वृक्ष माता’ सालूमरदा थिमक्का,

वृक्ष माता’ सालूमरदा थिमक्का,
सालूमरदा थिमक्का कर्नाटक की रहने वाली पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता हैं । इन्होने अपने जीवन में कुल आठ हजार पेड़ लगाये हैं। इसमें चार सौ पेड़ बरगद के शामिल हैं। उन पेड़ों को लगाकर उनकी देखभाल करते हुए उन्हें बड़ा किया है और आज वो फल भी दे रहे है और प्राणवायु ओक्सिजन भी।
थिमक्का का जन्म कर्नाटक के तुमकुरु जिले के गुब्बी तालुक में हुआ था। उनका विवाह कर्नाटक के रामनगर जिले के मगदी तालुक के हुलिकल गांव के निवासी चिककैया से हुआ था। उसने कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली और पास के खदान में एक आकस्मिक मजदूर के रूप में काम किया। उसकी शादी चिक्कैया से हुई थी जो एक मजदूर था लेकिन वे दुर्भाग्यवश उनके कोई संतान नहीं हुई । इनकी शादी के कई साल बाद तक इनके घर कोई संतान नहीं हुई। इससे परेशान और मानसिक रूप से तंग आकर इन्होने आत्महत्या करने का विचार किया। ये उस समय उम्र के चौथे दशक में थी और बच्चे की उम्मीद अब पूरी तरह से छोड़ चुकी थीं लेकिन इन्होने कुछ और सोचा और ये फैसला कर लिया की अब वो पेड़ों को अपनी संतान बनाएगी और ऐसी हजारो संताने उत्पन्न करेगी। फिर क्या था शुरू कर दिए पेड़ लगाने…. । उनके लिए इन्होने अपना जीवन समर्पित कर रखा है। थीमक्का सालूमदरा को अब तक कई सारे सम्मान मिल चुके हैं। प्रकृति के प्रति उनका लगाव देखते हुए थिमक्का  का नाम ‘सालूमरादा’ रख दिया गया. लगातार एक ही पंक्ति में कई सारे पेड़ लगाने के बाद इन्हें ये सम्मान मिला। 65 साल का ये सफ़र आज भी जारी है। इनके पति की मौत साल 1991 में हो गई थी लेकिन उसके बाद इनके अंदर और अधिक हिम्मत आ गई और इन्होने पेड़ लगाने शुरू कर दिए। इसके बाद इन्होने एक बेटा गोद लिया जिसका नाम इन्होने उमेश रखा है।
थिमक्का की कहानी धैर्य और दृढ़ संकल्प की कहानी है.। साल्लुमरदा थिमक्का को अब तक कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। उनको दिए गए पुरस्कारों पद्म श्री, राष्ट्रीय नागरिक पुरस्कार
इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्षमित्र पुरस्कार के साथ कई पुरस्कार दिए गए है ।

पर्यावरण की पुनर्कल्पना करें, फिर से बनाएं और पुनर्स्थापित करें…….

