रविन्द्र नाथ टैगोर…

जन्मदिवस विशेष…..

रवीन्द्रनाथ टैगोर विलक्षण प्रतिभा के व्यक्ति थे। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे एक साथ महान साहित्यकार, समाज सुधारक, अध्यापक, कलाकार एवं संस्थाओं के निर्माता थे । ऐसे महान शिक्षक, कहानीकार, चित्रकार, नाटककार, गायक,कवि और दार्शनिक गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर को उनके जन्मदिवस पर सादर प्रणाम!


रवींद्रनाथ टैगोर ने बहुत सी कविताएं , नाटक और कहानियां लिखी हैं उनमें से पोस्टमास्टर, स्वामी का पता ,अपरिचिता, भिखारिन और काबुलीवाला कहानियां आज भी हृदय पटल पर अंकित है।इन्हें आज भी पढ़कर आँखे नम हो जाती हैं । मैने इनको जितना पढा उसमें यह पाया है कि इनकी रचनाओं एवं जीवन दर्शन में मानव करूणा, गरीबी का महत्वपूर्ण स्थान है।उनकी नोबेल पुरस्कार प्राप्त काव्य रचना “गीतांजलि” ईश्वर के प्रति निष्ठा, प्रकृति प्रेम और मानवता वादी मूल्यों पर आधारित है ।

मेरी रक्षा करो विपत्ति में, मेरी यह प्रार्थना नहीं है ।
मुझे नही हो भय विपत्ति में, मेरी चाह यही है ।।
….गीतांजलि से बहुत सुंदर लाइनें ।


हालांकि कोई भी रचना अपने मूल स्वरूप में ही उत्कृष्ट होती है । इसे बांग्ल भाषा में लिखा गया परन्तु मैने इसे हिंदी अनुवाद स्वरूप में ही पढा है । इस उत्कृष्ट रचना को पढ़कर मन आध्यात्मिक हो जाता है । इसके अलावा रवींद्रनाथ टैगोर जी के द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन के समय सुउद्देश्यपूर्ण लिखित अंग्रेज़ी कविता जिसमे स्वाधीनता की सार्थकता बताते हुए नए भारत की तस्वीर रखी गई थी, वह आज के परिपेक्ष्य में भी अपना स्थान रखती है ।


Where the mind is without fear.

and the head is held high,

where knowledge is free.

Where the world has not been broken up

into fragments by narrow domestic walls.


Where words come out from the depth of truth


Where tireless striving stretches its arms towards perfection


Where the clear stream of reason has not lost its way


Into the dreary desert sand of dead habit


Where the mind is led forward by thee


Into ever-widening thought and action


Into that heaven of freedom, my Father, let my country awake.


कवि और लेखकों का यह कर्तव्य और उत्तरदायित्व होता है कि वो जनमानस को उत्थान की ओर उन्मुख करें ।टैगोर जी का जीवन भी इसी दिशा में समर्पित था ।
आज उनके जन्मदिवस के अवसर पर सादर नमन और श्रद्धान्जलि अर्पित करती हूं

