दृढ़ निश्चय की शक्ति…..

Motivational Story

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(एक खिलाड़ी की कहानी ,जो अपंग होने के बाद कैसे बना दुनिया का सबसे तेज धावक)
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ग्लेन कनिंघम (Glenn Cunningham)
और उनके बड़े भाई फ्लॉएड जब स्कूल पढ़ते थे, तब उन्हें एक जिम्मेदारी दी गई। उनकी जिम्मेदारी थी कि वे सुबह स्कूल पहुंचकर स्कूल के कमरे को केरोसिन स्टोव जलाकर गर्म करें। उस समय ग्लेन की आयु आठ वर्ष थी। एक दिन किसी ने गलती से केरोसिन के कंटेनर में पेट्रोल डाल कर रख दिया। स्टोव जलाते ही कमरे में धमाका हुआ और आग लग गई।

फ्लॉएड और ग्लेन भी आग में बुरी तरह झुलस गए। फ्लॉएड की मृत्यु हो गई और वह बच तो गए लेकिन ग्लेन के शरीर का निचला हिस्सा बुरी तरह झुलस गया। डॉक्टर की टीम का कहना था कि अगर वह जीवित रहे, तो वह जीवन भर अपंग रहेंगे ।उनके पैरों को जहर से बचाने के लिए डॉक्टर ने उन्हें काटने का सुझाव दिया।
ग्लेन ने डॉक्टर का सुझाव ठुकरा दिया और बोले, ‘मैं इन्हीं पैरों से चलना शुरू करूंगा।’ डॉक्टर ग्लेन की बात सुनकर अचंभित हुए।
बहादुर लड़का मरना नहीं चाहता था और न ही वह अपंग बनना चाहता था। डॉक्टर की बहुत कोशिश के बाद वह बच गया।

लेकिन दुर्भाग्य से उसकी कमर से नीचे, उसके पास कोई हिलने की क्षमता बिल्कुल नहीं थी। उनके पतले पैर सिर्फ बेजान थे। इसलिए उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

Glenn Cunningham ने चलने का संकल्प ठान लिया था। घर में, जब वह बिस्तर पर नहीं होते थे, तो वह व्हीलचेयर तक ही सीमित थे। उनको ऐसी जिंदगी बिल्कुल पसन्द नही थी इसलिए एक दिन, Glenn Cunningham ने कुर्सी से खुद को नीचे गिरा दिया और अपने आप को घास के ऊपर खींचने लगे अपने हाथो के सहारे थे,और अपने पैरों को शरीर के पीछे खींच लिया। वो बाड़ तक पहुँच गये, अपने आप को ऊपर उठाया और फिर अपने हिम्मत को दांव पर लगाते हुए, उसने अपने आप को बाड़ के साथ घसीटना शुरू कर दिया।

उनका चलने का संकल्प पूरी तरह ठान रखा था। उन्होंने हर दिन ऐसा किया, क्योकि उनको खुद पर विश्वास था कि वह बिना सहारे खुद चल पाएगे। देखते ही देखते अपने दृढ़ता और अपने दृढ़ संकल्प के साथ, उन्होंने खड़े होने की क्षमता विकसित कर ली, फिर रुक-रुक कर चलने की, फिर खुद से चलने की और फिर दौड़ने की। इसके लिये उन्हें काफी महीने लगे।इसके बाद ग्लेन अपने पैरों को काम लायक बनाने के लिए वह सब कुछ करते, जो वह कर सकते थे।

फिर वे स्कूल भी खुद चल के जाने लगे जबकि उनका स्कूल घर से काफी दूरी पर था, उनको बहुत महीनो के बाद चलने की इतनी खुशी थी कि कई बार तो दोड़ते हुए स्कूल जाया करते थे। उन्होंने अपने स्कूल की रनिंग टीम में भाग लिया, कई बार असफल हुए लेकिन रुके नही। बारह साल की आयु में ही ग्लेन दौड़ने लगे और अपने स्कूल में तेज दौड़नेवाले धावक बन गए।
आखिर बहुत कोशिश के बाद उनका सलेक्शन हो गया और लगातार आगे कोशिश करते रहे और कई स्कूल लेवल के गेम जीते।बाद में कॉलेज में भी उन्होंने ट्रैक टीम में भाग लिया और राज्य लेवल तक जीते।
तेरह साल की आयु में उन्होंने पहली एक मील की रेस जीती। कंसास रिले में उन्होंने सबसे कम समय के साथ एक मील की दूरी तय कर विश्व रेकॉर्ड बनाया। 1932 में लॉस एंजलिस ओलिंपिक में हुई पंद्रह सौ मीटर की दौड़ में वह चौथे रहे। फरवरी 1934 में, न्यूयॉर्क शहर के प्रसिद्ध मैडिसन स्क्वायर गार्डन में, जिस युवा व्यक्ति के जीवित रहने की उम्मीद नहीं थी, जो निश्चित रूप से कभी किसी ने नहीं सोचा होगा , जिसके कभी भी चलने की उम्मीद तक नहीं थी – यह दृढ़ संकल्पित युवा व्यक्ति, डॉ ग्लेन कनिंघम, दुनिया का सबसे तेज धावक बन गया।
1936 के बर्लिन ओलिंपिक में उन्होंने पंद्रह सौ मीटर की रेस में सिल्वर जीता। इसके बाद उन्होंने पंद्रह सौ मीटर और एक मील की रेस में सात बार इंडोर का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया। आगे चलकर ग्लेन कनिंघम यूथ रांच की स्थापना की, जहां उन्होंने करीब दस हजार गरीब बच्चों का पालन-पोषण किया। अपने दृढ़ संकल्प से ग्लेन ने यह साबित कर दिया कि यदि जीने की इच्छा और कुछ करने की चाहत हो तो हर बाधा सीढ़ी बन जाती है।
Conclusion
स्वयं में सकारात्मक सोच और विश्वास की शक्ति का एक प्रतीक, ग्लेन कनिंघम कई लोगों के लिए प्रेरणा बन गए और उनकी कहानी, एक शानदार गवाही है कि कैसे कोई भी वापस जिंदगी जी सकता है जब सभी बाधाएँ आपके खिलाफ हो, फिर भी जीता जा सकता हैं। सिर्फ मौत ही बेहतर विकल्प नही होता।
जन्म: 4 अगस्त 1909
मृत्यु: 10 मार्च 1988
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प्रेरक कहानी…निस्वार्थ भलाई का कार्य….


