मदद-हमारा अधिकार भी,कर्तव्य भी….


आप मदद करना मत छोड़िए। ये जानते हुए भी कि आप जिसकी मदद करते हैं, वो आख़िर में आपका दुश्मन बन जाता है। लेकिन इससे क्या होता है? मदद करना एक आदत होती है। ऐसी आदत जिसमें सुकून है।

बाल गंगाधर तिलक ने एक अनाथ बच्चे को अपने पास रख कर उसे पाला, पढ़ाया और नौकरी तक में उसकी मदद की थी। वो बच्चा जब बड़ा हो गया, तो इस कुंठा में जीता था कि जीवन में उसने जो कुछ भी पाया, किसी की मदद से पाया है। ऐसे में जब वो तिलक से अलग रहने चला गया तो जब कभी मौका मिलता तिलक की बुराई करता। तिलक तक उसकी बातें पहुंचती थीं, पर तिलक कभी प्रतिक्रिया नहीं जताते थे।
उसके जाने के बाद तिलक के साथ कोई और रहने लगा। वो बच्चा को जो तिलक की मदद से सेटल हो चुका था, जब उसे पता चला कि तिलक के साथ कोई और रह रहा है, तो एक दिन तिलक के पास आया और बात-बात में उसने उनसे कहा कि बाबा, आप जिस व्यक्ति को अपने साथ रखे हैं, वो बाहर आपकी निंदा करता है।
तिलक मुस्कुराए। फिर उन्होंने कहा, “मेरी निंदा? पर क्यों? मैंने तो उसकी कोई मदद ही नहीं की। जब मैंने उसकी कोई मदद ही नहीं की तो वो मेरी निंदा भला क्यों करेगा?”

कहानियां सच होती हैं। वो होती ही इसलिए हैं ताकि हम जीवन को समझ पाएं। समझ पाएं कि आपके साथ जो हो रहा है, वो सिर्फ आपके साथ नहीं हो रहा। असल सच्चाई यही है कि जब भी आप किसी की मदद करते हैं तो मदद लेने वाला खुद को छोटा समझ कर आपके किए को स्वीकार नहीं करना चाहता। बस यहीं से शुरू होता है द्वंद्व। ये द्वंद्व कृत्घनता को जन्म देता है। आदमी शुक्रगुज़ार होने की जगह नाशुक्रा हो जाता है। मूल रूप से सच इतना ही है कि एक आदमी की मदद कीजिए, एक दुश्मन तैयार कीजिए।

“मदद पाने वाला अहसान के तले नहीं दबना चाहता, इसलिए आपके विरुद्ध होकर वो अहसान को नकारता है। अगर थोड़ा रंग-रोगन लगा कर बात कहूं तो मदद के बदले की जाने वाली शिकायत मूल रूप से किए गए अहसान का नकारात्मक विरोध भर है। पर इसका बुरा नहीं मानना चाहिए या बुरा लगे भी तो तिलक की तरह उसे भूल कर फिर किसी की मदद करने की कोशिश शुरू कर देनी चाहिए।
इस सच को जानते हुए भी बाद में शिकायत मिलेगी, अपमान मिलेगा। पर जैसा कि मैंने कहा है कि मदद ही सुकून है, तो तमाम तकलीफों के बाद भी मदद के हाथ बढ़ाना मत छोड़िेगा।
उसका किया उसके साथ। आपका किया आपके साथ।

हम एक दूसरे की मदद करते रहते हैं। मदद लेते भी हैं और करते भी हैं। मदद पाना हमारा अधिकार है और मदद करना हमारा कर्तव्य।
ईश्वर ने एक मदद बैंक बनाई है। आपके द्वारा की गई किसी को मदद उस मदद बैंक में जमा हो जाती है। जब आपको मदद की जरूरत होती है तो आपको उसी मदद बैंक से मदद मिल जाती है। ठीक बैंक की तरह, वह नोट आपको नहीं मिलेंगे, जो आपने जमा किये।
मेरा तो यही अनुभव रहा है, जब मदद की जरूरत पड़ी, नए मददगार सामने आ गए। वह नहीं आये, जिनकी मैंने मदद की थी।

