डाकिया डाक लाया…….

आज विश्व डाक दिवस है।।।

विश्व डाक दिवस के अवसर पर….

डाकिया डाक लाया…..✉️ 💌

“”मै कुशलपूर्वक हूं, भगवान से आपकी कुशलता की कामना करता हूँ ।””
“”थोड़ा लिखे को बहुत समझना “”
“”अत्र कुशलम तत्रास्तु””
“”आपके पत्र के इंतज़ार में””
ये होते थे पत्रो के कुछ आम शब्द …

कभी कबूतरों ने संदेश पहुंचाए थे। फिर यह काम डाकियों ने किया। जिस घर के लोग परदेशी हुआ करते थे, उन घरों के बड़े – बूढों, ब्याह कर आई दुल्हनों को डाकिए का इंतजार घर की चौखट पर बैठ कर बड़ी शिद्दत से होता था। तब कुशलता जानने का यही माध्यम होता था । अंतर्देशीय पत्रों, पोस्टकार्डों, लिफाफों से रिश्तेदारों के यादों की, उनके चिरंजीवी आर्शीवादों की वो कैसी भीनी भीनी खुशबू आती थी!!!!!

सीधा-साधा डाकिया जादू करे महान,
एक ही थैले में भरे आंसू और मुस्कान

एक डाकिए पर बहुत गाँवों की जिम्मेदारी होती थी, सभी उसका बेसब्री से इंतजार करते थे, जब कोई पत्र आता था तो त्यौहार जैसा माहौल हो जाता था। चिट्ठियों को लोग सहेज कर रखते थे। अपने प्रियजनों की चिट्ठियों को सहेज कर रखना और पुरानी यादों को फिर ताजा करना बहुत ही सरल था।
जिनके घर के सदस्य बाहर नौकरी करते थे उनके द्वारा भेजी गई धनराशि भी मनीआर्डर से आती थी।
अगर हम मुख्य रूप से पत्रों की बात करें और बारीकी से उसकी तह तक जाएं तो हममें से शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति मिले जिसने कभी किसी को पत्र ना लिखा हो, या ना लिखवाया हो या फिर पत्रों का बेसब्री से इंतजार ना किया हो।
पूर्व समय में हमने कई ऐसी फिल्में देखी हैं जिसमें सैनिक अपने परिवार वालों से बात करने के लिए पत्र लिखते थे और वहाँ से आने वाले पत्रों का जिस उत्सुकता से इंतजार करते थे उसकी कोई मिसाल ही नहीं दी जा सकती।
पत्रों की उपयोगिता हमेशा से ही बनी रही है । पत्र जो काम कर सकते हैं वह संसार का आधुनिक साधन नहीं कर सकता है । पूर्व समय में जिस प्रकार का संतोष हमारे मन में पत्र को पढ़कर मिलता था ।आजकल की पीढी के लिए ये सब एक दिवास्वप्न की तरह है ।
पत्रों की एक खास बात यह भी है कि यह हमारी यादों को सहेजकर रखते हैं यह हमारे भावनाओं को प्रकट करने का जरिया भी प्रदान करते हैं। इनमें हम अपने विचारों को पूर्ण रूप से लिख सकते हैं ।आज भी देश में कई ऐसे लोग है जिन्होंने अपने पुरखों की चिट्ठियों को संजोकर विरासत के रूप में रखा हैं। जब हम ख़त लिखते थे तो सब कुछ लिखते थे, शब्द होते थे , संवेदनाएं होती थी । खतों में लिखी पंक्तियों को हम पढ़ते ही नही थे बल्कि लिखने वाले के उस समय और परिस्थिति को भी जी लेते थे । ख़त में लिखी इबारत हमे लिखने का सहूर , श्रद्धा,सम्मान और आदर तक सिखाती थी। तब किसी के दुख – सुख की खबर खत में पढ़कर आँखे भर आती थी और अब मौत के मंजर की खबर पढ़कर हमारे उत्सव नही रुकते हैं। वो दिन जैसे भी थे बहुत सुकून भरे दिन थे।
आज वह संतोष फोन में एसएमएस पढ़कर कहां मिलता है।हम आज पल पल मोबाइल से कुशलता पूछते रहते हैं मतलब अब पल का भरोसा नहीं है इस मोबाइल ने इन पत्रों का अस्तित्व ही समाप्त कर दिया ।वर्तमान के तकनीकी युग के फैक्स, ईमेल और मोबाइल ने चिट्ठियों की गति को रोक रखा है । पर पत्रों की यह विशेषता है कि आप पत्रों को आसानी से सहेज कर रख सकते हैं लेकिन SMS संदेशों को आप जल्दी ही भूल जाते हैं क्या आप बता सकते हैं आप कितने संदेशों को सहेज कर रख सकते हैं मेरे ख्याल से तो बहुत कम? अगर वह संदेश आपके फोन में हैं फिर भी आप उसे कभी दोबारा नहीं देखते।पत्र जो काम कर सकते हैं, वह संचार का आधुनिकतम साधन नहीं कर सकता है। पत्र जैसा संतोष फोन या एसएमएस का संदेश कहाँ दे सकता है।
तकनीकी बदलावों की वजह से एक ही थैले में खुशी और गम के समाचार लेकर चलने वाले डाकिए अब भले कम दिखाई देते हों, लेकिन परंपरागत डाक सेवा की उपयोगिता आज भी बरकरार है।
भारतीय डाक विभाग का राष्ट्र के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विकास में बहुमूल्य योगदान है। पत्रों और चिट्ठियों के द्वारा सामाजिक संवाद एवं संपर्क का सबसे सस्ता माध्यम है। डाकखानों द्वारा संचालित बचत खाता योजनाओं ने ग्रामीण भारत में घरेलू बचत को प्रोत्साहन दिया, मनीआर्डर द्वारा रुपयों ,पैसों का सुलभ आदान प्रदान संभव हुआ, वही रक्षाबंधन जैसे त्योहारों में बहनों की राखियां, भाइयों तक पहुंचाकर डाक विभाग सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ाने में भी अपना योगदान देता है।
“विश्व डाक दिवस” की हार्दिक शुभकामनाएं।

मदद-हमारा अधिकार भी,कर्तव्य भी….