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यह आपकी दुनिया है, यह मेरी दुनिया है, यह हमारी दुनिया है.!! प्रकृति ..सबसे अविश्वसनीय उपहार जो हम सभी साझा करते हैं। जन और जीवन की रक्षा के लिए जल, जंगल, ज़मीन का संरक्षण और संवर्धन आवश्यक होता है। इन सभी का रक्षण-संवर्धन सरकार के साथ हम पर भी है। पेड़ों की कमी के कारण वर्षा भी अनियंत्रित व अनियमित हो रही है और विश्व भर में आ रहीं प्राकृतिक आपदाओं का मूल कारण भी यही है। बात सिर्फ जंगल के पेड़ों पौधे की भी नही है असली बात है जंगल के अंदर रह रहे असंख्य जीवों, उनके घरों और उनकी सांस्कृतिक समृद्धता की भी है। ध्यान में रखने योग्य बात यह है कि एक पेड़ 230 लीटर ऑक्सिजन एक दिन में वायुमंडल में छोड़ता है जो सात मनुष्यों को जीवन देने का काम करती है। वन्य पशु-पक्षियों जिनका जीवन ही जंगल हैं और जो मनुष्य के जैसे ही प्रकृति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यदि इसी प्रकार प्रकृति का दोहन होता रहा तो भविष्य में हमारी भावी पीढ़ियां कंधों पर आक्सीजन सिलेंडर लेकर चलेंगी। आक्सीजन की महत्ता हमने मार्च 2021 से प्रत्यक्ष रूप से देखी व भुगती है। सही मायनों में यदि वास्तविकता से जीवन को समझा जाए तो प्रकृति ने हमें जिस प्रकार जीवन दिया है और जीवन के बढ़ने के लिए प्राकृतिक भोजन हवा जल और पर्यावरण में अनेकों सहायक तत्व दिए हैं उनका स्थान मानव निर्मित कोई भी चीज नहीं ले सकती और जो व्यक्ति इस सत्य को समझ लेता है उसे किसी प्रकार के कृत्रिम रसायनों की आवश्यकता नहीं होती। हमारे पर्यावरण को बहाल करने और सुरक्षित रखने में सहायता प्रदान करने वाले कुछ उपायों को अपनी रोजमर्रा जिंदगी में शामिल करें, जैसे 1.वृक्षारोपण करके 2.पानी पर्याप्त मात्रा में उपयोग करके, व्यर्थ होने से बचाकर 3.ऊर्जा संरक्षण करके 4.जैव प्रदूषित कचरे और गैर-जैव प्रदूषित कचरे को अलग-अलग रखकर 5.वस्तुओं की recycling & reuse करके 6.सार्वजनिक परिवहन और कारपूलिंग का उपयोग करके 7.प्लास्टिक के उपयोग को कम करके विशेषकर एक बार में उपयोग आने वाली प्लास्टिक की तिलांजलि देकर 8. अंतिम लेकिन महत्वपूर्ण, पर्यावरण का सम्मान करना , उपरोक्त सभी कार्यों को हम अपनी दैनिक दिनचर्या का अंग बनाएं।आपने महसूस किया होगा कि पहाड़ी स्थलों या समुद्र तटों पर जितना आनंद हमें पहले प्राप्त होता था उतना अब नहीं होता कारण वही प्रकृति का दोहन । अगर हम अपने पर्यावरण की रक्षा करने और आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे संरक्षित करने में सक्षम नहीं हो पाए, तो वे हमसे प्रश्न करेंगी कि आपने पर्यावरण के खिलाफ खिलवाड़ क्यों किया, जिसने पृथ्वी की पारिस्थितिकी को ही बदल दिया। तो आइए बात करना और प्रकृति से लेना बंद करके देना और करना शुरू करें। सरल कदम स्थायी परिवर्तन ला सकते हैं। पर्यावरण संरक्षण एक ऐसा कार्य है जो प्रगति पर है,चलिए आज से ही शुरू करते हैं और जो शुरुआत कर चुके हैं वे उन सभी कार्यों को करना जारी रखते हैं । हममें से हर एक को स्वयंसेवी संस्थाओं या समुदाय द्वारा पर्यावरण संरक्षण के लिए उठाए जा रहे कदमों के प्रति (साप्ताहिक या मासिक जैसा सम्भव हो ) कुछ समय निकालना चाहिए। ये संगठन /समुदाय आज-कल पर्यावरण में आने वाली समस्याओं के बारे में जागरूकता फैलाने में सहायता कर रहे हैं। पर्यावरण की इस मुहिम में हमें अपनी इच्छा से शामिल होना बहुत जरूरी है, क्योंकि एक सुरक्षित और स्वच्छ वातावरण के बिना हमारा अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।
