जल को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा है- ‘वृक्षाद् वर्षति पर्जन्य: पर्जन्यादन्न सम्भव: ‘ अर्थात् वृक्ष जल है, जल अन्न है, अन्न जीवन है। वृक्षों की रक्षा के लिए हमारे पूर्वजों ने देवताओं में त्रिदेव के समानांतर पर्यावरण पर सबसे सकारात्मक प्रभाव डालने वाले तीन वृक्षों की त्रिमूर्ति तैयार की और उन्हें काटना वर्जित कर दिया। ये तीन वृक्ष हैं – पीपल, बरगद और नीम। पीपल को ब्रह्म देव का, बरगद को शिव का और नीम को देवी दुर्गा का आवास बताकर उन्हें पूजनीय बनाया। औषधीय गुणों के कारण आंवले और शमी के वृक्ष और तुलसी के पौधे को पूज्य घोषित किया।
जंगल को हमारे ऋषि आनंददायक कहते हैं- ‘तेरे जंगल हमारे लिए सुखदाई हों । यही कारण है कि हिन्दू जीवन के चार महत्वपूर्ण आश्रमों में से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास का सीधा संबंध वनों से ही है। हम कह सकते हैं कि इन्हीं वनों में हमारी सांस्कृतिक विरासत का सम्वद्र्धन हुआ है। हिन्दू संस्कृति में वृक्ष को देवता मानकर पूजा करने का विधान है। वृक्षों की पूजा करने के विधान के कारण हिन्दू स्वभाव से वृक्षों का संरक्षक हो जाता है।
हमारे महर्षि यह भली प्रकार जानते थे कि पेड़ों में भी चेतना होती है। इसलिए उन्हें मनुष्य के समतुल्य माना गया है। उद्दालक ऋषि अपने पुत्र श्वेतकेतु से आत्मा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वृक्ष जीवात्मा से ओतप्रोत होते हैं और मनुष्यों की भाँति सुख-दु:ख की अनुभूति करते हैं। हिन्दू दर्शन में एक वृक्ष की मनुष्य के दस पुत्रों से तुलना की गई है-
घर में तुलसी का पौधा लगाने का आग्रह भी हिन्दू संस्कृति में क्यों है? यह आज सिद्ध हो गया है। तुलसी का पौधा मनुष्य को सबसे अधिक प्राणवायु ऑक्सीजन देता है। तुलसी के पौधे में अनेक औषधीय गुण भी मौजूद हैं। पीपल को देवता मानकर भी उसकी पूजा नियमित इसीलिए की जाती है क्योंकि वह भी अधिक मात्रा में ऑक्सीजन देता है।
देवों के देव महादेव तो बेल-पत्र और धतूरे से ही प्रसन्न होते हैं। यदि कोई शिवभक्त है तो उसे बेलपत्र और धतूरे के पेड़-पौधों की रक्षा करनी ही पड़ेगी।
वट पूर्णिमा और आंवला नवमी का पर्व मनाना है तो वटवृक्ष और आंवले के पेड़ धरती पर बचाने ही होंगे। सरस्वती को पीले फूल पसंद हैं। धन-सम्पदा की देवी लक्ष्मी को कमल और गुलाब के फूल से प्रसन्न किया जा सकता है। गणेश दूर्वा से प्रसन्न हो जाते हैं। हिन्दू धर्म के प्रत्येक देवी-देवता भी पशु-पक्षी और पेड़-पौधों से लेकर प्रकृति के विभिन्न अवयवों के संरक्षण का संदेश देते हैं।
जीवनदायिनी नदियों को देवी और मां तथा जलाशयों को देवताओं की क्रीड़ा-भूमि बताकर उनकी निर्मलता की रक्षा के प्रयास हुए।
जलस्रोतों का भी हिन्दू धर्म में बहुत महत्व है। ज्यादातर गांव-नगर नदी के किनारे पर बसे हैं। ऐसे गांव जो नदी किनारे नहीं हैं, वहां ग्रामीणों ने तालाब बनाए थे। बिना नदी या ताल के गांव-नगर के अस्तित्व की कल्पना नहीं है। हिन्दुओं के चार वेदों में से एक अथर्ववेद में बताया गया है कि आवास के समीप शुद्ध जलयुक्त जलाशय होना चाहिए। जल दीर्घायु प्रदायक, कल्याणकारक, सुखमय और प्राणरक्षक होता है। शुद्ध जल के बिना जीवन संभव नहीं है। यही कारण है कि जलस्रोतों को बचाए रखने के लिए हमारे ऋषियों ने इन्हें सम्मान दिया। पूर्वजों ने कल-कल प्रवाहमान सरिता गंगा को ही नहीं वरन सभी जीवनदायनी नदियों को मांं कहा है। हिन्दू धर्म में अनेक अवसर पर नदियों, तालाबों और सागरों की मांं के रूप में उपासना की जाती है।