आप मदद करना मत छोड़िए। ये जानते हुए भी कि आप जिसकी मदद करते हैं, वो आख़िर में आपका दुश्मन बन जाता है। लेकिन इससे क्या होता है? मदद करना एक आदत होती है। ऐसी आदत जिसमें सुकून है।

बाल गंगाधर तिलक ने एक अनाथ बच्चे को अपने पास रख कर उसे पाला, पढ़ाया और नौकरी तक में उसकी मदद की थी। वो बच्चा जब बड़ा हो गया, तो इस कुंठा में जीता था कि जीवन में उसने जो कुछ भी पाया, किसी की मदद से पाया है। ऐसे में जब वो तिलक से अलग रहने चला गया तो जब कभी मौका मिलता तिलक की बुराई करता। तिलक तक उसकी बातें पहुंचती थीं, पर तिलक कभी प्रतिक्रिया नहीं जताते थे।
उसके जाने के बाद तिलक के साथ कोई और रहने लगा। वो बच्चा को जो तिलक की मदद से सेटल हो चुका था, जब उसे पता चला कि तिलक के साथ कोई और रह रहा है, तो एक दिन तिलक के पास आया और बात-बात में उसने उनसे कहा कि बाबा, आप जिस व्यक्ति को अपने साथ रखे हैं, वो बाहर आपकी निंदा करता है।
तिलक मुस्कुराए। फिर उन्होंने कहा, “मेरी निंदा? पर क्यों? मैंने तो उसकी कोई मदद ही नहीं की। जब मैंने उसकी कोई मदद ही नहीं की तो वो मेरी निंदा भला क्यों करेगा?”

कहानियां सच होती हैं। वो होती ही इसलिए हैं ताकि हम जीवन को समझ पाएं। समझ पाएं कि आपके साथ जो हो रहा है, वो सिर्फ आपके साथ नहीं हो रहा। असल सच्चाई यही है कि जब भी आप किसी की मदद करते हैं तो मदद लेने वाला खुद को छोटा समझ कर आपके किए को स्वीकार नहीं करना चाहता। बस यहीं से शुरू होता है द्वंद्व। ये द्वंद्व कृत्घनता को जन्म देता है। आदमी शुक्रगुज़ार होने की जगह नाशुक्रा हो जाता है। मूल रूप से सच इतना ही है कि एक आदमी की मदद कीजिए, एक दुश्मन तैयार कीजिए।

“मदद पाने वाला अहसान के तले नहीं दबना चाहता, इसलिए आपके विरुद्ध होकर वो अहसान को नकारता है। अगर थोड़ा रंग-रोगन लगा कर बात कहूं तो मदद के बदले की जाने वाली शिकायत मूल रूप से किए गए अहसान का नकारात्मक विरोध भर है। पर इसका बुरा नहीं मानना चाहिए या बुरा लगे भी तो तिलक की तरह उसे भूल कर फिर किसी की मदद करने की कोशिश शुरू कर देनी चाहिए।
इस सच को जानते हुए भी बाद में शिकायत मिलेगी, अपमान मिलेगा। पर जैसा कि मैंने कहा है कि मदद ही सुकून है, तो तमाम तकलीफों के बाद भी मदद के हाथ बढ़ाना मत छोड़िेगा।
उसका किया उसके साथ। आपका किया आपके साथ।

हम एक दूसरे की मदद करते रहते हैं। मदद लेते भी हैं और करते भी हैं। मदद पाना हमारा अधिकार है और मदद करना हमारा कर्तव्य।
ईश्वर ने एक मदद बैंक बनाई है। आपके द्वारा की गई किसी को मदद उस मदद बैंक में जमा हो जाती है। जब आपको मदद की जरूरत होती है तो आपको उसी मदद बैंक से मदद मिल जाती है। ठीक बैंक की तरह, वह नोट आपको नहीं मिलेंगे, जो आपने जमा किये।
मेरा तो यही अनुभव रहा है, जब मदद की जरूरत पड़ी, नए मददगार सामने आ गए। वह नहीं आये, जिनकी मैंने मदद की थी।

“जो तोकूँ कॉटा बुवै, ताहि बोय तू फूल।
तोकूँ फूल के फूल हैं, बाकूँ है तिरशूल ।।”

हमें अपना मूल स्वभाव किसी भी परिस्थिति में नहीं छोड़ना चाहिये । इसी सन्दर्भ में लगातार साधु को बार-बार काटने वाले बिच्छू और उसे बार-बार बचाने वाले साधु की कहानी अत्यन्त लोकप्रिय है, जिसमें साधु कहते हैं कि जब बिच्छू अपना स्वभाव नहीं छोड़ता तो मैं कैसे छोड़ दूँ ?