“जो तोकूँ कॉटा बुवै, ताहि बोय तू फूल।
तोकूँ फूल के फूल हैं, बाकूँ है तिरशूल ।।”

हमें अपना मूल स्वभाव किसी भी परिस्थिति में नहीं छोड़ना चाहिये । इसी सन्दर्भ में लगातार साधु को बार-बार काटने वाले बिच्छू और उसे बार-बार बचाने वाले साधु की कहानी अत्यन्त लोकप्रिय है, जिसमें साधु कहते हैं कि जब बिच्छू अपना स्वभाव नहीं छोड़ता तो मैं कैसे छोड़ दूँ ?

इसका कारण हर कोई ढूँढना चाहता है, जो आज आपने अपनी कहानी में स्पष्ट कर दिया ।

इस संसार में सबको मदद लेनी और देनी पड़ती है । दूसरे को तो हम नहीं बदल सकते , कम से कम स्वयम् को कृतघ्नता के भाव से बचा सकें इसके लिये, संकल्प बद्ध होना चाहिये ।

अगर आप यश प्राप्ति की चाह में किसी की मदद करते हैं तो सही मानिए आप सहज स्वभाववश उसकी मदद नहीं कर रहे हैं बल्कि एक डील कर रहे हैं कि मैं तेरी सहायता कर रहा हूँ बदले में तू मेरे लिए यश इकट्ठा कर ।
और भाई , डील में तो नफा होता है तो नुकसान भी होता है कभी कभी फिर रोना काहे का ।
याद रखिये , सहायता तभी सार्थक है जब वो सहज स्वभाववश की जाती है । यश की इच्छा से की गई सहायता एक व्यसन ही है ।

दृढ़ निश्चय की शक्ति…..

Motivational Story

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(एक खिलाड़ी की कहानी ,जो अपंग होने के बाद कैसे बना दुनिया का सबसे तेज धावक)
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ग्लेन कनिंघम (Glenn Cunningham)
और उनके बड़े भाई फ्लॉएड जब स्कूल पढ़ते थे, तब उन्हें एक जिम्मेदारी दी गई। उनकी जिम्मेदारी थी कि वे सुबह स्कूल पहुंचकर स्कूल के कमरे को केरोसिन स्टोव जलाकर गर्म करें। उस समय ग्लेन की आयु आठ वर्ष थी। एक दिन किसी ने गलती से केरोसिन के कंटेनर में पेट्रोल डाल कर रख दिया। स्टोव जलाते ही कमरे में धमाका हुआ और आग लग गई।

फ्लॉएड और ग्लेन भी आग में बुरी तरह झुलस गए। फ्लॉएड की मृत्यु हो गई और वह बच तो गए लेकिन ग्लेन के शरीर का निचला हिस्सा बुरी तरह झुलस गया। डॉक्टर की टीम का कहना था कि अगर वह जीवित रहे, तो वह जीवन भर अपंग रहेंगे ।उनके पैरों को जहर से बचाने के लिए डॉक्टर ने उन्हें काटने का सुझाव दिया।
ग्लेन ने डॉक्टर का सुझाव ठुकरा दिया और बोले, ‘मैं इन्हीं पैरों से चलना शुरू करूंगा।’ डॉक्टर ग्लेन की बात सुनकर अचंभित हुए।
बहादुर लड़का मरना नहीं चाहता था और न ही वह अपंग बनना चाहता था। डॉक्टर की बहुत कोशिश के बाद वह बच गया।

लेकिन दुर्भाग्य से उसकी कमर से नीचे, उसके पास कोई हिलने की क्षमता बिल्कुल नहीं थी। उनके पतले पैर सिर्फ बेजान थे। इसलिए उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

