पिता…..


सिर पर रखी मज़बूत हथेली की मीठी सी थपकी….!!
हमारे जीवन में पिता का महत्व बेहद खास होता है । मां तो हमेशा अपने प्यार को दर्शा देती है, लेकिन ऊपर से सख्त रहने वाले पिता बहुत कम ही मौकों पर अपना प्यार दिखाते हैं । हम सब के लिए पिता नारियल की तरह होते हैं, जो ऊपर से सख्त और अंदर से काफी नर्म होते हैं । में ये बात अपनी पीढ़ी की कर रही हूँ क्योंकि आजकल के पिता ऊपर से भी नरम हो गए हैं और प्यार भी दर्शाते हैं । हमारे बच्चों के पिता इसी श्रेणी के हैं ।
पिता पर लिखना मतलब अपने अंतर्मन की भावनाओं को खगालना और छिपी हुई स्नेह वाली स्याही को कलम से उकेरना ।
पिता तो वह आईना है जो हमें हमारा प्रतिबिंब दिखाता है, जो कभी झूठ नहीं बोलता, हमें हमारी कमियां दिखाता है, हमें हमसे मिलवाता है। पिता गीता के वो श्लोक हैं, जिन्हें पढ़ते तो सब है, समझते कम ही लोग है……!!
आज मैं आपसे उन्हीं पिता के बारे में बात करूंगी जिनके बारे में बहुत कम कहा जाता है। मां अगर प्यार की बहती नदी है तो पिता उस नदी पर सब्र और शांति का बांध हैं। नदी के प्रवाह में बहना हमें अच्छा लगता है पर बांध की अहमियत तब पता चलती है जब बांध में दरारें पड़ जाती हैं और हम लड़खड़ा जाते हैं। पिता नारियल की तरह है अंदर से कोमल और बाहर से सख्त परंतु लाभदायक। वह एक पेड़ की तरह है जो खुद तो वर्षा और कड़कती धूप में खड़ा रहता है पर हमें छाया और रक्षण देता है। वह चंद्र के समान हमें शीतलता प्रदान करते हैं और सूर्य के समान हमें संसार के हर उजाले से अवगत कराते हैं ,परंतु हमें तो सिर्फ उनकी डांट और फटकार दिखाई देती है उनका प्यार और समर्पण नहीं। जब आप अपना प्रारम्भिक जीवन अपने माता पिता के साथ जीते हो तो कई घटनाओं और बिताए हुए पलों की स्मृतियाँ आपके दिल और दिमाग में अंकित होती जाती हैं । तब हम उन पलों की अहमियत बिल्कुल भी नहीं समझते । पर जैसे जैसे हम हमारे माता पिता के बिना जीवन जीना शुरू करते हैं तो वे स्मृतियाँ कदम कदम आ खड़ी होती हैं जो उनकी मधुर याद दिलाती हैं और मार्गदर्शक भी बनती है ।
मुझे लगता है जीवन क्या है स्मृतियों से भरी एक किताब ही तो है । उस किताब के पन्नों में हमारे बचपन से लेकर आज तक की जीवन यात्रा के विभिन्न पड़ाव की यादें ही तो दर्ज है । इस किताब में से यदि हम
जीवन में हमें मिले संस्कारो को याद करें तो उस कड़ी में सबसे पहले माँ बाप ही याद आते हैं ।
जब हम बड़े हो रहे होते हैं तो हमें उस वक्त पता ही नहीं चलता कि कितने संस्कार हम प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सीख रहे होते हैं । अप्रत्यक्ष संस्कार हमारे जीवन में गहरा प्रभाव डालते हैं । ये बात हमें तब समझ आती है जब हम हमें कोई संस्मरण याद आता है अथवा उन्हीं परिस्थितियों में अपने को पाते हैं । इस बिन्दु पर भूमिका बनाने के पीछे मेरा इशारा मेरे पिता से सीखी गई बातों और संस्कारों से था । मेरे पिता बहुत ही खुले विचारों के थे । मैंने मेरे जीवन मे कभी भी उनको संकुचित विचारधारा और रूढ़िवादी टाइप महसूस ही नहीं किया । घर के बेसिक नियमों के अलावा मैंने उनको हम पर कोई बंधन लगाते नहीं देखा । रक्षात्मक व्यवहार न होने के कारण हम सभी भाई बहन डरपोक नहीं बने । मुझे याद आता है कि जब हम छोटे थे तब मैंने यह