इसका कारण हर कोई ढूँढना चाहता है, जो आज आपने अपनी कहानी में स्पष्ट कर दिया ।

इस संसार में सबको मदद लेनी और देनी पड़ती है । दूसरे को तो हम नहीं बदल सकते , कम से कम स्वयम् को कृतघ्नता के भाव से बचा सकें इसके लिये, संकल्प बद्ध होना चाहिये ।

अगर आप यश प्राप्ति की चाह में किसी की मदद करते हैं तो सही मानिए आप सहज स्वभाववश उसकी मदद नहीं कर रहे हैं बल्कि एक डील कर रहे हैं कि मैं तेरी सहायता कर रहा हूँ बदले में तू मेरे लिए यश इकट्ठा कर ।
और भाई , डील में तो नफा होता है तो नुकसान भी होता है कभी कभी फिर रोना काहे का ।
याद रखिये , सहायता तभी सार्थक है जब वो सहज स्वभाववश की जाती है । यश की इच्छा से की गई सहायता एक व्यसन ही है ।

वृक्ष माता’ सालूमरदा थिमक्का,

वृक्ष माता’ सालूमरदा थिमक्का,
सालूमरदा थिमक्का कर्नाटक की रहने वाली पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता हैं । इन्होने अपने जीवन में कुल आठ हजार पेड़ लगाये हैं। इसमें चार सौ पेड़ बरगद के शामिल हैं। उन पेड़ों को लगाकर उनकी देखभाल करते हुए उन्हें बड़ा किया है और आज वो फल भी दे रहे है और प्राणवायु ओक्सिजन भी।
थिमक्का का जन्म कर्नाटक के तुमकुरु जिले के गुब्बी तालुक में हुआ था। उनका विवाह कर्नाटक के रामनगर जिले के मगदी तालुक के हुलिकल गांव के निवासी चिककैया से हुआ था। उसने कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली और पास के खदान में एक आकस्मिक मजदूर के रूप में काम किया। उसकी शादी चिक्कैया से हुई थी जो एक मजदूर था लेकिन वे दुर्भाग्यवश उनके कोई संतान नहीं हुई । इनकी शादी के कई साल बाद तक इनके घर कोई संतान नहीं हुई। इससे परेशान और मानसिक रूप से तंग आकर इन्होने आत्महत्या करने का विचार किया। ये उस समय उम्र के चौथे दशक में थी और बच्चे की उम्मीद अब पूरी तरह से छोड़ चुकी थीं लेकिन इन्होने कुछ और सोचा और ये फैसला कर लिया की अब वो पेड़ों को अपनी संतान बनाएगी और ऐसी हजारो संताने उत्पन्न करेगी। फिर क्या था शुरू कर दिए पेड़ लगाने…. । उनके लिए इन्होने अपना जीवन समर्पित कर रखा है। थीमक्का सालूमदरा को अब तक कई सारे सम्मान मिल चुके हैं। प्रकृति के प्रति उनका लगाव देखते हुए थिमक्का  का नाम ‘सालूमरादा’ रख दिया गया. लगातार एक ही पंक्ति में कई सारे पेड़ लगाने के बाद इन्हें ये सम्मान मिला। 65 साल का ये सफ़र आज भी जारी है। इनके पति की मौत साल 1991 में हो गई थी लेकिन उसके बाद इनके अंदर और अधिक हिम्मत आ गई और इन्होने पेड़ लगाने शुरू कर दिए। इसके बाद इन्होने एक बेटा गोद लिया जिसका नाम इन्होने उमेश रखा है।
थिमक्का की कहानी धैर्य और दृढ़ संकल्प की कहानी है.। साल्लुमरदा थिमक्का को अब तक कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। उनको दिए गए पुरस्कारों पद्म श्री, राष्ट्रीय नागरिक पुरस्कार
इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्षमित्र पुरस्कार के साथ कई पुरस्कार दिए गए है ।

प्रेरक कहानी…निस्वार्थ भलाई का कार्य….


एक आदमी को नाव पेंट करने के लिए कहा गया।
वह अपने साथ पेंट और ब्रश ले आया और नाव को एक चमकदार लाल रंग देना शुरू कर दिया, जैसा कि मालिक ने उसे निर्देशित किया था।

पेंटिंग करते समय, पेंटर ने देखा कि नाव में एक छोटा सा छेद है, तो उसने चुपचाप उसकी मरम्मत कर दी।

जब नाव की पेंटिंग समाप्त हो गई, तो उसने अपने पैसे प्राप्त किए और चला दिया।

अगले दिन, नाव का मालिक पेंटर के पास आया और उसे एक अच्छी राशि का चेक भेंट किया, जोकि पेंटिंग के लिए भुगतान की तुलना में बहुत अधिक था।
पेंटर आश्चर्यचकित हो गया और बोला “नाव को पेन्ट करने के लिए आपने मुझे पहले ही भुगतान कर दिया है सर!”