एक आदमी को नाव पेंट करने के लिए कहा गया।
वह अपने साथ पेंट और ब्रश ले आया और नाव को एक चमकदार लाल रंग देना शुरू कर दिया, जैसा कि मालिक ने उसे निर्देशित किया था।

पेंटिंग करते समय, पेंटर ने देखा कि नाव में एक छोटा सा छेद है, तो उसने चुपचाप उसकी मरम्मत कर दी।

जब नाव की पेंटिंग समाप्त हो गई, तो उसने अपने पैसे प्राप्त किए और चला दिया।

अगले दिन, नाव का मालिक पेंटर के पास आया और उसे एक अच्छी राशि का चेक भेंट किया, जोकि पेंटिंग के लिए भुगतान की तुलना में बहुत अधिक था।
पेंटर आश्चर्यचकित हो गया और बोला “नाव को पेन्ट करने के लिए आपने मुझे पहले ही भुगतान कर दिया है सर!”

“लेकिन यह पेंट करने के लिए नहीं है। यह नाव में छेद की मरम्मत के लिए है।”

“आह! लेकिन वह इतनी छोटी सेवा थी … उसके लिए मुझे इतनी भारी राशि का भुगतान करने की आवश्यकता नहीं है।”

“मेरे प्यारे दोस्त, आप नहीं समझे। चलिए आपको बताते हैं कि क्या हुआ।
जब मैंने आपको नाव को पेंट करने के लिए कहा, तो मैं छेद के बारे में बताना भूल गया।
जब नाव सूख गई, तो मेरे बच्चे नाव लेकर मछली पकड़ने की यात्रा पर चले गए।
उन्हें नहीं पता था कि एक छेद था। मैं उस समय घर पर नहीं था।
जब मैं वापस लौटा और देखा कि वे नाव ले गए हैं, तो मैं हताश था क्योंकि मुझे याद आया कि नाव में छेद था।

मेरी राहत और खुशी की कल्पना कीजिए जब मैंने उन्हें मछली पकड़ने से लौटते हुए देखा।
फिर, मैंने नाव की जांच की और पाया कि आपने छेद की मरम्मत की थी! अब आप देखें, आपने क्या किया? आपने मेरे बच्चों की जान बचाई!
तो मेरे दोस्त उस महान कार्य के लिए तो ये पैसे भी बहुत थोड़े हैं …
मेरी औकात नहीं कि उस कार्य के बदले तुम्हे ठीक ठाक पैसे दे पाऊं …।

इसलिए कोई फर्क नहीं पड़ता कि कब, कहाँ या कैसे। बस मदद जारी रखें, लोगों के आंसू पोंछें, उन्हें ध्यान से सुनें और ध्यान से उन सभी ‘लीक’ की मरम्मत करें ।
जीवन मे “भलाई का कार्य” जब मौका लगे हमेशा कर देना चाहिए, भले ही वो बहुत छोटा सा कार्य ही क्यों न हो …क्योंकि कभी कभी वो छोटा सा कार्य भी किसी के लिए बहुत अमूल्य हो सकता है…।

✨इसलिए अच्छा काम करना जारी रखें

मैं उन सभी का शुक्रिया अदा करना चाहती हूँ जिन्होंने हर तरह से… शुभकामनाओं, विचार, प्रेम, देखभाल और प्रार्थना के रूप में मेरी नाव की मरम्मत की …🌹🙏

हम अपने रास्ते में आई कई छेद वाली नावों की मरम्मत लोगों को यह एहसास कराए बिना कि आपने कितने लोगों की जान बचाई है, कर सकते हैं और सदैव प्रयत्नशील रहें कि हम भी किसी की नाव रिपेयरिंग करने के लिए हमेशा तत्पर रहें…।