पाया कि मेरे पिताजी को किताबें पढ़ने का बहुत शौक था और उन्होंने घर में एक लाइब्रेरी बना रखी थी उस लाइब्रेरी में बहुत सारी माइथोलॉजीकल किताबें ,ज्योतिष की किताबें होती थी । उनकी लाइब्रेरी के कलेक्शन में रामायण, महाभारत ,सत्यार्थ प्रकाश, योगी की आत्मकथा और रामकृष्ण परमहंस,विवेकानंद जी आदि की बहुत सारी किताबें थी । गर्मियों की छुट्टियों में पिताजी हम लोगों के लिए विक्रम बेताल, चाचा चौधरी, साबू और ढेर सारी अमर चित्र कथाएं लेकर आते थे ।हम छुट्टियों में इन सबकी कहानियां पढ़ते थे ।आज समझ आता है उन्होंने कभी नहीं कहा कि किताबें पढ़ो पर घर पर किताबें लाकर रखना और उन्हें खुद के द्वारा पढा जाना उनके द्वारा दिया गया अप्रत्यक्ष संस्कार था । मैंने हमेशा उनको अपने घर वालों को कितनी ही बार वित्तीय सहायता करते देखा और उसके बाद न कभी उसका गुणगान किया और न ही कभी उसके बदले घर वालों से कुछ आशा रखी। इस कारण मैने कई बार महसूस किया कि घर में आर्थिक तंगी भी हो जाती थी । व्यक्तिगत जीवन में भी वे कभी किसी से कोई आशा रखते थे और न ही किसी पर आश्रित भाव रखते थे । एक और बात जो मैंने उनसे सीखी कि आपके पास जितना है उतना पर्याप्त है यानी संतुष्ट प्रवर्त्ति के इंसान थे । मुझे उनका व्यावसायिक जीवन भी देखने का मौका मिला तो मैंने पाया कि उनमें अपने साथ के लोगों के लिए जरा भी ईर्ष्याभाव न था मैंने उनको कभी किसी की बुराई करते नहीं देखा ।काम के प्रति समर्पण भी गजब का था ।
उन्होंने व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन में कभी किसी का बुरा नहीं किया ।इसके कारण मैने पाया कि उन्हें बहुत चैन की नींद आती थी । आत्म अनुशासन भी गजब का था । मैंने उनको कभी सुबह 7 बजे तक सोते नहीं देखा । 60 वर्ष की आयु तक कभी बीमार होते नही देखा ।
ऊपर उल्लिखित बाते बताने के पीछे मेरा आशय ये था कि ये सब बातें उन्होंने हमें कह कर नहीं सिखाई पर अपने व्यवहार में लाई और उनके व्यवहार से हमने यह सीखा कि ईमानदारी,आत्म अनुशासन से रहो ।
ज़रूरत पड़ने पर हमेशा लोगों की मदद करो, किसी का भला करो तो उसके बदले कोई आशा मत रखो । अपनी सन्तुष्ट होने की प्रवृत्ति रखो । किसी का बुरा मत करो और न ही किसी के लिए बुरा बोलो । हमेशा सकारात्मक रहो और खुश रहो। किताबें हमारी मित्र हैं, पथ प्रदर्शक हैं ।
मैंने उनके द्वारा अपनाई फिलॉसफी को अपने जीवन मे भी उतारने की कोशिश की और पाया कि अगर आपका दिल साफ है। आप किसी का बुरा नही करते हो तो आपके साथ भी बुरा नहीं होगा । आप लोगो की भलाई करो ज़रूरत पड़ने पर मदद करो तो जब आपको ज़रूरत पड़ेगी तो ईश्वर किसी न किसी के माध्यम द्वारा आपकी भी मदद करेगा । आज उनका हमारे बीच न होना बड़ा सालता है मुझे । बहुत जल्दी इस दुनिया को अलविदा कह दिया । कितनी ही बातें थी जो में जीवन की आपाधापी में कह नहीं पाई,पर कहना चाहती थी । कहते हैं न ..इंसान के जाने के बाद ही उसकी कदर होती है । पिता के होने का महत्व उनके जाने के बाद ही ज्यादा समझ आया है । बहुत याद आते हो पापा ।
यूँ तो हमारी सभ्यता में माता-पिता का दर्जा ईश्वर से भी ऊँचा है। इस जीवन यात्रा के तमाम रास्तों पर अपने मज़बूत कंधों का सहारा देने और मनुष्यता का पाठ पढ़ाने वाले पिताजी को इस विशेष अवसर पर असंख्य प्रणाम…!