“लेकिन यह पेंट करने के लिए नहीं है। यह नाव में छेद की मरम्मत के लिए है।”

“आह! लेकिन वह इतनी छोटी सेवा थी … उसके लिए मुझे इतनी भारी राशि का भुगतान करने की आवश्यकता नहीं है।”

“मेरे प्यारे दोस्त, आप नहीं समझे। चलिए आपको बताते हैं कि क्या हुआ।
जब मैंने आपको नाव को पेंट करने के लिए कहा, तो मैं छेद के बारे में बताना भूल गया।
जब नाव सूख गई, तो मेरे बच्चे नाव लेकर मछली पकड़ने की यात्रा पर चले गए।
उन्हें नहीं पता था कि एक छेद था। मैं उस समय घर पर नहीं था।
जब मैं वापस लौटा और देखा कि वे नाव ले गए हैं, तो मैं हताश था क्योंकि मुझे याद आया कि नाव में छेद था।

मेरी राहत और खुशी की कल्पना कीजिए जब मैंने उन्हें मछली पकड़ने से लौटते हुए देखा।
फिर, मैंने नाव की जांच की और पाया कि आपने छेद की मरम्मत की थी! अब आप देखें, आपने क्या किया? आपने मेरे बच्चों की जान बचाई!
तो मेरे दोस्त उस महान कार्य के लिए तो ये पैसे भी बहुत थोड़े हैं …
मेरी औकात नहीं कि उस कार्य के बदले तुम्हे ठीक ठाक पैसे दे पाऊं …।

इसलिए कोई फर्क नहीं पड़ता कि कब, कहाँ या कैसे। बस मदद जारी रखें, लोगों के आंसू पोंछें, उन्हें ध्यान से सुनें और ध्यान से उन सभी ‘लीक’ की मरम्मत करें ।
जीवन मे “भलाई का कार्य” जब मौका लगे हमेशा कर देना चाहिए, भले ही वो बहुत छोटा सा कार्य ही क्यों न हो …क्योंकि कभी कभी वो छोटा सा कार्य भी किसी के लिए बहुत अमूल्य हो सकता है…।

✨इसलिए अच्छा काम करना जारी रखें

मैं उन सभी का शुक्रिया अदा करना चाहती हूँ जिन्होंने हर तरह से… शुभकामनाओं, विचार, प्रेम, देखभाल और प्रार्थना के रूप में मेरी नाव की मरम्मत की …🌹🙏

हम अपने रास्ते में आई कई छेद वाली नावों की मरम्मत लोगों को यह एहसास कराए बिना कि आपने कितने लोगों की जान बचाई है, कर सकते हैं और सदैव प्रयत्नशील रहें कि हम भी किसी की नाव रिपेयरिंग करने के लिए हमेशा तत्पर रहें…।

खुद भी मुस्कुराइए और दूसरों को भी मुस्कुराने की एक वजह जरुर दीजिए….

COVID-19 महामारी के इस चुनौतीपूर्ण समय में, जब मानव जाति अत्यधिक भावनात्मक उथल-पुथल से गुजर रही है, व्यक्ति अतीत के सुखों से चिपका, भविष्य की चुनौतियों और कुशंकाओं से ग्रस्त है। सतत बीमारी के एकालाप से अवसादित और एकरसता व जड़ता से पीड़ित भी। ऐसे कठिन समय में तुरंत इस नकारात्मकता की धारा को तोड़ने की सामर्थ्य सिर्फ हास्य से ही संभव है।

हँसी सबसे शक्तिशाली भावना है जो दुनिया को शांतिपूर्ण और सकारात्मक तरीके से ठीक कर सकती है। यह हमारी सेहत को बेहतर बनाने के लिए एक अच्छा व्यायाम भी है। हम भले ही किसी संकट से गुज़र रहे हों, लेकिन हमेशा खुश रहने के हमारे कारण हो सकते हैं। अच्छी हँसी का एक विस्फोट जादू की तरह काम करता है और किसी भी तनावपूर्ण स्थिति को एक अनुकूल में बदल देता है । हंसी दुनियाभर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर सकती है। जब मनुष्य हंसता है तो वह कुछ पलों के लिए सबसे अलग हो जाता है। उसके विचारों की श्रृंखला टूट जाती है। एकाग्रता आती है। मन-मस्तिष्क खाली व हल्के होने लगते हैं। हंसने से ना केवल एक व्यक्ति बल्कि उसके आस-पास के लोग, साथी-संगी भी हंसी के प्रभाव से वंचित नहीं रह पाते। एक हंसता हुआ चेहरा सभी को अच्छा लगता है। आप दुखी हों और अचानक से आपको कोई हंसता हुआ व्यक्ति टकरा जाए तो आप भी उसे देख खिलखिला उठते हैं। हंसने से सकरात्मक उर्जा का जहां संचार होता है ।

यह अटल सत्य है कि हम लाख चाहें फिर भी इस बात को नहीं जान सकते कि, हमारे आने वाले कल में क्या होगा ?? कल की बात तो बहुत दूर है, हम यह भी नहीं जान सकते कि हमारे आने वाले अगले पल में क्या होगा ??तो फिर किस बात की चिंता ? किस बात की फिक्र और किस बात की टेंशन ???
आज के समय में हमारे जीवन में जो सबसे जरूरी बात है……वो यह कि हम अपने आज में जियें, अपने हर पल को अपने जीवन का सबसे हसीन और खुबसूरत पल बनाएं । अपने परिवार के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताएं, अपने आप को स्वस्थ बनाएं और जो कुछ भी पाना चाहते हैं, उसी दिशा में पूरी निडरता और ईमानदारी से अपना पूरा प्रयास करें । इस तरह से हम न केवल वो पा लेंगे, जो हम पाना चाहते हैं, बल्कि हम एक स्वस्थ, सुखी और समृद्ध जीवन के मालिक भी बन जाएंगे ।
तो आएं निरायास हास्य का ही शुभ और स्वास्थकर संक्रमण फैलाएं और इस संकटकाल में एक स्वस्थ और खुशहाल समाज के लिए हंसते-हंसते अपना योगदान दें।
इस हास्य दिवस,
आइए एक हंसी दिल से साझा करें, लेकिन सुरक्षित दूरी 😃—–😃—- से