जल है तो जीवन है,
जीवन है तो पर्यावरण है,
पर्यावरण से ये धरती है,
और इस धरती से हम सब है।


पर्यावरण संरक्षण के लिए चिंतित न हों ,सक्रिय हों ।डरपोक नहीं,साहसी बनें,

🌍🌿🌿🌿🌿🌿विश्व पर्यावरण की शुभकामनाएं🌿🌿🌿🌿🌿🌎

बची रहे पृथ्वी…🌱🌱🌱

स्कूल में सिखाई जाने वाली एक बात मुझे आज याद आ रही है जब हमें सिखाया जाता था कि पृथ्वी की ऐसी ही स्थिति रही तो देखना एक दिन पानी भी खरीदना पड़ेगा तब हम सबने इस बात को मज़ाक में उड़ा दिया था लेकिन आज सचमुच बंद बोतल में पानी बिक रहा है और तो और आज तो उससे भी भयावह स्थिति से हम गुजर रहे हैं । जो हवा प्रकृति हमे निःशुल्क देती है वो हवा (आक्सीजन) भी अब बिकनी शुरु हो गई है लोग आक्सीजन सिलेंडर के लिए भाग रहे हैं …!! ये सब बातें इंगित करती हैं कि हम हर बीतते दिन के साथ जलवायु संकट से जूझ रहे हैं। ये दिवस हमें ये चेतावनी दे रहा है कि आज जिन समस्याओं से मानव जीवन गुजर रहा है वो भविष्य में और भयावह होंगी अगर हम धरा के प्रति सचेत न रहे तो सब कुछ धरा का धरा रह जायेगा |
आज एक कोरोना नामक बीमारी ने संसार की सम्पूर्ण मानव प्रजाति को हिला के रख दिया है ,सभी जगह ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए मारामारी हो रही है । इसी तरह कल अनेकों बीमारी जन्म लेंगी इसलिये अभी भी वक़्त है हम आने वाली पीढ़ियों के लिये सुखद अतीत बनें…..! पेड़ों की रक्षा करें, अपनी प्रवृत्ति प्रकृति के अनुरूप रखें, शाकाहारी बनें, जीवों पर दया करें….! असहायों की मदद करें ताकि वो जीने के काबिल बन सकें ।
विश्व पृथ्वी दिवस 2021 की थीम है – ‘Restore our Earth’ । इसका उद्देश्य है प्राकृतिक, हरित प्रौद्योगिकी और नवाचार के माध्यम से वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र को बहाल करना । हम सभी को हमारे ग्रह के लिए सकारात्मक कार्रवाई के लिए इस अभियान में अपनी भागीदारी करनी चाहिए। आइए, इस खास अवसर पर हम सब मिलकर भावी पीढ़ियों के लिए वातावरण को प्रदूषण मुक्त करने, अपने आस-पास सफाई रखने एवं धरती को हरी-भरी व सुंदर बनाने का संकल्प लें।
पृथ्वी को बचाने के लिए एक पेड़ जरूर लगाएं और कोशिश करें कि पीपल, बरगद, नीम,तुलसी और बांस के पेड लगाएं क्योंकि पीपल कार्बन डाई ऑक्साइड का 100% एबजार्बर है ,बरगद 80% तथा नीम 75% है । ऑक्सीजन बनाने का काम पेड़ की पत्तियां करती हैं जो एक घंटे में पांच मिलीलीटर ऑक्सीजन बनाती हैं। इसलिए जिस पेड़ में ज्यादा पत्तियां होती हैं वो पेड़ सबसे ज्यादा ऑक्सीजन बनाता है। पीपल का पेड़ अन्य पेड़ों के मुकाबले ज्यादा ऑक्सीजन देता है यह दिन में 22 घंटे से भी ज्यादा समय तक ऑक्सीजन देता है। हवा को फ्रेश करने में बांस का पेड़ काम आता है। अन्य