आज के युग में हम राम और श्रवण तो नहीं बन सकते पर अपने जन्मदाता के थकते कंधों को सहला सकते हैं, उनके कांपते हाथों को थाम सकते हैं और कह सकते हैं …..हम हैं । तभी सही मायने में हम फादर्स डे को सार्थक कर पाएंगे ।

#fathers day #love #पिता # फादर्स डे

रामायण सीरियल का पुनः प्रसारण…

हरि अनन्त, हरि कथा अनन्ता।

कहहिं, सुनहिं, बहुबिधि सब संता।।

दूरदर्शन द्वारा 33 वर्षों बाद लॉकडाउन अवधि में रामायण सीरियल का पुनः प्रसारण किया गया । लॉकडाउन के 40 दिन कैसे निकल गए पता ही नही चला। पूरी दिनचर्या प्रसारण समय के अनुसार सेट हो गई । उत्तर रामायण के सभी एपिसोड रिपीट किए गए वो सभी रिपीट एपीसोड भी उतनी ही शिद्दत के साथ देखे और हमेशा ऐसा लगता रहा कि इसका प्रसारण अनवरत चलता रहे । सीरियल खत्म होने पर मन बहुत भावविभोर हो रहा है ।
रामायण को तब और अब देखने में बहुत बड़ा फर्क लगा वो यूँ कि तब मैं कॉलेज में पढ़ रही थी और संस्कृति की इतनी समझ भी न थी । अभी भी सब वही है पर उम्र के साथ देखकर समझने , आत्मसात करने की क्षमता बढ़ गई है । कुछ प्रसंग और पात्र जैसे पुष्प वाटिका में सीता जी का राम को देखने जाना, रामविवाह, केवट प्रसंग, निषादराज, भरत मिलाप, पुष्पक विमान में सीता हरण के वक्त जटायु द्वारा बचाने का प्रयास , लक्ष्मण और हनुमान जी की भक्ति, वाल्मीकि आश्रम में सीता जी का रहना,लव कुश तो मानस पटल पर सदा के लिए अंकित हो गए ।इसके साथ ही मेघनाद, कुम्भकर्ण के पात्रों ने भी छाप छोड़ी।
आज लव कुश द्वारा भगवान श्रीराम जी के समक्ष एक गीत के माध्यम से रामायण का कुछ भाग और अपना परिचय देने का जो सजीव चित्र रखा गया उसने आंखे सजल कर दी …. !! इस अत्यन्त भावुक कर देने वाले दृश्य के साथ ही धारावाहिक “रामायण” का अन्त हुआ लेकिन अपने पीछे छोड़ गया
एक ‘पाठ’ ……
पाठ हमारी संस्कृति का ,
धर्म का ,मर्यादा का ,
परम्परा का ,मान सम्मान का , आचरण का …..!!
हमारी सम्पूर्ण शिक्षा का सार हमारे रामायण महाकाव्य में है । रामानंद सागर जी ने टीवी सीरियल के जरिए जिस प्रकार जन जन तक इसे पहुंचाने का काम किया वह बेहद सराहनीय है । सागर जी ने हर एक पात्र को सांचे में ढालकर बहुत ही गज़ब प्रस्तुति दी है ।