पिता…..


सिर पर रखी मज़बूत हथेली की मीठी सी थपकी….!!
हमारे जीवन में पिता का महत्व बेहद खास होता है । मां तो हमेशा अपने प्यार को दर्शा देती है, लेकिन ऊपर से सख्त रहने वाले पिता बहुत कम ही मौकों पर अपना प्यार दिखाते हैं । हम सब के लिए पिता नारियल की तरह होते हैं, जो ऊपर से सख्त और अंदर से काफी नर्म होते हैं । में ये बात अपनी पीढ़ी की कर रही हूँ क्योंकि आजकल के पिता ऊपर से भी नरम हो गए हैं और प्यार भी दर्शाते हैं । हमारे बच्चों के पिता इसी श्रेणी के हैं ।
पिता पर लिखना मतलब अपने अंतर्मन की भावनाओं को खगालना और छिपी हुई स्नेह वाली स्याही को कलम से उकेरना ।
पिता तो वह आईना है जो हमें हमारा प्रतिबिंब दिखाता है, जो कभी झूठ नहीं बोलता, हमें हमारी कमियां दिखाता है, हमें हमसे मिलवाता है। पिता गीता के वो श्लोक हैं, जिन्हें पढ़ते तो सब है, समझते कम ही लोग है……!!
आज मैं आपसे उन्हीं पिता के बारे में बात करूंगी जिनके बारे में बहुत कम कहा जाता है। मां अगर प्यार की बहती नदी है तो पिता उस नदी पर सब्र और शांति का बांध हैं। नदी के प्रवाह में बहना हमें अच्छा लगता है पर बांध की अहमियत तब पता चलती है जब बांध में दरारें पड़ जाती हैं और हम लड़खड़ा जाते हैं। पिता नारियल की तरह है अंदर से कोमल और बाहर से सख्त परंतु लाभदायक। वह एक पेड़ की तरह है जो खुद तो वर्षा और कड़कती धूप में खड़ा रहता है पर हमें छाया और रक्षण देता है। वह चंद्र के समान हमें शीतलता प्रदान करते हैं और सूर्य के समान हमें संसार के हर उजाले से अवगत कराते हैं ,परंतु हमें तो सिर्फ उनकी डांट और फटकार दिखाई देती है उनका प्यार और समर्पण नहीं। जब आप अपना प्रारम्भिक जीवन अपने माता पिता के साथ जीते हो तो कई घटनाओं और बिताए हुए पलों की स्मृतियाँ आपके दिल और दिमाग में अंकित होती जाती हैं । तब हम उन पलों की अहमियत बिल्कुल भी नहीं समझते । पर जैसे जैसे हम हमारे माता पिता के बिना जीवन जीना शुरू करते हैं तो वे स्मृतियाँ कदम कदम आ खड़ी होती हैं जो उनकी मधुर याद दिलाती हैं और मार्गदर्शक भी बनती है ।
मुझे लगता है जीवन क्या है स्मृतियों से भरी एक किताब ही तो है । उस किताब के पन्नों में हमारे बचपन से लेकर आज तक की जीवन यात्रा के विभिन्न पड़ाव की यादें ही तो दर्ज है । इस किताब में से यदि हम
जीवन में हमें मिले संस्कारो को याद करें तो उस कड़ी में सबसे पहले माँ बाप ही याद आते हैं ।
जब हम बड़े हो रहे होते हैं तो हमें उस वक्त पता ही नहीं चलता कि कितने संस्कार हम प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सीख रहे होते हैं । अप्रत्यक्ष संस्कार हमारे जीवन में गहरा प्रभाव डालते हैं । ये बात हमें तब समझ आती है जब हम हमें कोई संस्मरण याद आता है अथवा उन्हीं परिस्थितियों में अपने को पाते हैं । इस बिन्दु पर भूमिका बनाने के पीछे मेरा इशारा मेरे पिता से सीखी गई बातों और संस्कारों से था । मेरे पिता बहुत ही खुले विचारों के थे । मैंने मेरे जीवन मे कभी भी उनको संकुचित विचारधारा और रूढ़िवादी टाइप महसूस ही नहीं किया । घर के बेसिक नियमों के अलावा मैंने उनको हम पर कोई बंधन लगाते नहीं देखा । रक्षात्मक व्यवहार न होने के कारण हम सभी भाई बहन डरपोक नहीं बने । मुझे याद आता है कि जब हम छोटे थे तब मैंने यह पाया कि मेरे पिताजी को किताबें पढ़ने का बहुत शौक था और उन्होंने घर में एक लाइब्रेरी बना रखी थी उस लाइब्रेरी में बहुत सारी माइथोलॉजीकल किताबें ,ज्योतिष की किताबें होती थी । उनकी लाइब्रेरी के कलेक्शन में रामायण, महाभारत ,सत्यार्थ प्रकाश, योगी की आत्मकथा और रामकृष्ण परमहंस,विवेकानंद जी आदि की बहुत सारी किताबें थी । गर्मियों की छुट्टियों में पिताजी हम लोगों के लिए विक्रम बेताल, चाचा चौधरी, साबू और ढेर सारी अमर चित्र कथाएं लेकर आते थे ।हम छुट्टियों में इन सबकी कहानियां पढ़ते थे ।आज समझ आता है उन्होंने कभी नहीं कहा कि किताबें पढ़ो पर घर पर किताबें लाकर रखना और उन्हें खुद के द्वारा पढा जाना उनके द्वारा दिया गया अप्रत्यक्ष संस्कार था । मैंने हमेशा उनको अपने घर वालों को कितनी ही बार वित्तीय सहायता करते देखा और उसके बाद न कभी उसका गुणगान किया और न ही कभी उसके बदले घर वालों से कुछ आशा रखी। इस कारण मैने कई बार महसूस किया कि घर में आर्थिक तंगी भी हो जाती थी । व्यक्तिगत जीवन में भी वे कभी किसी से कोई आशा रखते थे और न ही किसी पर आश्रित भाव रखते थे । एक और बात जो मैंने उनसे सीखी कि आपके पास जितना है उतना पर्याप्त है यानी संतुष्ट प्रवर्त्ति के इंसान थे । मुझे उनका व्यावसायिक जीवन भी देखने का मौका मिला तो मैंने पाया कि उनमें अपने साथ के लोगों के लिए जरा भी ईर्ष्याभाव न था मैंने उनको कभी किसी की बुराई करते नहीं देखा ।काम के प्रति समर्पण भी गजब का था ।
उन्होंने व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन में कभी किसी का बुरा नहीं किया ।इसके कारण मैने पाया कि उन्हें बहुत चैन की नींद आती थी । आत्म अनुशासन भी गजब का था । मैंने उनको कभी सुबह 7 बजे तक सोते नहीं देखा । 60 वर्ष की आयु तक कभी बीमार होते नही देखा ।
ऊपर उल्लिखित बाते बताने के पीछे मेरा आशय ये था कि ये सब बातें उन्होंने हमें कह कर नहीं सिखाई पर अपने व्यवहार में लाई और उनके व्यवहार से हमने यह सीखा कि ईमानदारी,आत्म अनुशासन से रहो ।
ज़रूरत पड़ने पर हमेशा लोगों की मदद करो, किसी का भला करो तो उसके बदले कोई आशा मत रखो । अपनी सन्तुष्ट होने की प्रवृत्ति रखो । किसी का बुरा मत करो और न ही किसी के लिए बुरा बोलो । हमेशा सकारात्मक रहो और खुश रहो। किताबें हमारी मित्र हैं, पथ प्रदर्शक हैं ।
मैंने उनके द्वारा अपनाई फिलॉसफी को अपने जीवन मे भी उतारने की कोशिश की और पाया कि अगर आपका दिल साफ है। आप किसी का बुरा नही करते हो तो आपके साथ भी बुरा नहीं होगा । आप लोगो की भलाई करो ज़रूरत पड़ने पर मदद करो तो जब आपको ज़रूरत पड़ेगी तो ईश्वर किसी न किसी के माध्यम द्वारा आपकी भी मदद करेगा । आज उनका हमारे बीच न होना बड़ा सालता है मुझे । बहुत जल्दी इस दुनिया को अलविदा कह दिया । कितनी ही बातें थी जो में जीवन की आपाधापी में कह नहीं पाई,पर कहना चाहती थी । कहते हैं न ..इंसान के जाने के बाद ही उसकी कदर होती है । पिता के होने का महत्व उनके जाने के बाद ही ज्यादा समझ आया है । बहुत याद आते हो पापा ।
यूँ तो हमारी सभ्यता में माता-पिता का दर्जा ईश्वर से भी ऊँचा है। इस जीवन यात्रा के तमाम रास्तों पर अपने मज़बूत कंधों का सहारा देने और मनुष्यता का पाठ पढ़ाने वाले पिताजी को इस विशेष अवसर पर असंख्य प्रणाम…!