पेड़ों के मुकाबले 30 फीसदी अधिक ऑक्सीजन छोड़ता है। नीम, बरगद, तुलसी के पेड़ भी अधिक मात्रा में ऑक्सीजन देते हैं। नीम, बरगद, तुलसी के पेड़ एक दिन में 20 घंटों से ज्यादा समय तक ऑक्सीजन का निर्माण करते हैं। बड, शीशम, पीपल, आम और सफेदा के वृक्ष भूमि जल संचयन के लिए लगाने चाहिए। बड़, शीशम, पीपल व आम इन पेड़ों की जड़ें भूमि में सीधी नीचे तक फैली होती है, जबकि सफेदे की जड़ भूमि की ऊपरी सतह तक होती है। इसलिए सफेदा की जड़ से पानी छन कर नीचे तक जाता है तथा बड़, शीशम, पीपल और आम की जड़ भूजल को बरकरार रखने के लिए सहायक होती है। यूकेलिप्टस और अन्य सजावटी वृक्ष लगाने से ये काफी मात्रा में जल भूमि से सोख लेते हैं, इन्हें कम लगाया जाना चाहिए । वातावरण को स्वच्छ और वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाने के लिए तुलसी और पीस लिली का पौधा घर में लगाना चाहिए।
जब हम इन जीवनदायिनी पेडों को ज्यादा से ज्यादा लगाएंगे तभी हम एक स्थायी भविष्य के लिए अग्रसर हो पाएंगे ।

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विश्व पृथ्वी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं….!!🌳🌲🌱🌴🌳🌲

पर्यावरण संरक्षण और हमारी भारतीय परम्पराएं

हम अगर हमारे चारों ओर देखें तो ईश्वर की बनाई इस अद्भुत पर्यावरण की सुंदरता देख कर मन प्रफुल्लित हो जाता है पर्यावरण की गोद में सुंदर फूल, लताएं, हरे-भरे वृक्ष और प्यारे चहचहाते पक्षी है, जो हमारे आकर्षण का केंद्र बिंदु है । आज मानव ने अपनी जिज्ञासा और नई नई खोज की अभिलाषा में पर्यावरण के सहज कार्यो में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया है जिसके कारण हमारा पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है।पर्यावरण  का मतलब है-जलवायु, स्वच्छता, प्रदूषण तथा वृक्ष । और ये सभी चीजें हमारे दैनिक जीवन से सीधा संबंध रखती है और उसे प्रभावित करती है। पर्यावरण के जैविक संघटकों में सूक्ष्म जीवाणु से लेकर कीड़े-मकोड़े, सभी जीव-जंतु और पेड़-पौधों के अलावा उनसे जुड़ी सारी जैव क्रियाएं और प्रक्रियाएं भी शामिल हैं। जबकि पर्यावरण के अजैविक संघटकों में निर्जीव तत्व और उनसे जुड़ी प्रक्रियाएं आती हैं, जैसे: पर्वत, चट्टानें, नदी, हवा और जलवायु के तत्व इत्यादि।
मनुष्यों द्वारा की जाने वाली समस्त क्रियाएं पर्यावरण को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। आज पर्यावरणीय समस्याएं जैसे प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन इत्यादि मनुष्य को अपनी जीवनशैली के बारे में पुनर्विचार के लिये प्रेरित कर रही हैं और अब पर्यावरण संरक्षण और पर्यावरण प्रबंधन की आवश्यकता महत्वपूर्ण हो चुकी है।मानव और पर्यावरण एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। पर्यावरण जैसे जलवायु प्रदूषण या वृक्षों का कम होना मानव शरीर और स्वास्थ पर सीधा असर डालता है। मानव की अच्छी आदतें जैसे वृक्षों को सहेजना, जलवायु प्रदूषण रोकना, स्वच्छता रखना भी पर्यावरण को प्रभावित करती है। मानव की बूरी आदतें जैसे पानी दूषित करना, बर्बाद करना, वृक्षों की अत्यधिक मात्रा में कटाई करना आदि पर्यावरण को बूरी तरह से प्रभावित करती है। जिसका नतीजा बाद में मानव को प्राकर्तिक आपदाओं का सामना करके भुगतना ही पड़ता है।