हारना मना है…🪴🪴


आज जब हर जगह ‘उदासी’ स्पष्ट तौर पर महसूस की जा रही है, तब भी हम ‘उम्मीद’ नहीं छोड़ सकते।
हम आज उन सभी संसाधनों को खोज नहीं पाएं हैं जिनकी हमें आवश्यकता है फिर भी, हम उनकी तलाश करना, या उन्हें बनाना बंद नहीं करेंगे। हम सभी को नहीं बचा पाएंगे, फिर भी हमें प्रयास किसी के लिए भी बंद नहीं करना चाहिए। हम भयभीत हैं, फिर भी आशान्वित हैं; क्योंकि जब तक हम हार नहीं मानते … हम असफल नहीं हो सकते।

विलियम अर्नस्ट हेनली की खूबसूरत कविता Invictus का खूबसूरत हिंदी अनुवाद को प्रस्तुत किया है प्रसिद्ध कहानीकार विनीत पंछी जी ने….जो आज के संदर्भ में बिल्कुल सटीक बैठती है।

‘I LOVE IT’ एक दृष्टिकोण….

एक महिला जो 80 वर्ष से अधिक उम्र की थी, अच्छी तरह से कपड़े पहनने, मेकअप लगाने और सुंदर पैटर्न में अपने बालों को व्यवस्थित करने की दिशा में बहुत सुरुचि थी।

उनकी और उनके पति की शादी को लगभग 60 साल हो गए थे।

अपने प्यारे साथी के जाने के बाद, उसकी देखभाल करने के लिए कोई संतान और परिवार में कोई नहीं था।
उसने एक नर्सिंग होम में जाने का फैसला किया।

उस दिन भी, जब उसने अपने घर को अच्छे के लिए खाली किया, तो उसने सुंदर कपड़े पहने और बहुत खूबसूरत लग रही थी।

नर्सिंग होम पहुंचने के बाद, उसे अपने कमरे के तैयार होने के लिए लॉबी में धैर्यपूर्वक इंतजार करना पड़ा।

जब एक परिचारिका उसे कमरे में ले जाने के लिए आई, तो उसने महिला को उस छोटे से स्थान का वर्णन किया जहां उसे रहने के लिए इस्तेमाल करना था।

“मैं इसे प्यार करती हूँ,” महिला ने आठ साल की उम्र के बच्चे को उत्साह के साथ व्यक्त किया, जिसने अभी एक नया पिल्ला उपहारस्वरूप प्रस्तुत किया था।

“श्रीमती जोन्स, आपने अभी तक कमरा भी नहीं देखा है … बस प्रतीक्षा करें,” परिचारक ने टिप्पणी की।

“ठीक है, मेरी खुशी का कमरे से कोई लेना-देना नहीं है,” महिला ने जवाब दिया।

“मुझे कमरा पसंद है या नहीं, इस बात पर निर्भर नहीं करता है कि फर्नीचर की व्यवस्था कैसे की गई है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि मैं अपने दिमाग की व्यवस्था कैसे करती हूं, खुशी ऐसी चीज है जिसे आप समय से पहले तय कर सकते हैं। और मैंने पहले ही अपने कमरे को , मेरे आसपास के लोगों को, मेरे जीवन को प्यार करने के लिए फैसला किया हुआ है । यह एक निर्णय है जो मैं हर सुबह उठने पर लेती हूं। जब आप जागते हैं, तो आप जानते हैं कि हमारे पास सबसे बड़ी संपत्ति , यह चुनने की शक्ति है कि हम कैसा महसूस करते हैं। “

महिला ने बोलना जारी रखा, क्योंकि उपस्थित व्यक्ति ने उसके मुखाग्र बिंदु से बोली गई बातों को ध्यानपूर्वक सुना।

“मैं अपना पूरा दिन बिस्तर में उस दर्द के बारे में सोचकर बिता सकती हूं, इससे मैं अपने शरीर के उन हिस्सों पर ध्यान केंद्रित कर रही हूं, जो अब काम नहीं कर रहे हैं या दर्द दे रहे है या मैं बिस्तर से बाहर निकल सकती हूं और उन हिस्सों के लिए आभारी हो सकती हूं जो काम करते हैं। प्रत्येक काम एक उपहार है, और जब तक मेरी आँखें अभी भी खुली हुई हैं, मैं आज पर ध्यान देना जारी रखूंगी और उन सभी सुखद यादों को जो मैंने मेरे जीवन में अपने दिमाग में इस समय के लिए संजो कर रखी हैं । “

उपस्थित महिला बुजुर्ग महिला के सकारात्मक दृष्टिकोण से चकित थी, जिसका जीवन एक बाहरी दृष्टिकोण से, केवल समस्याओं और निराशा से भरा था।

वास्तव में,
समस्याएं एक और सभी को आती हैं।
संघर्ष करते समय आनंदित रहना हमारी पसंद है ।

घृणा बार-बार आती है।
जो हमें करना चाहिए वह प्यार है….

नकारात्मकता हमारे दरवाजे पर प्रतिदिन दस्तक देती है।
सकारात्मक दृष्टिकोण हमारा लक्ष्य होना चाहिए।

शिकायत अपने आप आती है।
कृतज्ञता एक विकल्प है जिसे हम सभी को अपनाना है।

यह कहना ‘I LOVE IT’ एक दृष्टिकोण है जो आपमें पहले से मौजूद जीने के तरीके को और बेहतर बनाता है।

मैं इतना गरीब क्यों हूँ……

एक आदमी ने गुरू नानक से पूछाः मैं इतना गरीब क्यों हूँ?