Glenn Cunningham ने चलने का संकल्प ठान लिया था। घर में, जब वह बिस्तर पर नहीं होते थे, तो वह व्हीलचेयर तक ही सीमित थे। उनको ऐसी जिंदगी बिल्कुल पसन्द नही थी इसलिए एक दिन, Glenn Cunningham ने कुर्सी से खुद को नीचे गिरा दिया और अपने आप को घास के ऊपर खींचने लगे अपने हाथो के सहारे थे,और अपने पैरों को शरीर के पीछे खींच लिया। वो बाड़ तक पहुँच गये, अपने आप को ऊपर उठाया और फिर अपने हिम्मत को दांव पर लगाते हुए, उसने अपने आप को बाड़ के साथ घसीटना शुरू कर दिया।

उनका चलने का संकल्प पूरी तरह ठान रखा था। उन्होंने हर दिन ऐसा किया, क्योकि उनको खुद पर विश्वास था कि वह बिना सहारे खुद चल पाएगे। देखते ही देखते अपने दृढ़ता और अपने दृढ़ संकल्प के साथ, उन्होंने खड़े होने की क्षमता विकसित कर ली, फिर रुक-रुक कर चलने की, फिर खुद से चलने की और फिर दौड़ने की। इसके लिये उन्हें काफी महीने लगे।इसके बाद ग्लेन अपने पैरों को काम लायक बनाने के लिए वह सब कुछ करते, जो वह कर सकते थे।

फिर वे स्कूल भी खुद चल के जाने लगे जबकि उनका स्कूल घर से काफी दूरी पर था, उनको बहुत महीनो के बाद चलने की इतनी खुशी थी कि कई बार तो दोड़ते हुए स्कूल जाया करते थे। उन्होंने अपने स्कूल की रनिंग टीम में भाग लिया, कई बार असफल हुए लेकिन रुके नही। बारह साल की आयु में ही ग्लेन दौड़ने लगे और अपने स्कूल में तेज दौड़नेवाले धावक बन गए।
आखिर बहुत कोशिश के बाद उनका सलेक्शन हो गया और लगातार आगे कोशिश करते रहे और कई स्कूल लेवल के गेम जीते।बाद में कॉलेज में भी उन्होंने ट्रैक टीम में भाग लिया और राज्य लेवल तक जीते।
तेरह साल की आयु में उन्होंने पहली एक मील की रेस जीती। कंसास रिले में उन्होंने सबसे कम समय के साथ एक मील की दूरी तय कर विश्व रेकॉर्ड बनाया। 1932 में लॉस एंजलिस ओलिंपिक में हुई पंद्रह सौ मीटर की दौड़ में वह चौथे रहे। फरवरी 1934 में, न्यूयॉर्क शहर के प्रसिद्ध मैडिसन स्क्वायर गार्डन में, जिस युवा व्यक्ति के जीवित रहने की उम्मीद नहीं थी, जो निश्चित रूप से कभी किसी ने नहीं सोचा होगा , जिसके कभी भी चलने की उम्मीद तक नहीं थी – यह दृढ़ संकल्पित युवा व्यक्ति, डॉ ग्लेन कनिंघम, दुनिया का सबसे तेज धावक बन गया।
1936 के बर्लिन ओलिंपिक में उन्होंने पंद्रह सौ मीटर की रेस में सिल्वर जीता। इसके बाद उन्होंने पंद्रह सौ मीटर और एक मील की रेस में सात बार इंडोर का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया। आगे चलकर ग्लेन कनिंघम यूथ रांच की स्थापना की, जहां उन्होंने करीब दस हजार गरीब बच्चों का पालन-पोषण किया। अपने दृढ़ संकल्प से ग्लेन ने यह साबित कर दिया कि यदि जीने की इच्छा और कुछ करने की चाहत हो तो हर बाधा सीढ़ी बन जाती है।
Conclusion
स्वयं में सकारात्मक सोच और विश्वास की शक्ति का एक प्रतीक, ग्लेन कनिंघम कई लोगों के लिए प्रेरणा बन गए और उनकी कहानी, एक शानदार गवाही है कि कैसे कोई भी वापस जिंदगी जी सकता है जब सभी बाधाएँ आपके खिलाफ हो, फिर भी जीता जा सकता हैं। सिर्फ मौत ही बेहतर विकल्प नही होता।
जन्म: 4 अगस्त 1909
मृत्यु: 10 मार्च 1988
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आ अब लौट चलें..📘📒📙

