एक पाती सखी के नाम…

प्रिय सखी जयश्री,
वो भी क्या दिन थे…!!
जब बात निकालती है तो दूर तलक तो जाती ही है……!!
आज तुमने एक बार फिर उन बीते दिनों की याद ताज़ा कर दी । ये उन दिनों की है जब जिंदगी की रफ़्तार कुछ धीमी थी तब न इस भागदौड़ की जरुरत थी और न ही इतनी चिंता और भीड़भाड़ से भरी एक हताश करने वाली अर्थहीन दौड़ थी । मुझे याद है कि मेरी शादी के बाद हम अपने जीवन को आगे बढाने और जिम्मेदारियों के निर्वहन में इतना व्यस्त हो गए कि यात्रा पर जाने की सुध न रही । मई 2002 में अक्षिता एक साल की हो गई थी और पैदल भी चलने लगी थी । तब हम दोनों को ही लगने लगा था कि अब इस जीवन की एक सी दिनचर्या से मन ऊब रहा है तो एक ब्रेक की बहुत आवश्यकता है । तो क्यों ना , कहीं यात्रा पर निकला जाए । यात्रा करना किसे पसन्द नहीं …! तुम्हें मालूम है कि मुझे और तुम्हें दोनों को ही घूमना बहुत पसन्द है । घूमने में हमेशा से मेरी दो पसन्द हैं … पहाड़ और समंदर ! पहाड़ इसलिए कि वहां जाकर ऐसा लगता है कि जैसे प्रकृति की गोद में समा गए हों और समंदर इसलिए कि समंदर किनारे जाकर आप आराम के साथ साथ खेल मस्ती कर पाते हो । चूंकि उस वक्त गर्मियां अपने चरम पर थी सो पहाडों पर जाने का प्लान बनाया । पहाड़ और बर्फ का ध्यान आते ही सबसे पहले हम दोनों के ही दिमाग मे शिमला, कुल्लू मनाली का ध्यान आया । हम दोनों ने अपनी एल टी सी पर जाने की तैयारी शुरू कर दी । तब मोबाइल सिर्फ फोन और sms तक सी सीमित थे और इंटरनेट सिर्फ कम्प्यूटर पर ही उपलब्ध था सो नेट से इन जगहों पर जाने की जानकारी एकत्र करनी शुरू कर दी ।और ट्रेन के टिकिट ले लिए । गेस्ट हाउस बुक करा दिए जहां गेस्ट हाउस नही मिले वहां की जगहों पर होटल में रुकने के लिए जानकारी एकत्रित करके रख ली ।हनीमून के बाद यह मेरी पहली यात्रा थी । हम बहुत रोमांचित हुए जा रहे थे कि हम बर्फ पे जा रहे थे क्योंकि बर्फीली जगह पर जाने की यह हमारी पहली यात्रा थी । यह प्लान बनते बनते और फाइनल होते होते परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी कि हम दोनों का साथ घूमने जाना संभव न हो सका, अलग अलग प्रोग्राम बनाना पड़ा। मैने शिमला, कुल्लू, मनाली और धर्मशाला घूमने का ही कार्यक्रम बनाया जबकि तुमने तो अपने पूरे परिवार को सम्मिलित कर लिया था और तुम्हारा 20 दिनों का लम्बा चौड़ा कार्यक्रम तैयार हुआ था जिसमें हरिद्वार, ऋषिकेश, देहरादून, मसूरी, दिल्ली , शिमला,कुल्लू मनाली धर्मशाला और आगरा शामिल थे । हमारा प्रोग्राम फाइनल होने के बाद हम दोनों बहुत रोमांचित हुए जा रहे थे ।हमारी जाने की तैयारियां शुरू हो गई थीं । हमने और तुमने ट्रेन की समयसारिणी, स्वेटर्स, ज़रूरी दवाइयां ,कैमरा कपड़े ,खाने का कुछ सामान आदि पैक करके रखने के साथ अपनी अपनी यात्रा अपने निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार शुरू कर दी थी । यहां से मैं तुम्हे मेरी यात्रा का संक्षिप्त वर्णन तुम्हें इसलिए सुनाऊँगी ताकि हम उन स्थानों में सँजोई हुई अपनी स्मृतियों की याद फिर से ताजा कर सकें । मेरी यात्रा भोपाल से 10 जून 2002 को दिल्ली के लिए और दिल्ली से कालका पहुंचकर सुबह टॉय ट्रेन से शिमला के लिए शुरू हुई । रास्ते में सामने खडी पहाड़ियों को देख सुखद अनुभूति हुई क्योंकि अभी तक हम मैदान, खेत और धरती-आकाश को मिलाते अनन्त क्षितिज को देखते हुए चले आ रहे थे । ऐसे में, सुबह-सुबह पहाड़ियों का दर्शन एक ताजगी देने वाला अनुभव था । एक के बाद दूसरा और फिर तीसरा पहाड़ देखकर मन बहुत प्रसन्न हो उठा था और पहाड़ों पर बर्फ देखने का कौतूहल बढ़ता जा रहा था । कुछ देर बाद शिमला स्टेशन आ गया ।हम अपने पहले पड़ाव पर 12 जून को पहुंच गए थे । शिमला में रहकर हमने माल रोड, जाखू मंदिर, कुफरी,ग्रीन वैली , नालदेरा आदि देखा फिर वहां से कुल्लू के लिए निकले ।