गुरू नानक ने कहा : तुम गरीब हो क्योंकि तुमने देना नहीं सीखा…

आदमी ने कहा : परन्तु मेरे पास तो देने के लिए कुछ भी नहीं है।

गुरू नानक ने कहा : तुम्हारा चेहरा, एक मुस्कान दे सकता है.. तुम्हारा मुँह, किसी की प्रशंसा कर सकता है या दूसरों को सुकून पहुंचाने के लिए दो मीठे बोल बोल सकता है…तुम्हारे हाथ, किसी ज़रूरतमंद की सहायता कर सकते हैं…और तुम कहते हो तुम्हारे पास देने के लिए कुछ भी नहीं…।।

आत्मा की गरीबी ही वास्तविक गरीबी है… पाने का हक उसी को है.. जो देना जानता है।


कार्तिक पूर्णिमा , देव दीपावली और गुरुनानक जयंती की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं….!!

चौंसठ योगिनी मंदिर, भेड़ाघाट

कल दोपहर बाद हमारा भेड़ाघाट देखने का कार्यक्रम बना । वहीं भेड़ाघाट व धुआंधार जलप्रपात के नजदीक एक ऊंची पहाड़ी के शिखर पर स्थापित “चौंसठ योगिनी मंदिर” दिखा और उसे देखने की इच्छा मन में जागी तो सीढियां चढ़कर पसीने से लथपथ जब ऊपर पहुंचे तो वहां शिखर से हरी भरी भूमि और बलखाती नर्मदा नदी के विहंगम दृश्य ने मन मोह लिया ।
चौंसठ योगिनी मंदिर” जबलपुर की ऐतिहासिक संपन्नता में एक और अध्याय जोड़ता है। प्रसिद्ध संगमरमर चट्टान के पास स्थित “चौंसठ योगिनी मंदिर” का निर्माण सन् 1000 के आसपास “कलीचुरी वंश” ने करवाया था। शिल्पकला तभी विकसित हो गई थी, जब मानव सभ्यता का विकास हुआ लेकिन कलचुरि काल की पाषाणकला दूसरी शिल्पकला से एकदम हटकर है। इस काल की मूर्तियां महज एक कलाकृति नहीं बल्कि मूर्तियों के पार्श्व में किसी घटना, गूढ़ रहस्य अथवा ब्रह्मांड के किसी दर्शन के संकेत मिलते हैं।
मंदिर में प्रवेश के लिए केवल एक तंग द्वार बनाया गया है। चारदीवारी के अंदर खुला प्रांगण है, जिसके बीचों-बीच एक चबूतरा बनाया गया है। चारदीवारी के साथ दक्षिणी भाग में मंदिर का निर्माण किया गया है।

मंदिर के चारों तरफ़ करीब ऊंची गोलाई में चारदीवारी बनाई गई है, जो पत्थरों की बनी है । गोलाकार आकृति में बने इस मन्दिर की बाहरी दीवालों पर चौसठ योगिनियों की अद्भुत प्रतिमाएँ बनी हुई है । यह देखकर दुख हुआ कि सभी प्रतिमाएँ खण्डित है । कहानी वही मुस्लिम आक्रमण कारियों द्वारा इन प्रतिमाओं को खंडित किये जाने की ।
ये सभी चौंसठ योगिनी बहनें थीं तथा तपस्विनियां थीं, जिन्हें महाराक्षसों ने मौत के घाट उतारा था। राक्षसों का संहार करने के लिए यहां स्वयं दुर्गा को आना पड़ा था। इसलिए यहां पर सर्वप्रथम मां दुर्गा की प्रतिमा कलचुरी के शासकों द्वारा स्थापित कर दुर्गा मंदिर बनाया गया था तथा उन सभी चौंसठ योगिनियों की मूर्तियों का निर्माण भी मंदिर प्रांगण की चारदीवारी पर किया गया। लोगों का मानना है कि यह स्थली महर्षि भृगु की जन्मस्थली है, जहां उनके प्रताप से प्रभावित होकर तत्कालीन कलचुरी साम्राज्य के शासकों ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था । कालांतर में मां दुर्गा की मूर्ति की जगह भगवान शिव व मां पार्वती की मूर्ति स्थापित की गई है, ऐसा जानकारी एकत्र करने में पाया ।
मंदिर के अंदर भगवान शिव व मां पार्वती की नंदी बैल पर वैवाहिक वेशभूषा में बैठे हुए पत्थर की मनमोहक प्रतिमा स्थापित है।
इसके आगे एक बड़ा-सा बरामदा है, जो खुला है। बरामदे के सामने चबूतरे पर शिवलिंग की स्थापना की गई है । यहां नियमित पूजा होती है । यह मूल प्रतिमा खण्डित नही है । मन्दिर के पुजारी के अनुसार यह विश्व में इस तरह की एकमात्र ऐसी प्रतिमा है । मैंने भी कभी इस तरह नन्दी पर विराजमान शिव पार्वती की प्रतिमा देखी या सुनी नहीं है । सामान्यतः शिव मंदिर में शिवलिंग ही प्रतिष्ठित होते है । प्रतिमा भी बड़ी आकर्षक है । मेरी तो नज़र ही नहीं हट रही थी उस प्रतिमा से । शिव-पार्वती के बगल में ही कार्तिकेय और गणेश की प्रतिमाएं विराजमान हैं, मतलब पूरा शिव परिवार ही विराजमान है यहाँ।