आज के युग में हम राम और श्रवण तो नहीं बन सकते पर अपने जन्मदाता के थकते कंधों को सहला सकते हैं, उनके कांपते हाथों को थाम सकते हैं और कह सकते हैं …..हम हैं । तभी सही मायने में हम फादर्स डे को सार्थक कर पाएंगे ।

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पर्यावरण संरक्षण और हमारी भारतीय परम्पराएं

हम अगर हमारे चारों ओर देखें तो ईश्वर की बनाई इस अद्भुत पर्यावरण की सुंदरता देख कर मन प्रफुल्लित हो जाता है पर्यावरण की गोद में सुंदर फूल, लताएं, हरे-भरे वृक्ष और प्यारे चहचहाते पक्षी है, जो हमारे आकर्षण का केंद्र बिंदु है । आज मानव ने अपनी जिज्ञासा और नई नई खोज की अभिलाषा में पर्यावरण के सहज कार्यो में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया है जिसके कारण हमारा पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है।पर्यावरण  का मतलब है-जलवायु, स्वच्छता, प्रदूषण तथा वृक्ष । और ये सभी चीजें हमारे दैनिक जीवन से सीधा संबंध रखती है और उसे प्रभावित करती है। पर्यावरण के जैविक संघटकों में सूक्ष्म जीवाणु से लेकर कीड़े-मकोड़े, सभी जीव-जंतु और पेड़-पौधों के अलावा उनसे जुड़ी सारी जैव क्रियाएं और प्रक्रियाएं भी शामिल हैं। जबकि पर्यावरण के अजैविक संघटकों में निर्जीव तत्व और उनसे जुड़ी प्रक्रियाएं आती हैं, जैसे: पर्वत, चट्टानें, नदी, हवा और जलवायु के तत्व इत्यादि।
मनुष्यों द्वारा की जाने वाली समस्त क्रियाएं पर्यावरण को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं। आज पर्यावरणीय समस्याएं जैसे प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन इत्यादि मनुष्य को अपनी जीवनशैली के बारे में पुनर्विचार के लिये प्रेरित कर रही हैं और अब पर्यावरण संरक्षण और पर्यावरण प्रबंधन की आवश्यकता महत्वपूर्ण हो चुकी है।मानव और पर्यावरण एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। पर्यावरण जैसे जलवायु प्रदूषण या वृक्षों का कम होना मानव शरीर और स्वास्थ पर सीधा असर डालता है। मानव की अच्छी आदतें जैसे वृक्षों को सहेजना, जलवायु प्रदूषण रोकना, स्वच्छता रखना भी पर्यावरण को प्रभावित करती है। मानव की बूरी आदतें जैसे पानी दूषित करना, बर्बाद करना, वृक्षों की अत्यधिक मात्रा में कटाई करना आदि पर्यावरण को बूरी तरह से प्रभावित करती है। जिसका नतीजा बाद में मानव को प्राकर्तिक आपदाओं का सामना करके भुगतना ही पड़ता है।
भौतिक विकास के पीछे दौड़ रही दुनिया ने आज इस कोरोनाकाल में जरा ठहरकर सांस ली तो उसे अहसास हुआ कि चमक-धमक के फेर में क्या कीमत चुकाई जा रही है। आज ऐसा कोई देश नहीं है जो पर्यावरण संकट पर मंथन नहीं कर रहा हो। भारत भी चिंतित है। लेकिन, जहांं दूसरे देश भौतिक चकाचौंध के लिए अपना सब कुछ लुटा चुके हैं, वहीं भारत के पास आज भी बहुत कुछ बाकी है।प्रकृति संरक्षण का कोई संस्कार अखण्ड भारत भूमि को छोड़कर अन्यत्र देखने में नहीं आता है।
हमारी पृथ्वी और उसके पर्यावरण की चिंता भारतीय संस्कृति की परंपरागत सोच रही है। हिन्दू धर्म में प्रकृति पूजन को प्रकृति संरक्षण के तौर पर मान्यता है। भारत में पेड़-पौधों, नदी-पर्वत, ग्रह-नक्षत्र, अग्नि-वायु सहित प्रकृति के विभिन्न रूपों के साथ मानवीय रिश्ते जोड़े गए हैं। पेड़ की तुलना संतान से की गई है तो नदी को मांं स्वरूप माना गया है।