भौतिक विकास के पीछे दौड़ रही दुनिया ने आज इस कोरोनाकाल में जरा ठहरकर सांस ली तो उसे अहसास हुआ कि चमक-धमक के फेर में क्या कीमत चुकाई जा रही है। आज ऐसा कोई देश नहीं है जो पर्यावरण संकट पर मंथन नहीं कर रहा हो। भारत भी चिंतित है। लेकिन, जहांं दूसरे देश भौतिक चकाचौंध के लिए अपना सब कुछ लुटा चुके हैं, वहीं भारत के पास आज भी बहुत कुछ बाकी है।प्रकृति संरक्षण का कोई संस्कार अखण्ड भारत भूमि को छोड़कर अन्यत्र देखने में नहीं आता है।
हमारी पृथ्वी और उसके पर्यावरण की चिंता भारतीय संस्कृति की परंपरागत सोच रही है। हिन्दू धर्म में प्रकृति पूजन को प्रकृति संरक्षण के तौर पर मान्यता है। भारत में पेड़-पौधों, नदी-पर्वत, ग्रह-नक्षत्र, अग्नि-वायु सहित प्रकृति के विभिन्न रूपों के साथ मानवीय रिश्ते जोड़े गए हैं। पेड़ की तुलना संतान से की गई है तो नदी को मांं स्वरूप माना गया है।
ग्रह-नक्षत्र, पहाड़ और वायु देवरूप माने गए हैं। प्राचीन समय से ही भारत के वैज्ञानिक ऋषि-मुनियों को प्रकृति संरक्षण और मानव के स्वभाव की गहरी जानकारी थी। वे जानते थे कि मानव अपने क्षणिक लाभ के लिए कई मौकों पर गंभीर भूल कर सकता है। अपना ही भारी नुकसान कर सकता है। इसलिए उन्होंने प्रकृति के साथ मानव के संबंध विकसित कर दिए। ताकि मनुष्य को प्रकृति को गंभीर क्षति पहुंचाने से रोका जा सके। यही कारण है कि प्राचीन काल से ही भारत में प्रकृति के साथ संतुलन करके चलने का महत्वपूर्ण संस्कार है।  हिन्दू परंपराओं ने कहीं न कहीं प्रकृति का संरक्षण किया है। हिन्दू धर्म का प्रकृति के साथ कितना गहरा रिश्ता है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि दुनिया के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद का प्रथम मंत्र ही अग्नि की स्तुति में रचा गया है ।
हिन्दुत्व वैज्ञानिक जीवन पद्धति है। प्रत्येक हिन्दू परम्परा के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक रहस्य छिपा हुआ है। इन रहस्यों को प्रकट करने का कार्य होना चाहिए। हिन्दू धर्म के संबंध में एक बात दुनिया मानती है कि हिन्दू दर्शन ‘जियो और जीने दो’ के सिद्धांत पर आधारित है। यह विशेषता किसी अन्य धर्म में नहीं है। हिन्दू धर्म का सह अस्तित्व का सिद्धांत ही हिन्दुओं को प्रकृति के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है। वैदिक वाङ्मयों में प्रकृति के प्रत्येक अवयव के संरक्षण और सम्वद्र्धन के निर्देश मिलते हैं। हमारे ऋषि जानते थे कि पृथ्वी का आधार जल और जंगल है। इसलिए उन्होंने पृथ्वी की रक्षा के लिए वृक्ष और जल को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा है- ‘वृक्षाद् वर्षति पर्जन्य: पर्जन्यादन्न सम्भव: ‘ अर्थात् वृक्ष जल है, जल अन्न है, अन्न जीवन है। वृक्षों की रक्षा के लिए हमारे पूर्वजों ने देवताओं में त्रिदेव के समानांतर पर्यावरण पर सबसे सकारात्मक प्रभाव डालने वाले तीन वृक्षों की त्रिमूर्ति तैयार की और उन्हें काटना वर्जित कर दिया। ये तीन वृक्ष हैं – पीपल, बरगद और नीम। पीपल को ब्रह्म देव का, बरगद को शिव का और नीम को देवी दुर्गा का आवास बताकर उन्हें पूजनीय बनाया। औषधीय गुणों के कारण आंवले और शमी के वृक्ष और तुलसी के पौधे को पूज्य घोषित किया।