हमारे उपनिषद में अन्न की अपेक्षा जल को उत्कृष्ट कहा गया है।  महान ज्ञानी ऋषियों ने धार्मिक परंपराओं से जोड़कर पर्वतों की भी महत्ता स्थापित की है। देश के प्रमुख पर्वत देवताओं के निवास स्थान हैं। अगर पर्वत देवताओं के वासस्थान नहीं होते तो कब के खनन माफिया उन्हें उखाड़ चुके होते। कैलाश पर्वत महाशिव की तपोभूमि है। हिमालय को तो भारत का किरीट कहा गया है। महाकवि कालिदास ने ‘कुमारसम्भवम्’ में हिमालय की महानता और देवत्व को बताते हुए कहा है- उत्तर दिशा में देवतात्मा हिमालय नाम का पर्वतराज है, जिसकी भुजाएं पूर्व और पश्चिम में समुद्रपर्यंत फैली हुई हैं और जो पृथ्वी के मानदंड की तरह स्थित है।
भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन की पूजा का विधान इसलिए शुरू कराया था क्योंकि गोवर्धन पर्वत पर अनेक औषधि के पेड़-पौधे थे, मथुरा-वृन्दावन सहित पूरे देश में दीपावली के बाद गोवर्धन पूजा धूमधाम से की जाती है।
इसी तरह हमारे महर्षियों ने जीव-जन्तुओं के महत्व को पहचानकर उनकी भी देवरूप में अर्चना की है। मनुष्य और पशु परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर हैं। सिंह, हाथी, सांप, गाय, बैल, घोड़ों, मछलियों, कछुओं सहित पशुओं की कई प्रजातियों को देवताओं का अवतार, वाहन या प्रिय बताकर उनके साथ हमारे सौहार्दपूर्ण रिश्ते बनाने की चेष्टाएं हुईं। पक्षी तो हमेशा से ही पर्यावरण के बैरोमीटर रहे हैं। जहां प्रकृति का सौंदर्य होता है, पक्षियों के गीत वहीं गूंजते हैं। पक्षी जिस जगह से दूरी बना लेते हैं, उसे अपवित्र और रहने लायक नहीं माना जाता। हमारी आदिवासी परंपराओं में मनुष्य और पक्षियों का सनातन रिश्ता आज भी क़ायम है। वहां जब तक पक्षियों का कलरव नहीं गूंजे, घर में किसी धार्मिक अनुष्ठान का आरंभ नहीं होता।
हिन्दू धर्म में गाय, कुत्ता, बिल्ली, चूहा, हाथी, शेर और यहां तक की विषधर नागराज को भी पूजनीय बताया है। प्रत्येक हिन्दू परिवार में पहली रोटी गाय के लिए और आखिरी रोटी कुत्ते के लिए निकाली जाती है। चींटियों को भी बहुत से हिन्दू आटा डालते हैं। चिडिय़ों और कौओं के लिए घर की मुंडेर पर दाना-पानी रखा जाता है। पितृपक्ष में तो कौए को बाकायदा निमंत्रित करके दाना-पानी खिलाया जाता है। इन सब परम्पराओं के पीछे जीव संरक्षण का संदेश है। हिन्दू गाय को माँ कहता है। उसकी अर्चना करता है। नागपंचमी के दिन नागदेव की पूजा की जाती है। नाग-विष से मनुष्य के लिए प्राणरक्षक औषधियों का निर्माण होता है। नाग पूजन के पीछे का रहस्य ही यह है। हमारी संस्कृति में देवों में प्रथम पूज्य गणेश की कल्पना प्रकृति और पर्यावरण के रूपक की तरह की गई है। गणेश का मस्तक हाथी का है। चूहे उनके वाहन हैं। बैल नंदी उनका मित्र और अभिभावक। मोर और सांप उनके परिवार के सदस्य। पर्वत उनका आवास है और वन क्रीड़ा-स्थल। उन्हें गढ़ने में नदी गंगा की भूमिका रही थी। गणेश का रंग हरा प्रकृति का और लाल शक्ति का प्रतीक है। महंगी पूजन सामग्रियों से नहीं, इक्कीस पेड़-पौधों की पत्तियों से उनकी पूजा होती है। जबतक इक्कीस दूबों की मौली समर्पित न की जाय, उनकी पूजा अधूरी मानी जाती है। कहा गया कि आम, पीपल और नीम के पत्तों वाली गणेश की आकृति प्रवेश द्वार पर लगाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