यूनेस्कों ने 23 अप्रैल 1995 को इस दिवस को मनाने की शुरुआत की थी. पेरिस में यूनेस्को की एक आमसभा में फैसला लिया गया था कि दुनिया भर के लेखकों का सम्मान और श्रद्धांजली देने व किताबों के प्रति रुचि जागृत करने के लिए हर साल विश्व पुस्तक दिवस मनाया जाएगा ।
23 अप्रैल को वर्ल्ड बुक डे के रूप में मनाने की एक वजह ये भी है कि इस दिन कई प्रमुख लेखक या पैदा हुए थे या उनकी मृत्यु हो गई थी. विलियम शेक्सपियर, मिगुएल डे सर्वेंट्स और जोसेप प्लाया का 23 अप्रैल को निधन हुआ था जबकि मैनुएल मेजिया वल्लेजो और मौरिस ड्रून 23 अप्रैल के दिन पैदा हुए थे. 23 अप्रैल 1564 को एक ऐसे लेखक दुनिया से अलविदा हुए, जिनकी कृतियों का विश्व की लगभग सभी भाषाओं में अनुवाद किया गया है। जिसने अपने जीवन काल में करीब 35 नाटक और 200 से अधिक कविताएं लिखीं। यह लेखक थे शेक्सपीयर। साहित्य जगत में शेक्सपीयर का जो स्थान है उसे देखते हुए ही यूनेस्को ने 1945 से विश्व पुस्तक दिवस का आयोजन शुरू किया।भारत सरकार ने 2001 से इस दिन को मनाने की घोषणा की।

पिछले एक वर्ष से हम सब कोरोनाकाल होने के कारण ज्यादातर समय घर पर ही बिता रहे है और बाहर जाना सीमित करना पड़ा है। घर में हमारे पास हमारे सच्चे मित्र के रूप में किताबें जरूर मौजूद हैं जरूरत है तो बस उन्हे बुक शेल्फ़ के अंधेरे से निकाल कर, उनके साथ अपना समय व्यतीत करने की । यह समय पढ़ने के महत्व का जश्न मनाने का समय है।लॉकडाउन के इस अकेलेपन के समय में किताबें मनोरंजन के साथ जानकारी का अहम जरिया भी हैं तो आईये किताबों की ओर लौटें क्योंकि अभी पिछले कुछ सालों से किताबों पर संकट का समय चल रहा है। इसका कारण है पिछले दशकों में किताबों के विकल्प के तौर पर मोबाइल और इंटरनेट की तेजी से फ़ैल रही दृश्यात्मकता ने अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया है। यह बच्चों को ही नहीं, बड़ों को भी समाज से काटकर अकेला करता जा रहा है। इसके कारण हम में से कई लोग आसपास की दुनिया में दिलचस्पी खोने लगे हैं। बहुत सारे मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि हमारी आने वाली पीढ़ियों को अवसाद से बचाने के लिए उन्हें फिर किताबों की दुनिया में लौटने की जरुरत है। बच्चों की सोच और कल्पना-शक्ति को बढाने में बाल साहित्य बड़ी भूमिका होती है। यह हम सबका दायित्व है कि बच्चों को मोबाइल और टेलीविज़न के ज्यादा इस्तेमाल से बचाकर उन्हें अच्छी किताबों और शिक्षाप्रद कॉमिक्स की ओर मोड़ें। हम खुद उदाहरण प्रस्तुत करेंगे तो बच्चे निश्चित रूप से हमारा अनुकरण करेंगे।
सुना है किताबें आपको जीवन का दर्शन करवाने के साथ साथ आपको अपने आप से भी मिलवाती है, जैसे ही हम उन्हें अपनी बुक शेल्फ़ के अंधरे से निकालेंगे,वैसे ही वे हमारे जीवन के बहुत से अंधकार भरे रास्तों को उजालों से भर देंगी…..। वो कहते हैं ना कि हर एक दोस्त जरूरी होता है… किताबें बहुत अच्छी दोस्त होती हैं..हमारे अकेलेपन की साथी..हमारे एकांत की हमसफर..ये बेहद सुकून देती हैं… ….,!
तो आ अब लौट चलें…..किताबों की दुनिया की ओर📚📙

