जीवन एक बहती धारा… 🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃

एक समय की बात है गंगा नदी के किनारे पीपल का एक पेड़ था. पहाड़ों से उतरती गंगा पूरे वेग से बह रही थी कि अचानक पेड़ से दो पत्ते नदी में आ गिरे।एक पत्ता आड़ा गिरा और एक सीधा। जो आड़ा गिरा वह अड़ गया, कहने लगा, “आज चाहे जो हो जाए मैं इस नदी को रोक कर ही रहूँगा…चाहे मेरी जान ही क्यों न चली जाए मैं इसे आगे नहीं बढ़ने दूंगा.”
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वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा – रुक जा गंगा ….अब तू और आगे नहीं बढ़ सकती….मैं तुझे यहीं रोक दूंगा! पर नदी तो बढ़ती ही जा रही थी…उसे तो पता भी नहीं था कि कोई पत्ता उसे रोकने की कोशिश कर रहा है. पर पत्ते की तो जान पर बन आई थी..वो लगातार संघर्ष कर रहा था…नहीं जानता था कि बिना लड़े भी वहीँ पहुंचेगा जहाँ लड़कर थककर हारकर पहुंचेगा! पर अब और तब के बीच का समय उसकी पीड़ा का…. उसके संताप का काल बन जाएगा।
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वहीँ दूसरा पत्ता जो सीधा गिरा था, वह तो नदी के प्रवाह के साथ ही बड़े मजे से बहता चला जा रहा था।
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यह कहता हुआ कि “चल गंगा, आज मैं तुझे तेरे गंतव्य तक पहुंचा के ही दम लूँगा…चाहे जो हो जाए मैं तेरे मार्ग में कोई अवरोध नहीं आने दूंगा. तुझे सागर तक पहुंचा ही दूंगा। नदी को इस पत्ते का भी कुछ पता नहीं…वह तो अपनी ही धुन में सागर की ओर बढती जा रही है. पर पत्ता तो आनंदित है, वह तो यही समझ रहा है कि वही नदी को अपने साथ बहाए ले जा रहा है. आड़े पत्ते की तरह सीधा पत्ता भी नहीं जानता था कि चाहे वो नदी का साथ दे या नहीं, नदी तो वहीं पहुंचेगी जहाँ उसे पहुंचना है! पर अब और तब के बीच का समय उसके सुख का…. उसके आनंद का काल बन जाएगा।
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जो पत्ता नदी से लड़ रहा है…उसे रोक रहा है, उसकी जीत का कोई उपाय संभव नहीं है और जो पत्ता नदी को बहाए जा रहा है उसकी हार को कोई उपाय संभव नहीं है।
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जीवन भी उस नदी के सामान है और जिसमे सुख और दुःख की तेज़ धारायें बहती रहती हैं और जो कोई जीवन की इस धारा को आड़े पत्ते की तरह रोकने का प्रयास भी करता है तो वह मुर्ख है क्योंकि ना तो कभी जीवन किसी के लिये रुका है और ना ही रुक सकता है ।

वह अज्ञान में है जो आड़े पत्ते की तरह जीवन की इस बहती नदी में सुख की धारा को ठहराने या दुःख की धारा को जल्दी बहाने की मूर्खता पूर्ण कोशिश करता है । क्योंकि सुख की धारा जितने दिन बहनी है उतने दिन तक ही बहेगी आप उसे बढ़ा नही सकते, और अगर आपके जीवन में दुख का बहाव जितने समय तक के लिए आना है वो आ कर ही रहेगा, फिर क्यों आड़े पत्ते की तरह इसे रोकने की फिजूल मेहनत करना।
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बल्कि जीवन में आने वाले हर अच्छी बुरी परिस्थितियों में खुश हो कर जीवन की बहती धारा के साथ उस सीधे पत्ते की तरह ऐसे चलते जाओ जैसे जीवन आपको नही बल्कि आप जीवन को चला रहे हो । सीधे पत्ते की तरह सुख और दुःख में समता और आनन्दित होकर जीवन की धारा में मौज से बहते जाएँ।
और जब जीवन में ऐसी सहजता से चलना सीख गए तो फिर सुख क्या ?

मदद-हमारा अधिकार भी,कर्तव्य भी….