ग्रह-नक्षत्र, पहाड़ और वायु देवरूप माने गए हैं। प्राचीन समय से ही भारत के वैज्ञानिक ऋषि-मुनियों को प्रकृति संरक्षण और मानव के स्वभाव की गहरी जानकारी थी। वे जानते थे कि मानव अपने क्षणिक लाभ के लिए कई मौकों पर गंभीर भूल कर सकता है। अपना ही भारी नुकसान कर सकता है। इसलिए उन्होंने प्रकृति के साथ मानव के संबंध विकसित कर दिए। ताकि मनुष्य को प्रकृति को गंभीर क्षति पहुंचाने से रोका जा सके। यही कारण है कि प्राचीन काल से ही भारत में प्रकृति के साथ संतुलन करके चलने का महत्वपूर्ण संस्कार है।  हिन्दू परंपराओं ने कहीं न कहीं प्रकृति का संरक्षण किया है। हिन्दू धर्म का प्रकृति के साथ कितना गहरा रिश्ता है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि दुनिया के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद का प्रथम मंत्र ही अग्नि की स्तुति में रचा गया है ।
हिन्दुत्व वैज्ञानिक जीवन पद्धति है। प्रत्येक हिन्दू परम्परा के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक रहस्य छिपा हुआ है। इन रहस्यों को प्रकट करने का कार्य होना चाहिए। हिन्दू धर्म के संबंध में एक बात दुनिया मानती है कि हिन्दू दर्शन ‘जियो और जीने दो’ के सिद्धांत पर आधारित है। यह विशेषता किसी अन्य धर्म में नहीं है। हिन्दू धर्म का सह अस्तित्व का सिद्धांत ही हिन्दुओं को प्रकृति के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है। वैदिक वाङ्मयों में प्रकृति के प्रत्येक अवयव के संरक्षण और सम्वद्र्धन के निर्देश मिलते हैं। हमारे ऋषि जानते थे कि पृथ्वी का आधार जल और जंगल है। इसलिए उन्होंने पृथ्वी की रक्षा के लिए वृक्ष और जल को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा है- ‘वृक्षाद् वर्षति पर्जन्य: पर्जन्यादन्न सम्भव: ‘ अर्थात् वृक्ष जल है, जल अन्न है, अन्न जीवन है। वृक्षों की रक्षा के लिए हमारे पूर्वजों ने देवताओं में त्रिदेव के समानांतर पर्यावरण पर सबसे सकारात्मक प्रभाव डालने वाले तीन वृक्षों की त्रिमूर्ति तैयार की और उन्हें काटना वर्जित कर दिया। ये तीन वृक्ष हैं – पीपल, बरगद और नीम। पीपल को ब्रह्म देव का, बरगद को शिव का और नीम को देवी दुर्गा का आवास बताकर उन्हें पूजनीय बनाया। औषधीय गुणों के कारण आंवले और शमी के वृक्ष और तुलसी के पौधे को पूज्य घोषित किया।
जंगल को हमारे ऋषि आनंददायक कहते हैं- ‘तेरे जंगल हमारे लिए सुखदाई हों । यही कारण है कि हिन्दू जीवन के चार महत्वपूर्ण आश्रमों में से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास का सीधा संबंध वनों से ही है। हम कह सकते हैं कि इन्हीं वनों में हमारी सांस्कृतिक विरासत का सम्वद्र्धन हुआ है। हिन्दू संस्कृति में वृक्ष को देवता मानकर पूजा करने का विधान है। वृक्षों की पूजा करने के विधान के कारण हिन्दू स्वभाव से वृक्षों का संरक्षक हो जाता है।
हमारे महर्षि यह भली प्रकार जानते थे कि पेड़ों में भी चेतना होती है। इसलिए उन्हें मनुष्य के समतुल्य माना गया है। उद्दालक ऋषि अपने पुत्र श्वेतकेतु से आत्मा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वृक्ष जीवात्मा से ओतप्रोत होते हैं और मनुष्यों की भाँति सुख-दु:ख की अनुभूति करते हैं। हिन्दू दर्शन में एक वृक्ष की मनुष्य के दस पुत्रों से तुलना की गई है-
घर में तुलसी का पौधा लगाने का आग्रह भी हिन्दू संस्कृति में क्यों है? यह आज सिद्ध हो गया है। तुलसी का पौधा मनुष्य को सबसे अधिक प्राणवायु ऑक्सीजन देता है। तुलसी के पौधे में अनेक औषधीय गुण भी मौजूद हैं। पीपल को देवता मानकर भी उसकी पूजा नियमित इसीलिए की जाती है क्योंकि वह भी अधिक मात्रा में ऑक्सीजन देता है।
देवों के देव महादेव तो बेल-पत्र और धतूरे से ही प्रसन्न होते हैं। यदि कोई शिवभक्त है तो उसे बेलपत्र और धतूरे के पेड़-पौधों की रक्षा करनी ही पड़ेगी।
वट पूर्णिमा और आंवला नवमी का पर्व मनाना है तो वटवृक्ष और आंवले के पेड़ धरती पर बचाने ही होंगे। सरस्वती को पीले फूल पसंद हैं। धन-सम्पदा की देवी लक्ष्मी को कमल और गुलाब के फूल से प्रसन्न किया जा सकता है। गणेश दूर्वा से प्रसन्न हो जाते हैं। हिन्दू धर्म के प्रत्येक देवी-देवता भी पशु-पक्षी और पेड़-पौधों से लेकर प्रकृति के विभिन्न अवयवों के संरक्षण का संदेश देते हैं।