मंदिर को बाहर से जब आप देखते हैं तब मालूम होता है कि यह मंदिर एक विशाल परिसर में फैला हुआ है और इसके हर एक कोने से भव्यता झलकती है। फोटोग्राफी के लिए भी बहुत सुंदर जगह है । मैं इतनी बार भेड़ाघाट गई हूं पर कभी भी यह मंदिर नहीं क्यो नही देखा इसका अफसोस हुआ।
शाम हो चली थी हमे लौटना पड़ा पर मन नहीं भरा सो जल्द ही अगली बार आने का निर्णय भी ले लिया । अगर आप जबलपुर आ रहे हैं तो इस मंदिर में ज़रूर जाएं।

रानी दुर्गावती महल, मदन महल जबलपुर

रानी दुर्गावती जी के जन्मदिन पर विशेष…. 05 अक्टूबर

रानी दुर्गावती जी के बारे में कम जानने वालों में मैं भी शुमार हूँ । बचपन में जबलपुर शहर में रहते हुए भी मैं रानी दुर्गावती जी के विषय में ज्यादा नहीं जान पाई थी बस इतना ही पता था कि शहर में मदन महल क्षेत्र में रानी दुर्गावती का किला है ।
मदन महल का किला मैंने पहली बार 1976 में देखा था उसके बाद मुझे ये किला दोबारा देखने का मौका 2015 में कार्यालयीन यात्रा के दौरान मिला लेकिन इस वर्ष पदोन्नति पर जबलपुर पोस्टिंग होने के बाद अगस्त में मुझे एक बार फिर इसे देखने का अवसर प्राप्त हुआ ।
मदन महल किला उन शासकों के अस्तित्व का साक्षी है जिन्होंने यहां 11वीं शताब्दी में काफी समय के लिए शासन किया था।
राजा मदन सिंह द्वारा बनवाया गया यह किला एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। विश्व के सबसे छोटे किले दर्जे का हकदार है मदनमहल का किला….। किला इतनी उंचाई पर है .जिससे पूरा जबलपुर दिखाई पड़ता है…!! मदन शाह द्वारा निर्मित मदन महल नष्ट हो चुका है। वर्तमान में जो स्वरूप मौजूद है वह महल के पास बनाया गया वॉच टावर है, जो ऊंचाई पर होने के चलते देखरेख के काम आता था। मदन महल में कमरे हैं उंची छत है, इस मदन महल किले के पिछले कमरे में सुरंग भी है,जिसके बारे में कुछ कहा नही जा सकता कि यह सुरंग कहाँ जाकर खुलती है.. इस किले के चारों तरफ हरियाली और ग्रेनाइट की चट्टानें हैं। कई गुफाएं भी हैं, जो आकर्षण का केन्द्र हैं। यहां सुबह या फिर शाम को सूर्यास्त के समय का नजारा अद्भुत रहता है।

इस किले की जानकारी एकत्र करने पर पाया कि रानी दुर्गावती जन्म 5 अक्टूबर 1524 में उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले में कालिंजर के राजा कीर्तिसिंह चंदेल के यहाँ हुआ था। वे अपने पिता की इकलौती संतान थीं। दुर्गाष्टमी के दिन जन्म होने के कारण उनका नाम दुर्गावती रखा गया। नाम के अनुरूप ही तेज, साहस, शौर्य और सुन्दरता के कारण इनकी प्रसिद्धि सब ओर फैल गयी।

दुर्गावती चंदेल वंश की थीं और कहा जाता है कि इनके वंशजों ने ही खजुराहो मंदिरों का निर्माण करवाया था और महमूद गज़नी के आगमन को भारत में रोका था। लेकिन 16वीं शताब्दी आते-आते चंदेल वंश की ताकत बिखरने लगी थी।

दुर्गावती बचपन से ही अस्त्र-शस्त्र विद्या में रूचि रखती थीं। उन्होंने अपने पिता के यहाँ घुड़सवारी, तीरंदाजी, तलवारबाजी जैसे युद्धकलायों में महारत हासिल की। अकबरनामा में अबुल फज़ल ने उनके बारे में लिखा है, “वह बन्दुक और तीर से निशाना लगाने में बहुत उम्दा थीं। और लगातार शिकार पर जाया करती थीं।”

1542 में, 18 साल की उम्र में दुर्गावती की शादी गोंड राजवंश के राजा संग्राम शाह के सबसे बड़े बेटे दलपत शाह के साथ हुई। मध्य प्रदेश के गोंडवाना क्षेत्र में रहने वाले गोंड वंशज 4 राज्यों पर राज करते थे- गढ़-मंडला, देवगढ़, चंदा और खेरला। दुर्गावती के पति दलपत शाह का अधिकार गढ़-मंडला पर था।

दुर्गावती का दलपत शाह के साथ विवाह बेशक एक राजनैतिक विकल्प था। क्योंकि यह शायद पहली बार था जब एक राजपूत राजकुमारी की शादी गोंड वंश में हुई थी। गोंड लोगों की मदद से चंदेल वंश उस समय शेर शाह सूरी से अपने राज्य की रक्षा करने में सक्षम रहा।
1545 में रानी दुर्गावती ने एक बेटे को जन्म दिया, जिसका नाम वीर नारायण रखा गया। लेकिन 1550 में दलपत शाह का निधन हो गया। दलपत शाह की मृत्यु पर दुर्गावती का बेटा नारायण सिर्फ 5 साल का था। ऐसे में सवाल था कि राज्य का क्या होगा?