जंगल को हमारे ऋषि आनंददायक कहते हैं- ‘तेरे जंगल हमारे लिए सुखदाई हों । यही कारण है कि हिन्दू जीवन के चार महत्वपूर्ण आश्रमों में से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास का सीधा संबंध वनों से ही है। हम कह सकते हैं कि इन्हीं वनों में हमारी सांस्कृतिक विरासत का सम्वद्र्धन हुआ है। हिन्दू संस्कृति में वृक्ष को देवता मानकर पूजा करने का विधान है। वृक्षों की पूजा करने के विधान के कारण हिन्दू स्वभाव से वृक्षों का संरक्षक हो जाता है।
हमारे महर्षि यह भली प्रकार जानते थे कि पेड़ों में भी चेतना होती है। इसलिए उन्हें मनुष्य के समतुल्य माना गया है। उद्दालक ऋषि अपने पुत्र श्वेतकेतु से आत्मा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वृक्ष जीवात्मा से ओतप्रोत होते हैं और मनुष्यों की भाँति सुख-दु:ख की अनुभूति करते हैं। हिन्दू दर्शन में एक वृक्ष की मनुष्य के दस पुत्रों से तुलना की गई है-
घर में तुलसी का पौधा लगाने का आग्रह भी हिन्दू संस्कृति में क्यों है? यह आज सिद्ध हो गया है। तुलसी का पौधा मनुष्य को सबसे अधिक प्राणवायु ऑक्सीजन देता है। तुलसी के पौधे में अनेक औषधीय गुण भी मौजूद हैं। पीपल को देवता मानकर भी उसकी पूजा नियमित इसीलिए की जाती है क्योंकि वह भी अधिक मात्रा में ऑक्सीजन देता है।
देवों के देव महादेव तो बेल-पत्र और धतूरे से ही प्रसन्न होते हैं। यदि कोई शिवभक्त है तो उसे बेलपत्र और धतूरे के पेड़-पौधों की रक्षा करनी ही पड़ेगी।
वट पूर्णिमा और आंवला नवमी का पर्व मनाना है तो वटवृक्ष और आंवले के पेड़ धरती पर बचाने ही होंगे। सरस्वती को पीले फूल पसंद हैं। धन-सम्पदा की देवी लक्ष्मी को कमल और गुलाब के फूल से प्रसन्न किया जा सकता है। गणेश दूर्वा से प्रसन्न हो जाते हैं। हिन्दू धर्म के प्रत्येक देवी-देवता भी पशु-पक्षी और पेड़-पौधों से लेकर प्रकृति के विभिन्न अवयवों के संरक्षण का संदेश देते हैं।
जीवनदायिनी नदियों को देवी और मां तथा जलाशयों को देवताओं की क्रीड़ा-भूमि बताकर उनकी निर्मलता की रक्षा के प्रयास हुए।
जलस्रोतों का भी हिन्दू धर्म में बहुत महत्व है। ज्यादातर गांव-नगर नदी के किनारे पर बसे हैं। ऐसे गांव जो नदी किनारे नहीं हैं, वहां ग्रामीणों ने तालाब बनाए थे। बिना नदी या ताल के गांव-नगर के अस्तित्व की कल्पना नहीं है। हिन्दुओं के चार वेदों में से एक अथर्ववेद में बताया गया है कि आवास के समीप शुद्ध जलयुक्त जलाशय होना चाहिए। जल दीर्घायु प्रदायक, कल्याणकारक, सुखमय और प्राणरक्षक होता है। शुद्ध जल के बिना जीवन संभव नहीं है। यही कारण है कि जलस्रोतों को बचाए रखने के लिए हमारे ऋषियों ने इन्हें सम्मान दिया। पूर्वजों ने कल-कल प्रवाहमान सरिता गंगा को ही नहीं वरन सभी जीवनदायनी नदियों को मांं कहा है। हिन्दू धर्म में अनेक अवसर पर नदियों, तालाबों और सागरों की मांं के रूप में उपासना की जाती है।