07.05.2020

रामायण सीरियल का पुनः प्रसारण…

हरि अनन्त, हरि कथा अनन्ता।

कहहिं, सुनहिं, बहुबिधि सब संता।।

दूरदर्शन द्वारा 33 वर्षों बाद लॉकडाउन अवधि में रामायण सीरियल का पुनः प्रसारण किया गया । लॉकडाउन के 40 दिन कैसे निकल गए पता ही नही चला। पूरी दिनचर्या प्रसारण समय के अनुसार सेट हो गई । उत्तर रामायण के सभी एपिसोड रिपीट किए गए वो सभी रिपीट एपीसोड भी उतनी ही शिद्दत के साथ देखे और हमेशा ऐसा लगता रहा कि इसका प्रसारण अनवरत चलता रहे । सीरियल खत्म होने पर मन बहुत भावविभोर हो रहा है ।
रामायण को तब और अब देखने में बहुत बड़ा फर्क लगा वो यूँ कि तब मैं कॉलेज में पढ़ रही थी और संस्कृति की इतनी समझ भी न थी । अभी भी सब वही है पर उम्र के साथ देखकर समझने , आत्मसात करने की क्षमता बढ़ गई है । कुछ प्रसंग और पात्र जैसे पुष्प वाटिका में सीता जी का राम को देखने जाना, रामविवाह, केवट प्रसंग, निषादराज, भरत मिलाप, पुष्पक विमान में सीता हरण के वक्त जटायु द्वारा बचाने का प्रयास , लक्ष्मण और हनुमान जी की भक्ति, वाल्मीकि आश्रम में सीता जी का रहना,लव कुश तो मानस पटल पर सदा के लिए अंकित हो गए ।इसके साथ ही मेघनाद, कुम्भकर्ण के पात्रों ने भी छाप छोड़ी।
आज लव कुश द्वारा भगवान श्रीराम जी के समक्ष एक गीत के माध्यम से रामायण का कुछ भाग और अपना परिचय देने का जो सजीव चित्र रखा गया उसने आंखे सजल कर दी …. !! इस अत्यन्त भावुक कर देने वाले दृश्य के साथ ही धारावाहिक “रामायण” का अन्त हुआ लेकिन अपने पीछे छोड़ गया
एक ‘पाठ’ ……
पाठ हमारी संस्कृति का ,
धर्म का ,मर्यादा का ,
परम्परा का ,मान सम्मान का , आचरण का …..!!
हमारी सम्पूर्ण शिक्षा का सार हमारे रामायण महाकाव्य में है । रामानंद सागर जी ने टीवी सीरियल के जरिए जिस प्रकार जन जन तक इसे पहुंचाने का काम किया वह बेहद सराहनीय है । सागर जी ने हर एक पात्र को सांचे में ढालकर बहुत ही गज़ब प्रस्तुति दी है ।रामायण का ऐसा सुंदर फिल्मीकरण दोबारा कभी नहीं हो सकता। आज बेहतर तकनीक है और भी कई चीजें बेहतर है 1987 की तुलना में सब कुछ बेहतर है लेकिन आज आपको न तो पात्रों के चयन के लिए अरुण गोविल मिलेंगे, न दीपिका चिखलिया मिलेंगी… न दारा सिंह और न अरविन्द त्रिवेदी… न सुनील लाहिरी और न विजय अरोड़ा… न ललिता पवार और न ही रवीन्द्र जैन मिलेंगे… और भी जाने क्या-क्या रामायण के इस रूप के साथ सम्पूर्ण है… इसे बेहतर करने की कोशिश इसे खराब करना ही होगी…।
आज रामायण सीरियल तो खत्म हुआ पर लॉक डाउन के इस समय में रामायण का आना और नई पीढ़ी द्वारा भी इस रामायण को देखना, इससे हमारी नई पीढ़ी भी बहुत लाभान्वित हुई । साथ ही यह सीरियल नयी युवा पीढ़ी के लिए यह एक जिम्मेदारी भी छोड़ गया है , जिम्मेदारी……..
अपनी संस्कृति को इसी प्रकार बनाए रखने की …
धर्म, परम्परा ,मान मर्यादा , प्रतिष्ठा को समझने की …
उसी के अनुकूल अपना आचरण करने की …..
आने वाली पीढ़ियों को सनातन संस्कृति के इस मार्ग पर चलने की …..।
जैसे घर को साफ रखने के लिये नित्य ही झाडू-पोछा करना पडता है अन्यथा कुछ ही दिनों में घर धूल-धक्कड से भर जाता है वैसे ही मानव मस्तिष्क को सदैव परिष्कृत करते रखने की आवश्यकता होती है जिसके लिये अच्छा देखना,सुनना और पढना बहुत आवश्यक होता है । रामायण देखकर एक बार फिर उच्च आदर्शों के साथ जीवन जीने की प्रेरणा मिली ।
धन्यवाद दूरदर्शन को जिसने इस विपदा के समय सभी भारतीयों को साक्षात श्री राम के सम्पूर्ण जीवन का दर्शन कराया । उम्मीद है समय-समय पर यूँ ही पुनः प्रसारण होता रहेगा ताकि हमें अपने जीवन में इसका सदैव स्मरण रहे ।
धन्यवाद पूरी रामायण की टीम को जिनके द्वारा प्रभु राम , माता सीता एवं अन्य का साक्षात रुप धारण कर आलौकिक दर्शन कराया ।
धन्यवाद श्री अरुण गोविल जी को भी, जिन्होंने अपने पेज पर रामायण के हर एपिसोड के प्रसारण के बाद उस एपिसोड की 5 मिनिट की विवेचना में उस एपिसोड का सार और उसमे निहित अर्थ बताए । जिससे सीरियल देखने में और रोचकता बढ़ी और समझने में सरलता आई।
रामायण भारतीय संस्कृति का सबसे मजबूत और प्रामाणिक दस्तावेज है। इस दस्तावेज़ को रामानंद सागर जी द्वारा धाराविक रूप में चित्रण करना वाकई प्रेरणादायक है और इसकी सजीव छाया हमारे मन में हमेशा जिंदा रहेगी ।
03.05.2020 ऋतु नायक

