डाकिया डाक लाया…….

आज विश्व डाक दिवस है।।।

विश्व डाक दिवस के अवसर पर….

डाकिया डाक लाया…..✉️ 💌

“”मै कुशलपूर्वक हूं, भगवान से आपकी कुशलता की कामना करता हूँ ।””
“”थोड़ा लिखे को बहुत समझना “”
“”अत्र कुशलम तत्रास्तु””
“”आपके पत्र के इंतज़ार में””
ये होते थे पत्रो के कुछ आम शब्द …

कभी कबूतरों ने संदेश पहुंचाए थे। फिर यह काम डाकियों ने किया। जिस घर के लोग परदेशी हुआ करते थे, उन घरों के बड़े – बूढों, ब्याह कर आई दुल्हनों को डाकिए का इंतजार घर की चौखट पर बैठ कर बड़ी शिद्दत से होता था। तब कुशलता जानने का यही माध्यम होता था । अंतर्देशीय पत्रों, पोस्टकार्डों, लिफाफों से रिश्तेदारों के यादों की, उनके चिरंजीवी आर्शीवादों की वो कैसी भीनी भीनी खुशबू आती थी!!!!!

सीधा-साधा डाकिया जादू करे महान,
एक ही थैले में भरे आंसू और मुस्कान

एक डाकिए पर बहुत गाँवों की जिम्मेदारी होती थी, सभी उसका बेसब्री से इंतजार करते थे, जब कोई पत्र आता था तो त्यौहार जैसा माहौल हो जाता था। चिट्ठियों को लोग सहेज कर रखते थे। अपने प्रियजनों की चिट्ठियों को सहेज कर रखना और पुरानी यादों को फिर ताजा करना बहुत ही सरल था।
जिनके घर के सदस्य बाहर नौकरी करते थे उनके द्वारा भेजी गई धनराशि भी मनीआर्डर से आती थी।
अगर हम मुख्य रूप से पत्रों की बात करें और बारीकी से उसकी तह तक जाएं तो हममें से शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति मिले जिसने कभी किसी को पत्र ना लिखा हो, या ना लिखवाया हो या फिर पत्रों का बेसब्री से इंतजार ना किया हो।
पूर्व समय में हमने कई ऐसी फिल्में देखी हैं जिसमें सैनिक अपने परिवार वालों से बात करने के लिए पत्र लिखते थे और वहाँ से आने वाले पत्रों का जिस उत्सुकता से इंतजार करते थे उसकी कोई मिसाल ही नहीं दी जा सकती।
पत्रों की उपयोगिता हमेशा से ही बनी रही है । पत्र जो काम कर सकते हैं वह संसार का आधुनिक साधन नहीं कर सकता है । पूर्व समय में जिस प्रकार का संतोष हमारे मन में पत्र को पढ़कर मिलता था ।आजकल की पीढी के लिए ये सब एक दिवास्वप्न की तरह है ।
पत्रों की एक खास बात यह भी है कि यह हमारी यादों को सहेजकर रखते हैं यह हमारे भावनाओं को प्रकट करने का जरिया भी प्रदान करते हैं। इनमें हम अपने विचारों को पूर्ण रूप से लिख सकते हैं ।आज भी देश में कई ऐसे लोग है जिन्होंने अपने पुरखों की चिट्ठियों को संजोकर विरासत के रूप में रखा हैं। जब हम ख़त लिखते थे तो सब कुछ लिखते थे, शब्द होते थे , संवेदनाएं होती थी । खतों में लिखी पंक्तियों को हम पढ़ते ही नही थे बल्कि लिखने वाले के उस समय और परिस्थिति को भी जी लेते थे । ख़त में लिखी इबारत हमे लिखने का सहूर , श्रद्धा,सम्मान और आदर तक सिखाती थी। तब किसी के दुख – सुख की खबर खत में पढ़कर आँखे भर आती थी और अब मौत के मंजर की खबर पढ़कर हमारे उत्सव नही रुकते हैं। वो दिन जैसे भी थे बहुत सुकून भरे दिन थे।
आज वह संतोष फोन में एसएमएस पढ़कर कहां मिलता है।हम आज पल पल मोबाइल से कुशलता पूछते रहते हैं मतलब अब पल का भरोसा नहीं है इस मोबाइल ने इन पत्रों का अस्तित्व ही समाप्त कर दिया ।वर्तमान के तकनीकी युग के फैक्स, ईमेल और मोबाइल ने चिट्ठियों की गति को रोक रखा है । पर पत्रों की यह विशेषता है कि आप पत्रों को आसानी से सहेज कर रख सकते हैं लेकिन SMS संदेशों को आप जल्दी ही भूल जाते हैं क्या आप बता सकते हैं आप कितने संदेशों को सहेज कर रख सकते हैं मेरे ख्याल से तो बहुत कम? अगर वह संदेश आपके फोन में हैं फिर भी आप उसे कभी दोबारा नहीं देखते।पत्र जो काम कर सकते हैं, वह संचार का आधुनिकतम साधन नहीं कर सकता है। पत्र जैसा संतोष फोन या एसएमएस का संदेश कहाँ दे सकता है।
तकनीकी बदलावों की वजह से एक ही थैले में खुशी और गम के समाचार लेकर चलने वाले डाकिए अब भले कम दिखाई देते हों, लेकिन परंपरागत डाक सेवा की उपयोगिता आज भी बरकरार है।
भारतीय डाक विभाग का राष्ट्र के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास में बहुमूल्य योगदान है। पत्रों और चिट्ठियों के द्वारा सामाजिक संवाद एवं संपर्क का सबसे सस्ता माध्यम है। डाकखानों द्वारा संचालित बचत खाता योजनाओं ने ग्रामीण भारत में घरेलू बचत को प्रोत्साहन दिया, मनीआर्डर द्वारा रुपयों ,पैसों का सुलभ आदान प्रदान संभव हुआ, वही रक्षाबंधन जैसे त्योहारों में बहनों की राखियां, भाइयों तक पहुंचाकर डाक विभाग सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ाने में भी अपना योगदान देता है।
“विश्व डाक दिवस” की हार्दिक शुभकामनाएं।