हिन्दू धर्म की विशेषता है कि वह प्रकृति के संरक्षण की परम्परा का जन्मदाता है। हिन्दू संस्कृति में प्रत्येक जीव के कल्याण का भाव है। हिन्दू धर्म के जितने भी त्योहार हैं, वे सब प्रकृति के अनुरूप हैं। मकर संक्रान्ति, वसंत पंचमी, महाशिवरात्रि, होली, नवरात्र, गुड़ी पड़वा, वट पूर्णिमा, ओणम्, दीपावली, कार्तिक पूर्णिमा, छठ पूजा, शरद पूर्णिमा, अन्नकूट, देव प्रबोधिनी एकादशी, हरियाली तीज, गंगा दशहरा आदि सब पर्वों में प्रकृति संरक्षण का पुण्य स्मरण है।
हमारे पूर्वजों ने पर्यावरण का महत्व समझा था और लोगों को उसके प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से असंख्य  मिथक और प्रतीक गढ़े। कालांतर में वे मिथक और प्रतीक हमारे आदर्श हो गए और उनके पीछे छुपे पृथ्वी और पर्यावरण को संरक्षित करने के उद्देश्य पीछे छूट गए। अपनी परंपराओं की अधकचरी समझ के कारण हमारी पृथ्वी और उसका पर्यावरण आज अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से जूझ रहे हैं। पर्यावरण के प्रति सचेत करने के उद्देश्य से   संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1972 से 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जाने लगा ।पर्यावरण दिवस का मुख्य उद्देश्य हमारी प्रकृति की रक्षा के लिए जागरूकता बढ़ाना और दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे विभिन्न पर्यावरणीय मुद्दों को देखना है।
प्रत्येक व्यक्ति अगर अपनी अपनी जिम्मेदारी समझे तो सभी प्रकार की कचरा ,गंदगी और बढ़ती आबादी के लिए स्वयं उपाय करके पर्यावरण संरक्षण में अपनी भागीदारी दे सकता है, लेकिन प्रगति के नाम पर पर्यावरण को मानव ने ही विकृत करने का प्रयास किया है, पर्यावरण व्यापक शब्द है जिसका सामान्य अर्थ प्रकृति द्वारा प्रदान किया गया समस्त भौतिक और सामाजिक वातावरण इसके अंतर्गत जल, वायु, पेड़, पौधे, पर्वत, प्राकृतिक संपदा सभी पर्यावरण सरक्षण के उपाए में आते है।  आज पर्यावरण का ध्यान रखना हर व्यक्ति का कर्तव्य और जिम्मेदारी है।
पर्यावरण सुरक्षा और उसमें संतुलन हमेशा बना रहे इसके लिए हमें जागरुक और सचेत रहना होगा। प्रत्येक प्रकार के हानिकारक प्रदूषण जैसे जल, वायु, ध्वनि, इन सब खतरनाक प्रदूषण से बचने के लिए अगर हमने धीरे-धीरे भी कोई उपाय करते रहें तो हमारी पृथ्वी की सुंदरता जो कि पर्यावरण है। उसे बचा सकते हैं और अपने जीवन को भी स्वस्थ और स्वच्छ रूप में प्राप्त कर सकते हैं पर्यावरण संरक्षण विश्व में प्रत्येक मनुष्य के लिए अनिवार्य रूप से घोषित करना चाहिए।  पर्यावरण है तो हमारा जीवन है।  हमारी भारतीय संस्कृति में प्रकृति संरक्षण एक महत्वपूर्ण कर्तव्य है। पेड़-पौधे, नदी-पर्वत, अग्नि-वायु सहित प्रकृति के विभिन्न रूप हमारे लिए वंदनीय हैं।
तो आइए,आज ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ पर अपनी प्राकृतिक संपदा के संरक्षण और संवर्धन हेतु हम सब संकल्पित हों।
विश्व पर्यावरण दिवस की शुभकामनाएं

4 विचार “पर्यावरण संरक्षण और हमारी भारतीय परम्पराएं&rdquo पर;

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