ख्याल….

ये ख्याल भी दबे पांव अपनी रफ्तार से ऐसे आते हैं कि…

अक्सर, ये मेरा जहन, भी थक जाता है पर , रफ़्तार ख़यालों की कभी नहीं थमती !!

ये ख्याल भी इतने अजीब होते हैं कि कभी भी कहीं से भी आ जाते हैं और कौन सा ख्याल कब और कहाँ से आयेगा ये तो उन्हें भी पता नहीं होता…!!

कुछ कह लें हम .. या कुछ .. सुन ही लें,
कह दो, जो रह गया .. कुछ कहा या अनकहा सा !!

वैसे एक बात जो हर किसी में समान है, वो ये कि, उनके सबसे बेहतरीन ख्याल उन्हें तब आते हैं जब उन्हे शब्दों में पिरोना उस वक्त उनके लिए संभव ना हो| और जब तक आप कागज और कलम का साथ पाते हैं तब तक ये ख्याल आपका साथ छोड़ के कहीं दूर जा चुके होते हैं… और वो शब्द जो आपने अपने दिमाग में करीने से सजा कर रखे थे वो आपके विचारों के पिंजरे से आजाद हो अपनी ऊँची उड़ान भर चुके होते हैं| अब बचे हुए आधे अधूरे ख्यालों को उन दूर जा चुके शब्दों में वापस पिरोना उतना ही जटिल हो जाता है जितना इंसान के लिए अपनी गलती तलाशना और फिर उसे सुधारना…!!

जब आप उन ख्यालों को शब्द देते हैं जिनको आपने महसूस किया होता है तब आप एक अनुभव को अपनी अभिव्यक्ति का रूप देते हैं.! जब हम अपने ख्यालों के एहसास को लपेट कर कागज़ी लिबास में सजाकर पल-पल परिवर्तित होते भावों को शब्दों की गति में बाँधकर पिरोते हैं तो यह करना आसान नहीं होता है पर अद्भुत एहसास ज़रूर होता है..!!

अपने ख्यालों को कागज पर उतारने का ख्याल तो अक्सर आता ही रहता है और अगर गलती से आपने अपनी पूरी कोशिश के बाद कुछ शब्द कागज पर लिखे भी तो वो वैसे नहीं दिखते ज़िसकी आपने कल्पना की थी …. !

इसके बावजूद आपको लिखना बंद नहीं करना है ……क्योंकि अगर वैसा नहीं लिख पाए जैसा लिखना चाहते थे … तो उससे कुछ बेहतरीन ही लिखने का प्रयास किया जाए…..!! यही प्रयास में आरम्भ कर रही हूँ…. ।