जीवनदायिनी नदियों को देवी और मां तथा जलाशयों को देवताओं की क्रीड़ा-भूमि बताकर उनकी निर्मलता की रक्षा के प्रयास हुए।
जलस्रोतों का भी हिन्दू धर्म में बहुत महत्व है। ज्यादातर गांव-नगर नदी के किनारे पर बसे हैं। ऐसे गांव जो नदी किनारे नहीं हैं, वहां ग्रामीणों ने तालाब बनाए थे। बिना नदी या ताल के गांव-नगर के अस्तित्व की कल्पना नहीं है। हिन्दुओं के चार वेदों में से एक अथर्ववेद में बताया गया है कि आवास के समीप शुद्ध जलयुक्त जलाशय होना चाहिए। जल दीर्घायु प्रदायक, कल्याणकारक, सुखमय और प्राणरक्षक होता है। शुद्ध जल के बिना जीवन संभव नहीं है। यही कारण है कि जलस्रोतों को बचाए रखने के लिए हमारे ऋषियों ने इन्हें सम्मान दिया। पूर्वजों ने कल-कल प्रवाहमान सरिता गंगा को ही नहीं वरन सभी जीवनदायनी नदियों को मांं कहा है। हिन्दू धर्म में अनेक अवसर पर नदियों, तालाबों और सागरों की मांं के रूप में उपासना की जाती है।
हमारे उपनिषद में अन्न की अपेक्षा जल को उत्कृष्ट कहा गया है।  महान ज्ञानी ऋषियों ने धार्मिक परंपराओं से जोड़कर पर्वतों की भी महत्ता स्थापित की है। देश के प्रमुख पर्वत देवताओं के निवास स्थान हैं। अगर पर्वत देवताओं के वासस्थान नहीं होते तो कब के खनन माफिया उन्हें उखाड़ चुके होते। कैलाश पर्वत महाशिव की तपोभूमि है। हिमालय को तो भारत का किरीट कहा गया है। महाकवि कालिदास ने ‘कुमारसम्भवम्’ में हिमालय की महानता और देवत्व को बताते हुए कहा है- उत्तर दिशा में देवतात्मा हिमालय नाम का पर्वतराज है, जिसकी भुजाएं पूर्व और पश्चिम में समुद्रपर्यंत फैली हुई हैं और जो पृथ्वी के मानदंड की तरह स्थित है।
भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन की पूजा का विधान इसलिए शुरू कराया था क्योंकि गोवर्धन पर्वत पर अनेक औषधि के पेड़-पौधे थे, मथुरा-वृन्दावन सहित पूरे देश में दीपावली के बाद गोवर्धन पूजा धूमधाम से की जाती है।
इसी तरह हमारे महर्षियों ने जीव-जन्तुओं के महत्व को पहचानकर उनकी भी देवरूप में अर्चना की है। मनुष्य और पशु परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर हैं। सिंह, हाथी, सांप, गाय, बैल, घोड़ों, मछलियों, कछुओं सहित पशुओं की कई प्रजातियों को देवताओं का अवतार, वाहन या प्रिय बताकर उनके साथ हमारे सौहार्दपूर्ण रिश्ते बनाने की चेष्टाएं हुईं। पक्षी तो हमेशा से ही पर्यावरण के बैरोमीटर रहे हैं। जहां प्रकृति का सौंदर्य होता है, पक्षियों के गीत वहीं गूंजते हैं। पक्षी जिस जगह से दूरी बना लेते हैं, उसे अपवित्र और रहने लायक नहीं माना जाता। हमारी आदिवासी परंपराओं में मनुष्य और पक्षियों का सनातन रिश्ता आज भी क़ायम है। वहां जब तक पक्षियों का कलरव नहीं गूंजे, घर में किसी धार्मिक अनुष्ठान का आरंभ नहीं होता।
हिन्दू धर्म में गाय, कुत्ता, बिल्ली, चूहा, हाथी, शेर और यहां तक की विषधर नागराज को भी पूजनीय बताया है। प्रत्येक हिन्दू परिवार में पहली रोटी गाय के लिए और आखिरी रोटी कुत्ते के लिए निकाली जाती है। चींटियों को भी बहुत से हिन्दू आटा डालते हैं। चिडिय़ों और कौओं के लिए घर की मुंडेर पर दाना-पानी रखा जाता है। पितृपक्ष में तो कौए को बाकायदा निमंत्रित करके दाना-पानी खिलाया जाता है। इन सब परम्पराओं के पीछे जीव संरक्षण का संदेश है। हिन्दू गाय को माँ कहता है। उसकी अर्चना करता है। नागपंचमी के दिन नागदेव की पूजा की जाती है। नाग-विष से मनुष्य के लिए प्राणरक्षक औषधियों का निर्माण होता है। नाग पूजन के पीछे का रहस्य ही यह है। हमारी संस्कृति में