कुल्लू में काली बाड़ी मंदिर, रघुनाथ मंदिर, बिजली महादेव मंदिर और वैष्णो देवी मंदिर, मनिकरण आदि देखकर हम रवाना हुए मनाली की ओर । कुल्लू से मनाली के रास्ते में प्रकृति छटा के मनमोहक सजीले दृश्य, श्वेत बर्फीली चोटियां, बहते झरने अत्यंत मनमोहक हैं । मनाली में एक तरफ नगर के बीचो-बीच निकलती व्यास नदी पर्यटकों को लुभाती है, तथा हरे भरे वन यहां आने वाले हर पर्यटक को अपनी ओर आकर्षित करते हैं यहाँ हमने हिडिम्बा देवी मंदिर, मनु मंदिर, तिब्बती मोनेस्ट्री देखीं । इसके बाद इस पूरी यात्रा के मुख्य आकर्षण रोहतांग पास के लिए 17 जून को निकले ।हम इस रोमांचक सफ़र और नजारों का आनन्द लेते हुए चले जा रहे थे ।रास्ते में कई जगह खाने-पीने और गर्म कपड़े, जूते और दस्ताने किराए पर उपलब्ध कराने वाली अनेको दुकाने थी । हमने भी एक दुकान से ट्रेकिंग जूते और गर्म कपड़े किराए पर ले लिए थे ।और कुछ देर बाद हम पहुंच गए रोहतांग पास । यहां आकर प्रकृति के विराट स्वरूप के दर्शन हुए और यहाँ के उन्मुक्त वातावरण में कुछ देर के लिए हम खो ही गए । विश्वास ही नहीं हो रहा था कि हम रोहतांग आ पहुंचे हैं । यहाँ से नजर आती बर्फ से ढकी सुन्दर हिमालय पर्वतमाला मन को मन्त्र-मुग्ध कर दिया था । किसी स्वर्ग से कम नहीं लग रही थी यह जगह । यहाँ के स्थानीय लोगो और फोटोग्राफरो ने बर्फ के पुतले, सुंदर रंगीन फूलो और कागजो से सजे मॉडलनुमा छोटे घर फोटो खींचने के लिए बना रखे थे । हमने भी वहां फोटो खिंचाई । इन खूबसूरत वादियों को कैमरे में कैद कर हम अपने अंतिम पड़ाव धर्मशाला आ पहुंचे । धर्मशाला में हमने मुख्य रूप से सेंट जॉन चर्च, मैक्लोडगंज,दलाई लामा मंदिर, वार मेमोरियल , चामुंडा देवी मंदिर देखे और यात्रा समाप्ति की ओर वहां से पठानकोट आ गए । पठानकोट से ट्रेन पकड़कर भोपाल आ गए ।
तुम्हे याद है कि भोपाल आने के बाद हम दोनों ने एक दूसरे के फोटो एलबम देखे और न जाने कितने दिनों तक हम आपस मे इस यात्रा की और वहां ली गई फोटो पर चर्चा करते रहे और आनन्द की अनुभूति प्राप्त करते रहे ।ट्रिप से आने के एक माह बाद की एक रेयर फोटो भी शेयर कर रही हूँ जिसमें हम दोनों का परिवार है और 2 फोटो और पोस्ट कर रही है जो ये बताती हैं कि तुम्हारे बंगलौर जाने के बाद हम 2 बार ही मिल पाए ।
जयश्री… कहां गए वो दिन, वो हमारी निरन्तर चलने वाली बातें, वो समय , वो हमारा साथ साथ घूमना, साथ में खाना खाना ,….. क्या कभी दोबारा पलटेंगे..? शायद कभी नहीं…? बस मधुर स्मृतियों के रूप में सब कुछ संजो कर रखा हुआ है । यादों के पन्ने पलटती हूँ तो लगता है कि जैसे कल की ही बात है पर इस बात को ही 18 वर्ष बीत चुके हैं । मैं अभी भी सोचती हूँ कि तब हम घूमने नहीं जा पाए पर भविष्य में कभी तो वो समय आएगा कि हम फिर साथ किसी स्थल पर घूमने जाएंगे । ऐसी ही आशा के साथ तुम्हें ढेर सारा प्यार…. तुम्हारी रितु

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