एक पाती सखी के नाम…

प्रिय सखी जयश्री,
वो भी क्या दिन थे…!!
जब बात निकालती है तो दूर तलक तो जाती ही है……!!
आज तुमने एक बार फिर उन बीते दिनों की याद ताज़ा कर दी । ये उन दिनों की है जब जिंदगी की रफ़्तार कुछ धीमी थी तब न इस भागदौड़ की जरुरत थी और न ही इतनी चिंता और भीड़भाड़ से भरी एक हताश करने वाली अर्थहीन दौड़ थी । मुझे याद है कि मेरी शादी के बाद हम अपने जीवन को आगे बढाने और जिम्मेदारियों के निर्वहन में इतना व्यस्त हो गए कि यात्रा पर जाने की सुध न रही । मई 2002 में अक्षिता एक साल की हो गई थी और पैदल भी चलने लगी थी । तब हम दोनों को ही लगने लगा था कि अब इस जीवन की एक सी दिनचर्या से मन ऊब रहा है तो एक ब्रेक की बहुत आवश्यकता है । तो क्यों ना , कहीं यात्रा पर निकला जाए । यात्रा करना किसे पसन्द नहीं …! तुम्हें मालूम है कि मुझे और तुम्हें दोनों को ही घूमना बहुत पसन्द है । घूमने में हमेशा से मेरी दो पसन्द हैं … पहाड़ और समंदर ! पहाड़ इसलिए कि वहां जाकर ऐसा लगता है कि जैसे प्रकृति की गोद में समा गए हों और समंदर इसलिए कि समंदर किनारे जाकर आप आराम के साथ साथ खेल मस्ती कर पाते हो । चूंकि उस वक्त गर्मियां अपने चरम पर थी सो पहाडों पर जाने का प्लान बनाया । पहाड़ और बर्फ का ध्यान आते ही सबसे पहले हम दोनों के ही दिमाग मे शिमला, कुल्लू मनाली का ध्यान आया । हम दोनों ने अपनी एल टी सी पर जाने की तैयारी शुरू कर दी । तब मोबाइल सिर्फ फोन और sms तक सी सीमित थे और इंटरनेट सिर्फ कम्प्यूटर पर ही उपलब्ध था सो नेट से इन जगहों पर जाने की जानकारी एकत्र करनी शुरू कर दी ।और ट्रेन के टिकिट ले लिए । गेस्ट हाउस बुक करा दिए जहां गेस्ट हाउस नही मिले वहां की जगहों पर होटल में रुकने के लिए जानकारी एकत्रित करके रख ली ।हनीमून के बाद यह मेरी पहली यात्रा थी । हम बहुत रोमांचित हुए जा रहे थे कि हम बर्फ पे जा रहे थे क्योंकि बर्फीली जगह पर जाने की यह हमारी पहली यात्रा थी । यह प्लान बनते बनते और फाइनल होते होते परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी कि हम दोनों का साथ घूमने जाना संभव न हो सका, अलग अलग प्रोग्राम बनाना पड़ा। मैने शिमला, कुल्लू, मनाली और धर्मशाला घूमने का ही कार्यक्रम बनाया जबकि तुमने तो अपने पूरे परिवार को सम्मिलित कर लिया था और तुम्हारा 20 दिनों का लम्बा चौड़ा कार्यक्रम तैयार हुआ था जिसमें हरिद्वार, ऋषिकेश, देहरादून, मसूरी, दिल्ली , शिमला,कुल्लू मनाली धर्मशाला और आगरा शामिल थे । हमारा प्रोग्राम फाइनल होने के बाद हम दोनों बहुत रोमांचित हुए जा रहे थे ।हमारी जाने की तैयारियां शुरू हो गई थीं । हमने और तुमने ट्रेन की समयसारिणी, स्वेटर्स, ज़रूरी दवाइयां ,कैमरा कपड़े ,खाने का कुछ सामान आदि पैक करके रखने के साथ अपनी अपनी यात्रा अपने निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार शुरू कर दी थी । यहां से मैं तुम्हे मेरी यात्रा का संक्षिप्त वर्णन तुम्हें इसलिए सुनाऊँगी ताकि हम उन स्थानों में सँजोई हुई अपनी स्मृतियों की याद फिर से ताजा कर सकें । मेरी यात्रा भोपाल से 10 जून 2002 को दिल्ली के लिए और दिल्ली से कालका पहुंचकर सुबह टॉय ट्रेन से शिमला के लिए शुरू हुई । रास्ते में सामने खडी पहाड़ियों को देख सुखद अनुभूति हुई क्योंकि अभी तक हम मैदान, खेत और धरती-आकाश को मिलाते अनन्त क्षितिज को देखते हुए चले आ रहे थे । ऐसे में, सुबह-सुबह पहाड़ियों का दर्शन एक ताजगी देने वाला अनुभव था । एक के बाद दूसरा और फिर तीसरा पहाड़ देखकर मन बहुत प्रसन्न हो उठा था और पहाड़ों पर बर्फ देखने का कौतूहल बढ़ता जा रहा था । कुछ देर बाद शिमला स्टेशन आ गया ।हम अपने पहले पड़ाव पर 12 जून को पहुंच गए थे । शिमला में रहकर हमने माल रोड, जाखू मंदिर, कुफरी,ग्रीन वैली , नालदेरा आदि देखा फिर वहां से कुल्लू के लिए निकले ।
