रानी दुर्गावती महल, मदन महल जबलपुर

रानी दुर्गावती जी के जन्मदिन पर विशेष…. 05 अक्टूबर

रानी दुर्गावती जी के बारे में कम जानने वालों में मैं भी शुमार हूँ । बचपन में जबलपुर शहर में रहते हुए भी मैं रानी दुर्गावती जी के विषय में ज्यादा नहीं जान पाई थी बस इतना ही पता था कि शहर में मदन महल क्षेत्र में रानी दुर्गावती का किला है ।
मदन महल का किला मैंने पहली बार 1976 में देखा था उसके बाद मुझे ये किला दोबारा देखने का मौका 2015 में कार्यालयीन यात्रा के दौरान मिला लेकिन इस वर्ष पदोन्नति पर जबलपुर पोस्टिंग होने के बाद अगस्त में मुझे एक बार फिर इसे देखने का अवसर प्राप्त हुआ ।
मदन महल किला उन शासकों के अस्तित्व का साक्षी है जिन्होंने यहां 11वीं शताब्दी में काफी समय के लिए शासन किया था।
राजा मदन सिंह द्वारा बनवाया गया यह किला एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। विश्व के सबसे छोटे किले दर्जे का हकदार है मदनमहल का किला….। किला इतनी उंचाई पर है .जिससे पूरा जबलपुर दिखाई पड़ता है…!! मदन शाह द्वारा निर्मित मदन महल नष्ट हो चुका है। वर्तमान में जो स्वरूप मौजूद है वह महल के पास बनाया गया वॉच टावर है, जो ऊंचाई पर होने के चलते देखरेख के काम आता था। मदन महल में कमरे हैं उंची छत है, इस मदन महल किले के पिछले कमरे में सुरंग भी है,जिसके बारे में कुछ कहा नही जा सकता कि यह सुरंग कहाँ जाकर खुलती है.. इस किले के चारों तरफ हरियाली और ग्रेनाइट की चट्टानें हैं। कई गुफाएं भी हैं, जो आकर्षण का केन्द्र हैं। यहां सुबह या फिर शाम को सूर्यास्त के समय का नजारा अद्भुत रहता है।

इस किले की जानकारी एकत्र करने पर पाया कि रानी दुर्गावती जन्म 5 अक्टूबर 1524 में उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले में कालिंजर के राजा कीर्तिसिंह चंदेल के यहाँ हुआ था। वे अपने पिता की इकलौती संतान थीं। दुर्गाष्टमी के दिन जन्म होने के कारण उनका नाम दुर्गावती रखा गया। नाम के अनुरूप ही तेज, साहस, शौर्य और सुन्दरता के कारण इनकी प्रसिद्धि सब ओर फैल गयी।

दुर्गावती चंदेल वंश की थीं और कहा जाता है कि इनके वंशजों ने ही खजुराहो मंदिरों का निर्माण करवाया था और महमूद गज़नी के आगमन को भारत में रोका था। लेकिन 16वीं शताब्दी आते-आते चंदेल वंश की ताकत बिखरने लगी थी।

दुर्गावती बचपन से ही अस्त्र-शस्त्र विद्या में रूचि रखती थीं। उन्होंने अपने पिता के यहाँ घुड़सवारी, तीरंदाजी, तलवारबाजी जैसे युद्धकलायों में महारत हासिल की। अकबरनामा में अबुल फज़ल ने उनके बारे में लिखा है, “वह बन्दुक और तीर से निशाना लगाने में बहुत उम्दा थीं। और लगातार शिकार पर जाया करती थीं।”

1542 में, 18 साल की उम्र में दुर्गावती की शादी गोंड राजवंश के राजा संग्राम शाह के सबसे बड़े बेटे दलपत शाह के साथ हुई। मध्य प्रदेश के गोंडवाना क्षेत्र में रहने वाले गोंड वंशज 4 राज्यों पर राज करते थे- गढ़-मंडला, देवगढ़, चंदा और खेरला। दुर्गावती के पति दलपत शाह का अधिकार गढ़-मंडला पर था।

दुर्गावती का दलपत शाह के साथ विवाह बेशक एक राजनैतिक विकल्प था। क्योंकि यह शायद पहली बार था जब एक राजपूत राजकुमारी की शादी गोंड वंश में हुई थी। गोंड लोगों की मदद से चंदेल वंश उस समय शेर शाह सूरी से अपने राज्य की रक्षा करने में सक्षम रहा।
1545 में रानी दुर्गावती ने एक बेटे को जन्म दिया, जिसका नाम वीर नारायण रखा गया। लेकिन 1550 में दलपत शाह का निधन हो गया। दलपत शाह की मृत्यु पर दुर्गावती का बेटा नारायण सिर्फ 5 साल का था। ऐसे में सवाल था कि राज्य का क्या होगा?