देवों में प्रथम पूज्य गणेश की कल्पना प्रकृति और पर्यावरण के रूपक की तरह की गई है। गणेश का मस्तक हाथी का है। चूहे उनके वाहन हैं। बैल नंदी उनका मित्र और अभिभावक। मोर और सांप उनके परिवार के सदस्य। पर्वत उनका आवास है और वन क्रीड़ा-स्थल। उन्हें गढ़ने में नदी गंगा की भूमिका रही थी। गणेश का रंग हरा प्रकृति का और लाल शक्ति का प्रतीक है। महंगी पूजन सामग्रियों से नहीं, इक्कीस पेड़-पौधों की पत्तियों से उनकी पूजा होती है। जबतक इक्कीस दूबों की मौली समर्पित न की जाय, उनकी पूजा अधूरी मानी जाती है। कहा गया कि आम, पीपल और नीम के पत्तों वाली गणेश की आकृति प्रवेश द्वार पर लगाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
हिन्दू धर्म की विशेषता है कि वह प्रकृति के संरक्षण की परम्परा का जन्मदाता है। हिन्दू संस्कृति में प्रत्येक जीव के कल्याण का भाव है। हिन्दू धर्म के जितने भी त्योहार हैं, वे सब प्रकृति के अनुरूप हैं। मकर संक्रान्ति, वसंत पंचमी, महाशिवरात्रि, होली, नवरात्र, गुड़ी पड़वा, वट पूर्णिमा, ओणम्, दीपावली, कार्तिक पूर्णिमा, छठ पूजा, शरद पूर्णिमा, अन्नकूट, देव प्रबोधिनी एकादशी, हरियाली तीज, गंगा दशहरा आदि सब पर्वों में प्रकृति संरक्षण का पुण्य स्मरण है।
हमारे पूर्वजों ने पर्यावरण का महत्व समझा था और लोगों को उसके प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से असंख्य  मिथक और प्रतीक गढ़े। कालांतर में वे मिथक और प्रतीक हमारे आदर्श हो गए और उनके पीछे छुपे पृथ्वी और पर्यावरण को संरक्षित करने के उद्देश्य पीछे छूट गए। अपनी परंपराओं की अधकचरी समझ के कारण हमारी पृथ्वी और उसका पर्यावरण आज अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से जूझ रहे हैं। पर्यावरण के प्रति सचेत करने के उद्देश्य से   संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1972 से 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जाने लगा ।पर्यावरण दिवस का मुख्य उद्देश्य हमारी प्रकृति की रक्षा के लिए जागरूकता बढ़ाना और दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे विभिन्न पर्यावरणीय मुद्दों को देखना है।
प्रत्येक व्यक्ति अगर अपनी अपनी जिम्मेदारी समझे तो सभी प्रकार की कचरा ,गंदगी और बढ़ती आबादी के लिए स्वयं उपाय करके पर्यावरण संरक्षण में अपनी भागीदारी दे सकता है, लेकिन प्रगति के नाम पर पर्यावरण को मानव ने ही विकृत करने का प्रयास किया है, पर्यावरण व्यापक शब्द है जिसका सामान्य अर्थ प्रकृति द्वारा प्रदान किया गया समस्त भौतिक और सामाजिक वातावरण इसके अंतर्गत जल, वायु, पेड़, पौधे, पर्वत, प्राकृतिक संपदा सभी पर्यावरण सरक्षण के उपाए में आते है।  आज पर्यावरण का ध्यान रखना हर व्यक्ति का कर्तव्य और जिम्मेदारी है।
पर्यावरण सुरक्षा और उसमें संतुलन हमेशा बना रहे इसके लिए हमें जागरुक और सचेत रहना होगा। प्रत्येक प्रकार के हानिकारक प्रदूषण जैसे जल, वायु, ध्वनि, इन सब खतरनाक प्रदूषण से बचने के लिए अगर हमने धीरे-धीरे भी कोई उपाय करते रहें तो हमारी पृथ्वी की सुंदरता जो कि पर्यावरण है। उसे बचा सकते हैं और अपने जीवन को भी स्वस्थ और स्वच्छ रूप में प्राप्त कर सकते हैं पर्यावरण संरक्षण विश्व में प्रत्येक मनुष्य के लिए अनिवार्य रूप से घोषित करना चाहिए।  पर्यावरण है तो हमारा जीवन है।  हमारी भारतीय संस्कृति में प्रकृति संरक्षण एक महत्वपूर्ण कर्तव्य है। पेड़-पौधे, नदी-पर्वत, अग्नि-वायु सहित प्रकृति के विभिन्न रूप हमारे लिए वंदनीय हैं।
तो आइए,आज ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ पर अपनी प्राकृतिक संपदा के संरक्षण और संवर्धन हेतु हम सब संकल्पित हों।
विश्व पर्यावरण दिवस की शुभकामनाएं