लेकिन यही वह समय था जब दुर्गावती न केवल एक रानी बल्कि एक बेहतरीन शासक के रूप में उभरीं। उन्होंने अपने बेटे को सिंहासन पर बिठाया और खुद गोंडवाना की बागडोर अपने हाथ में ले ली। उन्होंने अपने शासन के दौरान अनेक मठ, कुएं, बावड़ी तथा धर्मशालाएं बनवाईं। वर्तमान जबलपुर उनके राज्य का केन्द्र था। उन्होंने अपनी दासी के नाम पर चेरीताल, अपने नाम पर रानीताल तथा अपने विश्वस्त दीवान आधारसिंह के नाम पर आधारताल बनवाया।

रानी का प्रजा के प्रति व्यवहार इतना अच्छा था की प्रजा रानी के लिए कुछ भी कर सकती थी ,रानी का मदन महल में एक किला था जिसमें रानी अपने परिवार के साथ रहने आया करती थी |
रानी के राज में प्रजा इतनी खुश थी की स्वेच्छा से कर के रूप में रानी को हाथी, घोडे, सोने के सिक्के दिये जाते थे ,जब इस बात का पता उस वक़्त के बादशाह अकबर को पता चला तो उन्होंने रानी दुर्गावती को एक सोने का पिंजरा भेजा जिसका अर्थ था कि स्त्रियों को पिंजरे में कैद रहना चाहिए प्रजा संभालना उनका काम नहीं ,तब रानी ने इसके जवाब में अकबर को रुई धुनने का समान भेजा था जिससे अकबर रानी से बुरी तरह से नाराज़ हो गया था ।
अकबर ने रानी पर आक्रमण करने के लिए तीन बार बाज़ बहादुर को भेजा पर रानी तीनों बार विजयी रहीं..रानी का शौर्य और पराक्रम किसी से कम ना था ये रानी ने दिखा दिया था ।
जब कुछ समय पश्चात पुनः रानी पर आक्रमण किया तब आसफ खान ने रानी के पुत्र वीरनारायण की हत्या कर दी वीरनारायण की मृत्यु से रानी विचलित हो गयी और मुगलों द्वारा घेर ली गयी और रानी पर आक्रमण होने लगे तथा रानी घायल हो गयी ,तब रानी ने गुलाम बनना स्वीकार नहीं किया ,रानी नहीं चाहती थी कि कोई उसकी देह को हाथ भी लगाये ..तब रानी ने अपनी कटार निकाल कर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली । रानी दुर्गावाती जब तक जी सम्मान से जी . । 39 वर्ष की आयु में रानी ने 24 जून 1564 को अपने प्राण त्याग दिए थे ।
जबलपुर के पास जहां यह ऐतिहासिक युद्ध हुआ था, उस स्थान का नाम बरेला है, जो मंडला रोड पर स्थित है, वही रानी की समाधि बनी है, जहां गोंड जनजाति के लोग जाकर अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। जबलपुर में स्थित रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय भी इन्हीं रानी के नाम पर बना हुआ है।

इसके अलावा भारत सरकार ने साल 1988 में रानी दुर्गावती के सम्मान में एक पोस्टल स्टैम्प भी जारी किया था ।

रानी दुर्गावती की जीवन गाथा पढ़ने पर मैंने यह पाया कि रानी दुर्गावती और रानी लक्ष्मीबाई के शौर्य में कोई फर्क नहीं है दोनों का इतिहास गौरवशाली है..फर्क सिर्फ इतना है कि रानी दुर्गावती की लडाई मुगल साम्राज्य से थी और लक्ष्मीबाई जी की लडाई अँग्रेज़ों से थी..।रानी दुर्गावती के समय के इतिहासकार रानी दुर्गावती के विषय में इतिहासकारों ने अधिक वर्णन नहीं किया क्योंकि उस वक्त के इतिहास्कार अकबर के विरुद्ध नहीं लिख सकते थे । रानी दुर्गावती ,रानी लक्ष्मी बाई, रानी अवन्ती बाई लोधी इन तीनो रानियों के शौर्य में एक बात की समानता थी कि इन तीनों ने अपने स्वभिमान को सर्वोपरी रखा अपने आत्मसम्मान की रक्षा करते हुए तीनो ने गुलाम बनना स्वीकार ना करते हुए कटार स्वयं को मारकर अपने प्राण त्याग दिये ..।
रानी दुर्गावती उस वक्त के शक्तिशाली बादशाह से अपने स्वाभिमान और आत्मसम्मान के लिये लडी..यह लडाईयाँ बादशाह अकबर के अहम की थी क्योंकि रानी ने अकबर को यह बता दिया था कि वो मुगल साम्राज्य से लडने की हिम्मत रखती है । अकबर का रानी के हाथों इस तरह अपमानित होना युद्ध का कारण बना.।
इसे इत्तेफाक ही कह सकते हैं कि तीनों रानी की शौर्यगाथा एक सी है..।
रानी के शौर्य और पराक्रम के बारे में सुनकर मैं सोच में डूब गई कि उस वक्त की महिला इतनी सशक्त थी..और हम आज नारी सशक्तिकरण के लिये आवाज़ उठा रहे हैं जबकि नारी शताब्दियो से सशक्त ही रही है, जरुरत है तो बस नारी को अपनी शक्ति पहचानने की..!!
राज्य व धर्म की रक्षा के लिए रणभूमि को चुनकर अपने अदम्य साहस व शौर्य का परिचय देने वाली अमर वीरांगना रानी दुर्गावती जी की जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन 💐🙏।
अभी हाल में ही मदन महल को देखने जाने के दौरान लिए गए कुछ छायाचित्र …