लेकिन यही वह समय था जब दुर्गावती न केवल एक रानी बल्कि एक बेहतरीन शासक के रूप में उभरीं। उन्होंने अपने बेटे को सिंहासन पर बिठाया और खुद गोंडवाना की बागडोर अपने हाथ में ले ली। उन्होंने अपने शासन के दौरान अनेक मठ, कुएं, बावड़ी तथा धर्मशालाएं बनवाईं। वर्तमान जबलपुर उनके राज्य का केन्द्र था। उन्होंने अपनी दासी के नाम पर चेरीताल, अपने नाम पर रानीताल तथा अपने विश्वस्त दीवान आधारसिंह के नाम पर आधारताल बनवाया।

रानी का प्रजा के प्रति व्यवहार इतना अच्छा था की प्रजा रानी के लिए कुछ भी कर सकती थी ,रानी का मदन महल में एक किला था जिसमें रानी अपने परिवार के साथ रहने आया करती थी |
रानी के राज में प्रजा इतनी खुश थी की स्वेच्छा से कर के रूप में रानी को हाथी, घोडे, सोने के सिक्के दिये जाते थे ,जब इस बात का पता उस वक़्त के बादशाह अकबर को पता चला तो उन्होंने रानी दुर्गावती को एक सोने का पिंजरा भेजा जिसका अर्थ था कि स्त्रियों को पिंजरे में कैद रहना चाहिए प्रजा संभालना उनका काम नहीं ,तब रानी ने इसके जवाब में अकबर को रुई धुनने का समान भेजा था जिससे अकबर रानी से बुरी तरह से नाराज़ हो गया था ।
अकबर ने रानी पर आक्रमण करने के लिए तीन बार बाज़ बहादुर को भेजा पर रानी तीनों बार विजयी रहीं..रानी का शौर्य और पराक्रम किसी से कम ना था ये रानी ने दिखा दिया था ।
जब कुछ समय पश्चात पुनः रानी पर आक्रमण किया तब आसफ खान ने रानी के पुत्र वीरनारायण की हत्या कर दी वीरनारायण की मृत्यु से रानी विचलित हो गयी और मुगलों द्वारा घेर ली गयी और रानी पर आक्रमण होने लगे तथा रानी घायल हो गयी ,तब रानी ने गुलाम बनना स्वीकार नहीं किया ,रानी नहीं चाहती थी कि कोई उसकी देह को हाथ भी लगाये ..तब रानी ने अपनी कटार निकाल कर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली । रानी दुर्गावाती जब तक जी सम्मान से जी . । 39 वर्ष की आयु में रानी ने 24 जून 1564 को अपने प्राण त्याग दिए थे ।
जबलपुर के पास जहां यह ऐतिहासिक युद्ध हुआ था, उस स्थान का नाम बरेला है, जो मंडला रोड पर स्थित है, वही रानी की समाधि बनी है, जहां गोंड जनजाति के लोग जाकर अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। जबलपुर में स्थित रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय भी इन्हीं रानी के नाम पर बना हुआ है।

इसके अलावा भारत सरकार ने साल 1988 में रानी दुर्गावती के सम्मान में एक पोस्टल स्टैम्प भी जारी किया था ।

रानी दुर्गावती की जीवन गाथा पढ़ने पर मैंने यह पाया कि रानी दुर्गावती और रानी लक्ष्मीबाई के शौर्य में कोई फर्क नहीं है दोनों का इतिहास गौरवशाली है..फर्क सिर्फ इतना है कि रानी दुर्गावती की लडाई मुगल साम्राज्य से थी और लक्ष्मीबाई जी की लडाई अँग्रेज़ों से थी..।रानी दुर्गावती के समय के इतिहासकार रानी दुर्गावती के विषय में इतिहासकारों ने अधिक वर्णन नहीं किया क्योंकि उस वक्त के इतिहास्कार अकबर के विरुद्ध नहीं लिख सकते थे । रानी दुर्गावती ,रानी लक्ष्मी बाई, रानी अवन्ती बाई लोधी इन तीनो रानियों के शौर्य में एक बात की समानता थी कि इन तीनों ने अपने स्वभिमान को सर्वोपरी रखा अपने आत्मसम्मान की रक्षा करते हुए तीनो ने गुलाम बनना स्वीकार ना करते हुए कटार स्वयं को मारकर अपने प्राण त्याग दिये ..।
रानी दुर्गावती उस वक्त के शक्तिशाली बादशाह से अपने स्वाभिमान और आत्मसम्मान के लिये लडी..यह लडाईयाँ बादशाह अकबर के अहम की थी क्योंकि रानी ने अकबर को यह बता दिया था कि वो मुगल साम्राज्य से लडने की हिम्मत रखती है । अकबर का रानी के हाथों इस तरह अपमानित होना युद्ध का कारण बना.।
इसे इत्तेफाक ही कह सकते हैं कि तीनों रानी की शौर्यगाथा एक सी है..।
रानी के शौर्य और पराक्रम के बारे में सुनकर मैं सोच में डूब गई कि उस वक्त की महिला इतनी सशक्त थी..और हम आज नारी सशक्तिकरण के लिये आवाज़ उठा रहे हैं जबकि नारी शताब्दियो से सशक्त ही रही है, जरुरत है तो बस नारी को अपनी शक्ति पहचानने की..!!
राज्य व धर्म की रक्षा के लिए रणभूमि को चुनकर अपने अदम्य साहस व शौर्य का परिचय देने वाली अमर वीरांगना रानी दुर्गावती जी की जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन 💐🙏।
अभी हाल में ही मदन महल को देखने जाने के दौरान लिए गए कुछ छायाचित्र …

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