कुल्लू में काली बाड़ी मंदिर, रघुनाथ मंदिर, बिजली महादेव मंदिर और वैष्णो देवी मंदिर, मनिकरण आदि देखकर हम रवाना हुए मनाली की ओर । कुल्लू से मनाली के रास्ते में प्रकृति छटा के मनमोहक सजीले दृश्य, श्वेत बर्फीली चोटियां, बहते झरने अत्यंत मनमोहक हैं । मनाली में एक तरफ नगर के बीचो-बीच निकलती व्यास नदी पर्यटकों को लुभाती है, तथा हरे भरे वन यहां आने वाले हर पर्यटक को अपनी ओर आकर्षित करते हैं यहाँ हमने हिडिम्बा देवी मंदिर, मनु मंदिर, तिब्बती मोनेस्ट्री देखीं । इसके बाद इस पूरी यात्रा के मुख्य आकर्षण रोहतांग पास के लिए 17 जून को निकले ।हम इस रोमांचक सफ़र और नजारों का आनन्द लेते हुए चले जा रहे थे ।रास्ते में कई जगह खाने-पीने और गर्म कपड़े, जूते और दस्ताने किराए पर उपलब्ध कराने वाली अनेको दुकाने थी । हमने भी एक दुकान से ट्रेकिंग जूते और गर्म कपड़े किराए पर ले लिए थे ।और कुछ देर बाद हम पहुंच गए रोहतांग पास । यहां आकर प्रकृति के विराट स्वरूप के दर्शन हुए और यहाँ के उन्मुक्त वातावरण में कुछ देर के लिए हम खो ही गए । विश्वास ही नहीं हो रहा था कि हम रोहतांग आ पहुंचे हैं । यहाँ से नजर आती बर्फ से ढकी सुन्दर हिमालय पर्वतमाला मन को मन्त्र-मुग्ध कर दिया था । किसी स्वर्ग से कम नहीं लग रही थी यह जगह । यहाँ के स्थानीय लोगो और फोटोग्राफरो ने बर्फ के पुतले, सुंदर रंगीन फूलो और कागजो से सजे मॉडलनुमा छोटे घर फोटो खींचने के लिए बना रखे थे । हमने भी वहां फोटो खिंचाई । इन खूबसूरत वादियों को कैमरे में कैद कर हम अपने अंतिम पड़ाव धर्मशाला आ पहुंचे । धर्मशाला में हमने मुख्य रूप से सेंट जॉन चर्च, मैक्लोडगंज,दलाई लामा मंदिर, वार मेमोरियल , चामुंडा देवी मंदिर देखे और यात्रा समाप्ति की ओर वहां से पठानकोट आ गए । पठानकोट से ट्रेन पकड़कर भोपाल आ गए ।
तुम्हे याद है कि भोपाल आने के बाद हम दोनों ने एक दूसरे के फोटो एलबम देखे और न जाने कितने दिनों तक हम आपस मे इस यात्रा की और वहां ली गई फोटो पर चर्चा करते रहे और आनन्द की अनुभूति प्राप्त करते रहे ।ट्रिप से आने के एक माह बाद की एक रेयर फोटो भी शेयर कर रही हूँ जिसमें हम दोनों का परिवार है और 2 फोटो और पोस्ट कर रही है जो ये बताती हैं कि तुम्हारे बंगलौर जाने के बाद हम 2 बार ही मिल पाए ।
जयश्री… कहां गए वो दिन, वो हमारी निरन्तर चलने वाली बातें, वो समय , वो हमारा साथ साथ घूमना, साथ में खाना खाना ,….. क्या कभी दोबारा पलटेंगे..? शायद कभी नहीं…? बस मधुर स्मृतियों के रूप में सब कुछ संजो कर रखा हुआ है । यादों के पन्ने पलटती हूँ तो लगता है कि जैसे कल की ही बात है पर इस बात को ही 18 वर्ष बीत चुके हैं । मैं अभी भी सोचती हूँ कि तब हम घूमने नहीं जा पाए पर भविष्य में कभी तो वो समय आएगा कि हम फिर साथ किसी स्थल पर घूमने जाएंगे । ऐसी ही आशा के साथ तुम्हें ढेर सारा प्यार…. तुम्हारी रितु

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