हमारे उपनिषद में अन्न की अपेक्षा जल को उत्कृष्ट कहा गया है।  महान ज्ञानी ऋषियों ने धार्मिक परंपराओं से जोड़कर पर्वतों की भी महत्ता स्थापित की है। देश के प्रमुख पर्वत देवताओं के निवास स्थान हैं। अगर पर्वत देवताओं के वासस्थान नहीं होते तो कब के खनन माफिया उन्हें उखाड़ चुके होते। कैलाश पर्वत महाशिव की तपोभूमि है। हिमालय को तो भारत का किरीट कहा गया है। महाकवि कालिदास ने ‘कुमारसम्भवम्’ में हिमालय की महानता और देवत्व को बताते हुए कहा है- उत्तर दिशा में देवतात्मा हिमालय नाम का पर्वतराज है, जिसकी भुजाएं पूर्व और पश्चिम में समुद्रपर्यंत फैली हुई हैं और जो पृथ्वी के मानदंड की तरह स्थित है।
भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन की पूजा का विधान इसलिए शुरू कराया था क्योंकि गोवर्धन पर्वत पर अनेक औषधि के पेड़-पौधे थे, मथुरा-वृन्दावन सहित पूरे देश में दीपावली के बाद गोवर्धन पूजा धूमधाम से की जाती है।
इसी तरह हमारे महर्षियों ने जीव-जन्तुओं के महत्व को पहचानकर उनकी भी देवरूप में अर्चना की है। मनुष्य और पशु परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर हैं। सिंह, हाथी, सांप, गाय, बैल, घोड़ों, मछलियों, कछुओं सहित पशुओं की कई प्रजातियों को देवताओं का अवतार, वाहन या प्रिय बताकर उनके साथ हमारे सौहार्दपूर्ण रिश्ते बनाने की चेष्टाएं हुईं। पक्षी तो हमेशा से ही पर्यावरण के बैरोमीटर रहे हैं। जहां प्रकृति का सौंदर्य होता है, पक्षियों के गीत वहीं गूंजते हैं। पक्षी जिस जगह से दूरी बना लेते हैं, उसे अपवित्र और रहने लायक नहीं माना जाता। हमारी आदिवासी परंपराओं में मनुष्य और पक्षियों का सनातन रिश्ता आज भी क़ायम है। वहां जब तक पक्षियों का कलरव नहीं गूंजे, घर में किसी धार्मिक अनुष्ठान का आरंभ नहीं होता।
हिन्दू धर्म में गाय, कुत्ता, बिल्ली, चूहा, हाथी, शेर और यहां तक की विषधर नागराज को भी पूजनीय बताया है। प्रत्येक हिन्दू परिवार में पहली रोटी गाय के लिए और आखिरी रोटी कुत्ते के लिए निकाली जाती है। चींटियों को भी बहुत से हिन्दू आटा डालते हैं। चिडिय़ों और कौओं के लिए घर की मुंडेर पर दाना-पानी रखा जाता है। पितृपक्ष में तो कौए को बाकायदा निमंत्रित करके दाना-पानी खिलाया जाता है। इन सब परम्पराओं के पीछे जीव संरक्षण का संदेश है। हिन्दू गाय को माँ कहता है। उसकी अर्चना करता है। नागपंचमी के दिन नागदेव की पूजा की जाती है। नाग-विष से मनुष्य के लिए प्राणरक्षक औषधियों का निर्माण होता है। नाग पूजन के पीछे का रहस्य ही यह है। हमारी संस्कृति में देवों में प्रथम पूज्य गणेश की कल्पना प्रकृति और पर्यावरण के रूपक की तरह की गई है। गणेश का मस्तक हाथी का है। चूहे उनके वाहन हैं। बैल नंदी उनका मित्र और अभिभावक। मोर और सांप उनके परिवार के सदस्य। पर्वत उनका आवास है और वन क्रीड़ा-स्थल। उन्हें गढ़ने में नदी गंगा की भूमिका रही थी। गणेश का रंग हरा प्रकृति का और लाल शक्ति का प्रतीक है। महंगी पूजन सामग्रियों से नहीं, इक्कीस पेड़-पौधों की पत्तियों से उनकी पूजा होती है। जबतक इक्कीस दूबों की मौली समर्पित न की जाय, उनकी पूजा अधूरी मानी जाती है। कहा गया कि आम, पीपल और नीम के पत्तों वाली गणेश की आकृति प्रवेश द्वार पर लगाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