जब हम घिरे होते हैं अनिश्चितताओं से,
किताबें रास्ता बन जाती हैं
जब हम घिरे होते हैं डर से,
किताबें उम्मीद बन जाती हैं
जब हम होते हैं एकाकी
किताबें यार बन जाती हैं…!!

विश्व पुस्तक दिवस पर

रविन्द्र नाथ टैगोर…

जन्मदिवस विशेष…..

रवीन्द्रनाथ टैगोर विलक्षण प्रतिभा के व्यक्ति थे। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे एक साथ महान साहित्यकार, समाज सुधारक, अध्यापक, कलाकार एवं संस्थाओं के निर्माता थे । ऐसे महान शिक्षक, कहानीकार, चित्रकार, नाटककार, गायक,कवि और दार्शनिक गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर को उनके जन्मदिवस पर सादर प्रणाम!


रवींद्रनाथ टैगोर ने बहुत सी कविताएं , नाटक और कहानियां लिखी हैं उनमें से पोस्टमास्टर, स्वामी का पता ,अपरिचिता, भिखारिन और काबुलीवाला कहानियां आज भी हृदय पटल पर अंकित है।इन्हें आज भी पढ़कर आँखे नम हो जाती हैं । मैने इनको जितना पढा उसमें यह पाया है कि इनकी रचनाओं एवं जीवन दर्शन में मानव करूणा, गरीबी का महत्वपूर्ण स्थान है।उनकी नोबेल पुरस्कार प्राप्त काव्य रचना “गीतांजलि” ईश्वर के प्रति निष्ठा, प्रकृति प्रेम और मानवता वादी मूल्यों पर आधारित है ।

मेरी रक्षा करो विपत्ति में, मेरी यह प्रार्थना नहीं है ।
मुझे नही हो भय विपत्ति में, मेरी चाह यही है ।।
….गीतांजलि से बहुत सुंदर लाइनें ।


हालांकि कोई भी रचना अपने मूल स्वरूप में ही उत्कृष्ट होती है । इसे बांग्ल भाषा में लिखा गया परन्तु मैने इसे हिंदी अनुवाद स्वरूप में ही पढा है । इस उत्कृष्ट रचना को पढ़कर मन आध्यात्मिक हो जाता है । इसके अलावा रवींद्रनाथ टैगोर जी के द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन के समय सुउद्देश्यपूर्ण लिखित अंग्रेज़ी कविता जिसमे स्वाधीनता की सार्थकता बताते हुए नए भारत की तस्वीर रखी गई थी, वह आज के परिपेक्ष्य में भी अपना स्थान रखती है ।


Where the mind is without fear.

and the head is held high,

where knowledge is free.

Where the world has not been broken up

into fragments by narrow domestic walls.


Where words come out from the depth of truth


Where tireless striving stretches its arms towards perfection


Where the clear stream of reason has not lost its way


Into the dreary desert sand of dead habit


Where the mind is led forward by thee


Into ever-widening thought and action


Into that heaven of freedom, my Father, let my country awake.


कवि और लेखकों का यह कर्तव्य और उत्तरदायित्व होता है कि वो जनमानस को उत्थान की ओर उन्मुख करें ।टैगोर जी का जीवन भी इसी दिशा में समर्पित था ।
आज उनके जन्मदिवस के अवसर पर सादर नमन और श्रद्धान्जलि अर्पित करती हूं

07.05.2020