जीवन एक यात्रा….


हमारा जीवन एक निरन्तर चलने वाली यात्रा है । यहाँ हर किसी को अलग अलग परिस्थितियों में जीवन यात्रा करनी होती है।
इस यात्रा में यह ज़रूरी नहीं होता कि यात्रा में आने वाला हर इंसान आपका हमेशा के लिए सहयात्री बने । इस यात्रा के हर कदम पर एक नया मोड़, नया पात्र, एक नया अनुभव आपका इंतज़ार कर रहा होता है। हमें इस संपूर्ण यात्रा में अपना कर्म करना होता है।
प्रकृति के नियम के अनुसार यहाँ छोटी से छोटी घटना भी किसी कारण से होती है बगैर कारण के कुछ घटित नहीं होता ।
जैसे किताब में आने वाली घटनाओं पर लेखक के सिवा किसी का बस नहीं उसी तरह हमारे जीवन की यात्रा में आने वाली घटनाओं पर हमारा बस नहीं होता । अगर किसी चीज़ पर हमारा बस है तो वो है हमारे अनुभव , जो ज़िन्दगी ने हमें देती हुई चलती है और कुछ सबक जो हम सीखते हुए चलते हैं । हमारे इस जीवन की शुरुआत में आने वाले सहयात्री अंत तक हमारा साथ नहीं देते। कुछ हमें बीच में ही छोड़कर चले जाते हैं कुछ को हम ही पीछे छोड़ आते हैं, कुछ हमें याद आते हैं, कुछ को हम भूल जाते हैं । इस यात्रा के सफर में कहीं खुशियाँ तो कहीं पर ग़म मिलते हैं लेकिन यही इस यात्रा का आनन्द है । जीवन यात्रा में हर तरह के मौसम हमें विभिन्न प्रकार के अनुभव देते हैं ।