हिन्दू धर्म की विशेषता है कि वह प्रकृति के संरक्षण की परम्परा का जन्मदाता है। हिन्दू संस्कृति में प्रत्येक जीव के कल्याण का भाव है। हिन्दू धर्म के जितने भी त्योहार हैं, वे सब प्रकृति के अनुरूप हैं। मकर संक्रान्ति, वसंत पंचमी, महाशिवरात्रि, होली, नवरात्र, गुड़ी पड़वा, वट पूर्णिमा, ओणम्, दीपावली, कार्तिक पूर्णिमा, छठ पूजा, शरद पूर्णिमा, अन्नकूट, देव प्रबोधिनी एकादशी, हरियाली तीज, गंगा दशहरा आदि सब पर्वों में प्रकृति संरक्षण का पुण्य स्मरण है।
हमारे पूर्वजों ने पर्यावरण का महत्व समझा था और लोगों को उसके प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से असंख्य  मिथक और प्रतीक गढ़े। कालांतर में वे मिथक और प्रतीक हमारे आदर्श हो गए और उनके पीछे छुपे पृथ्वी और पर्यावरण को संरक्षित करने के उद्देश्य पीछे छूट गए। अपनी परंपराओं की अधकचरी समझ के कारण हमारी पृथ्वी और उसका पर्यावरण आज अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से जूझ रहे हैं। पर्यावरण के प्रति सचेत करने के उद्देश्य से   संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1972 से 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जाने लगा ।पर्यावरण दिवस का मुख्य उद्देश्य हमारी प्रकृति की रक्षा के लिए जागरूकता बढ़ाना और दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे विभिन्न पर्यावरणीय मुद्दों को देखना है।
प्रत्येक व्यक्ति अगर अपनी अपनी जिम्मेदारी समझे तो सभी प्रकार की कचरा ,गंदगी और बढ़ती आबादी के लिए स्वयं उपाय करके पर्यावरण संरक्षण में अपनी भागीदारी दे सकता है, लेकिन प्रगति के नाम पर पर्यावरण को मानव ने ही विकृत करने का प्रयास किया है, पर्यावरण व्यापक शब्द है जिसका सामान्य अर्थ प्रकृति द्वारा प्रदान किया गया समस्त भौतिक और सामाजिक वातावरण इसके अंतर्गत जल, वायु, पेड़, पौधे, पर्वत, प्राकृतिक संपदा सभी पर्यावरण सरक्षण के उपाए में आते है।  आज पर्यावरण का ध्यान रखना हर व्यक्ति का कर्तव्य और जिम्मेदारी है।
पर्यावरण सुरक्षा और उसमें संतुलन हमेशा बना रहे इसके लिए हमें जागरुक और सचेत रहना होगा। प्रत्येक प्रकार के हानिकारक प्रदूषण जैसे जल, वायु, ध्वनि, इन सब खतरनाक प्रदूषण से बचने के लिए अगर हमने धीरे-धीरे भी कोई उपाय करते रहें तो हमारी पृथ्वी की सुंदरता जो कि पर्यावरण है। उसे बचा सकते हैं और अपने जीवन को भी स्वस्थ और स्वच्छ रूप में प्राप्त कर सकते हैं पर्यावरण संरक्षण विश्व में प्रत्येक मनुष्य के लिए अनिवार्य रूप से घोषित करना चाहिए।  पर्यावरण है तो हमारा जीवन है।  हमारी भारतीय संस्कृति में प्रकृति संरक्षण एक महत्वपूर्ण कर्तव्य है। पेड़-पौधे, नदी-पर्वत, अग्नि-वायु सहित प्रकृति के विभिन्न रूप हमारे लिए वंदनीय हैं।
तो आइए,आज ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ पर अपनी प्राकृतिक संपदा के संरक्षण और संवर्धन हेतु हम सब संकल्पित हों।
विश्व पर्यावरण दिवस की शुभकामनाएं