रामायण का ऐसा सुंदर फिल्मीकरण दोबारा कभी नहीं हो सकता। आज बेहतर तकनीक है और भी कई चीजें बेहतर है 1987 की तुलना में सब कुछ बेहतर है लेकिन आज आपको न तो पात्रों के चयन के लिए अरुण गोविल मिलेंगे, न दीपिका चिखलिया मिलेंगी… न दारा सिंह और न अरविन्द त्रिवेदी… न सुनील लाहिरी और न विजय अरोड़ा… न ललिता पवार और न ही रवीन्द्र जैन मिलेंगे… और भी जाने क्या-क्या रामायण के इस रूप के साथ सम्पूर्ण है… इसे बेहतर करने की कोशिश इसे खराब करना ही होगी…।
आज रामायण सीरियल तो खत्म हुआ पर लॉक डाउन के इस समय में रामायण का आना और नई पीढ़ी द्वारा भी इस रामायण को देखना, इससे हमारी नई पीढ़ी भी बहुत लाभान्वित हुई । साथ ही यह सीरियल नयी युवा पीढ़ी के लिए यह एक जिम्मेदारी भी छोड़ गया है , जिम्मेदारी……..
अपनी संस्कृति को इसी प्रकार बनाए रखने की …
धर्म, परम्परा ,मान मर्यादा , प्रतिष्ठा को समझने की …
उसी के अनुकूल अपना आचरण करने की …..
आने वाली पीढ़ियों को सनातन संस्कृति के इस मार्ग पर चलने की …..।
जैसे घर को साफ रखने के लिये नित्य ही झाडू-पोछा करना पडता है अन्यथा कुछ ही दिनों में घर धूल-धक्कड से भर जाता है वैसे ही मानव मस्तिष्क को सदैव परिष्कृत करते रखने की आवश्यकता होती है जिसके लिये अच्छा देखना,सुनना और पढना बहुत आवश्यक होता है । रामायण देखकर एक बार फिर उच्च आदर्शों के साथ जीवन जीने की प्रेरणा मिली ।
धन्यवाद दूरदर्शन को जिसने इस विपदा के समय सभी भारतीयों को साक्षात श्री राम के सम्पूर्ण जीवन का दर्शन कराया । उम्मीद है समय-समय पर यूँ ही पुनः प्रसारण होता रहेगा ताकि हमें अपने जीवन में इसका सदैव स्मरण रहे ।
धन्यवाद पूरी रामायण की टीम को जिनके द्वारा प्रभु राम , माता सीता एवं अन्य का साक्षात रुप धारण कर आलौकिक दर्शन कराया ।
धन्यवाद श्री अरुण गोविल जी को भी, जिन्होंने अपने पेज पर रामायण के हर एपिसोड के प्रसारण के बाद उस एपिसोड की 5 मिनिट की विवेचना में उस एपिसोड का सार और उसमे निहित अर्थ बताए । जिससे सीरियल देखने में और रोचकता बढ़ी और समझने में सरलता आई।
रामायण भारतीय संस्कृति का सबसे मजबूत और प्रामाणिक दस्तावेज है। इस दस्तावेज़ को रामानंद सागर जी द्वारा धाराविक रूप में चित्रण करना वाकई प्रेरणादायक है और इसकी सजीव छाया हमारे मन में हमेशा जिंदा रहेगी ।
03.05.2020 ऋतु नायक