हमें निरन्तर चलते रहना जरूरी है ।अगर हम रुक कर एक जगह बैठ जाएंगे तो अगले पड़ाव पर मिलने वाले अनुभवों और आश्चर्यों से वंचित रह जाएंगे । जब मनुष्य सिर्फ एक जगह स्थिर होकर सोचना शुरू कर देता है तो उसकी सोच का दायरा और व्यवहार सीमित हो जाता है। सोच का दायरा सीमित होने की वजह से उसके सामाजिक चरित्र और व्यवहार में भी ठहराव आना शुरू होता है। अंततः वह स्वयं सीमित हो जाता है ।

जीवन चलने का नाम , चलते रहो सुबह- शाम …….. यह फिल्मी गीत जीवन की गति की ओर इशारा करता है। जीवन में उतार- चढ़ाव तो आते रहते हैं पर हम जो भी दिशा चुनते हैं उस पर चलने का अर्थ हो – अपनी शक्तियों का सदुपयोग करना। उन्नति के लिए निरन्तर कर्म करते करना, विकास की ओर उन्मुख होना और सुव्यवस्थित जीवन बिताना ।
इस यात्रा में मिलने वाले हर किरदार और घटना की भी अपनी अहमियत है,ना कोई किसी से ज़्यादा ज़रूरी है और ना कोई किसी से कम । हर सहयात्री का अपना किरदार और समय होता है । हमारी जीवन यात्रा में वह अपनी भूमिका निभाता है और भूमिका खत्म होने के बाद उसे हमारी यात्रा से जाना होता है। ना हम उसके आने का वक़्त तय करते हैं और ना जाने का । जीवन में उसकी आवश्यकता ही उसका निर्धारण करती है। ज़रूरी ये नहीं कि कब तक और किसके साथ आपकी यात्रा जारी रही । पर ज़रूरी ये है कि आपने इस यात्रा में अपने किरदार को पूर्णतः जिया या नहीं। इस यात्रा में कितने ही सफर हमें सिर्फ अकेले ही तय करने होते हैं। नई राहें अपनानी होती हैं । उन राहों पर हमें हमारी सकारात्मक सोच से आगे बढ़ने की शक्ति मिलती है । इस यात्रा में जब तक आप चल रहे हैं तब तक आप खुलकर इस यात्रा का आनंद भी उठाते चलें वरना समय का क्या भरोसा और हमारी जीवन यात्रा कहाँ जाकर रुक जाए।
कभी कभी तो मुझे यह महसूस होता है कि जीवन यात्रा के सफर में आए मुकामों को तय कैसे किया जाए इसका ज्ञान जब होता है तब तक यह सफर समाप्ति की ओर आ गया होता है । आपकी पद प्रतिष्ठा के कारण आपको जीवन में बहुत सारे लोग सम्मान और आदर देंगे परन्तु हमारे इस जीवन की यात्रा समाप्त होने के बाद हमारे कर्म ही याद रखें जाएंगे । हम समय के साथ विलीन हो जाएंगे लेकिन जो भूमिका हमने निभाई और उसके कारण मिलने वाला सम्मान और आदर ही हमारे जीवन की शाश्वतता का प्रमाण है ।

पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार किसी एक की जीवन यात्रा सिर्फ वर्तमान एक जन्म की नहीं अपितु कितने ही बीते हुए जन्मों और आने वाले जन्मों की यात्रा होती है। हमारी यात्रा अनन्त है ।

आपके जीवन की इस यात्रा पर आप सकारात्मक सोच के साथ उन्नति के लिए निरन्तर कर्म करते रहें , विकास की ओर उन्मुख रहकर अपना जीवन सुव्यवस्थित बिताएं , ऐसी मेरी शुभकामनाएं है…….।

ऋतु नायक

रविन्द्र नाथ टैगोर…

जन्मदिवस विशेष…..

रवीन्द्रनाथ टैगोर विलक्षण प्रतिभा के व्यक्ति थे। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे एक साथ महान साहित्यकार, समाज सुधारक, अध्यापक, कलाकार एवं संस्थाओं के निर्माता थे । ऐसे महान शिक्षक, कहानीकार, चित्रकार, नाटककार, गायक,कवि और दार्शनिक गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर को उनके जन्मदिवस पर सादर प्रणाम!


रवींद्रनाथ टैगोर ने बहुत सी कविताएं , नाटक और कहानियां लिखी हैं उनमें से पोस्टमास्टर, स्वामी का पता ,अपरिचिता, भिखारिन और काबुलीवाला कहानियां आज भी हृदय पटल पर अंकित है।इन्हें आज भी पढ़कर आँखे नम हो जाती हैं । मैने इनको जितना पढा उसमें यह पाया है कि इनकी रचनाओं एवं जीवन दर्शन में मानव करूणा, गरीबी का महत्वपूर्ण स्थान है।उनकी नोबेल पुरस्कार प्राप्त काव्य रचना “गीतांजलि” ईश्वर के प्रति निष्ठा, प्रकृति प्रेम और मानवता वादी मूल्यों पर आधारित है ।

मेरी रक्षा करो विपत्ति में, मेरी यह प्रार्थना नहीं है ।
मुझे नही हो भय विपत्ति में, मेरी चाह यही है ।।
….गीतांजलि से बहुत सुंदर लाइनें ।


हालांकि कोई भी रचना अपने मूल स्वरूप में ही उत्कृष्ट होती है । इसे बांग्ल भाषा में लिखा गया परन्तु मैने इसे हिंदी अनुवाद स्वरूप में ही पढा है । इस उत्कृष्ट रचना को पढ़कर मन आध्यात्मिक हो जाता है । इसके अलावा रवींद्रनाथ टैगोर जी के द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन के समय सुउद्देश्यपूर्ण लिखित अंग्रेज़ी कविता जिसमे स्वाधीनता की सार्थकता बताते हुए नए भारत की तस्वीर रखी गई थी, वह आज के परिपेक्ष्य में भी अपना स्थान रखती है ।


Where the mind is without fear.

and the head is held high,

where knowledge is free.

Where the world has not been broken up

into fragments by narrow domestic walls.


Where words come out from the depth of truth


Where tireless striving stretches its arms towards perfection


Where the clear stream of reason has not lost its way


Into the dreary desert sand of dead habit


Where the mind is led forward by thee


Into ever-widening thought and action


Into that heaven of freedom, my Father, let my country awake.


कवि और लेखकों का यह कर्तव्य और उत्तरदायित्व होता है कि वो जनमानस को उत्थान की ओर उन्मुख करें ।टैगोर जी का जीवन भी इसी दिशा में समर्पित था ।
आज उनके जन्मदिवस के अवसर पर सादर नमन और श्रद्धान्जलि अर्पित करती हूं

07.05.2020

ख्याल….

ये ख्याल भी दबे पांव अपनी रफ्तार से ऐसे आते हैं कि…

अक्सर, ये मेरा जहन, भी थक जाता है पर , रफ़्तार ख़यालों की कभी नहीं थमती !!

ये ख्याल भी इतने अजीब होते हैं कि कभी भी कहीं से भी आ जाते हैं और कौन सा ख्याल कब और कहाँ से आयेगा ये तो उन्हें भी पता नहीं होता…!!

कुछ कह लें हम .. या कुछ .. सुन ही लें,
कह दो, जो रह गया .. कुछ कहा या अनकहा सा !!

वैसे एक बात जो हर किसी में समान है, वो ये कि, उनके सबसे बेहतरीन ख्याल उन्हें तब आते हैं जब उन्हे शब्दों में पिरोना उस वक्त उनके लिए संभव ना हो| और जब तक आप कागज और कलम का साथ पाते हैं तब तक ये ख्याल आपका साथ छोड़ के कहीं दूर जा चुके होते हैं… और वो शब्द जो आपने अपने दिमाग में करीने से सजा कर रखे थे वो आपके विचारों के पिंजरे से आजाद हो अपनी ऊँची उड़ान भर चुके होते हैं| अब बचे हुए आधे अधूरे ख्यालों को उन दूर जा चुके शब्दों में वापस पिरोना उतना ही जटिल हो जाता है जितना इंसान के लिए अपनी गलती तलाशना और फिर उसे सुधारना…!!

जब आप उन ख्यालों को शब्द देते हैं जिनको आपने महसूस किया होता है तब आप एक अनुभव को अपनी अभिव्यक्ति का रूप देते हैं.! जब हम अपने ख्यालों के एहसास को लपेट कर कागज़ी लिबास में सजाकर पल-पल परिवर्तित होते भावों को शब्दों की गति में बाँधकर पिरोते हैं तो यह करना आसान नहीं होता है पर अद्भुत एहसास ज़रूर होता है..!!

अपने ख्यालों को कागज पर उतारने का ख्याल तो अक्सर आता ही रहता है और अगर गलती से आपने अपनी पूरी कोशिश के बाद कुछ शब्द कागज पर लिखे भी तो वो वैसे नहीं दिखते ज़िसकी आपने कल्पना की थी …. !

इसके बावजूद आपको लिखना बंद नहीं करना है ……क्योंकि अगर वैसा नहीं लिख पाए जैसा लिखना चाहते थे … तो उससे कुछ बेहतरीन ही लिखने का प्रयास किया जाए…..!! यही प्रयास में आरम्भ कर रही हूँ…. ।