आप मदद करना मत छोड़िए। ये जानते हुए भी कि आप जिसकी मदद करते हैं, वो आख़िर में आपका दुश्मन बन जाता है। लेकिन इससे क्या होता है? मदद करना एक आदत होती है। ऐसी आदत जिसमें सुकून है।

बाल गंगाधर तिलक ने एक अनाथ बच्चे को अपने पास रख कर उसे पाला, पढ़ाया और नौकरी तक में उसकी मदद की थी। वो बच्चा जब बड़ा हो गया, तो इस कुंठा में जीता था कि जीवन में उसने जो कुछ भी पाया, किसी की मदद से पाया है। ऐसे में जब वो तिलक से अलग रहने चला गया तो जब कभी मौका मिलता तिलक की बुराई करता। तिलक तक उसकी बातें पहुंचती थीं, पर तिलक कभी प्रतिक्रिया नहीं जताते थे।
उसके जाने के बाद तिलक के साथ कोई और रहने लगा। वो बच्चा को जो तिलक की मदद से सेटल हो चुका था, जब उसे पता चला कि तिलक के साथ कोई और रह रहा है, तो एक दिन तिलक के पास आया और बात-बात में उसने उनसे कहा कि बाबा, आप जिस व्यक्ति को अपने साथ रखे हैं, वो बाहर आपकी निंदा करता है।
तिलक मुस्कुराए। फिर उन्होंने कहा, “मेरी निंदा? पर क्यों? मैंने तो उसकी कोई मदद ही नहीं की। जब मैंने उसकी कोई मदद ही नहीं की तो वो मेरी निंदा भला क्यों करेगा?”

कहानियां सच होती हैं। वो होती ही इसलिए हैं ताकि हम जीवन को समझ पाएं। समझ पाएं कि आपके साथ जो हो रहा है, वो सिर्फ आपके साथ नहीं हो रहा। असल सच्चाई यही है कि जब भी आप किसी की मदद करते हैं तो मदद लेने वाला खुद को छोटा समझ कर आपके किए को स्वीकार नहीं करना चाहता। बस यहीं से शुरू होता है द्वंद्व। ये द्वंद्व कृत्घनता को जन्म देता है। आदमी शुक्रगुज़ार होने की जगह नाशुक्रा हो जाता है। मूल रूप से सच इतना ही है कि एक आदमी की मदद कीजिए, एक दुश्मन तैयार कीजिए।

“मदद पाने वाला अहसान के तले नहीं दबना चाहता, इसलिए आपके विरुद्ध होकर वो अहसान को नकारता है। अगर थोड़ा रंग-रोगन लगा कर बात कहूं तो मदद के बदले की जाने वाली शिकायत मूल रूप से किए गए अहसान का नकारात्मक विरोध भर है। पर इसका बुरा नहीं मानना चाहिए या बुरा लगे भी तो तिलक की तरह उसे भूल कर फिर किसी की मदद करने की कोशिश शुरू कर देनी चाहिए।
इस सच को जानते हुए भी बाद में शिकायत मिलेगी, अपमान मिलेगा। पर जैसा कि मैंने कहा है कि मदद ही सुकून है, तो तमाम तकलीफों के बाद भी मदद के हाथ बढ़ाना मत छोड़िेगा।
उसका किया उसके साथ। आपका किया आपके साथ।

हम एक दूसरे की मदद करते रहते हैं। मदद लेते भी हैं और करते भी हैं। मदद पाना हमारा अधिकार है और मदद करना हमारा कर्तव्य।
ईश्वर ने एक मदद बैंक बनाई है। आपके द्वारा की गई किसी को मदद उस मदद बैंक में जमा हो जाती है। जब आपको मदद की जरूरत होती है तो आपको उसी मदद बैंक से मदद मिल जाती है। ठीक बैंक की तरह, वह नोट आपको नहीं मिलेंगे, जो आपने जमा किये।
मेरा तो यही अनुभव रहा है, जब मदद की जरूरत पड़ी, नए मददगार सामने आ गए। वह नहीं आये, जिनकी मैंने मदद की थी।

“जो तोकूँ कॉटा बुवै, ताहि बोय तू फूल।
तोकूँ फूल के फूल हैं, बाकूँ है तिरशूल ।।”

हमें अपना मूल स्वभाव किसी भी परिस्थिति में नहीं छोड़ना चाहिये । इसी सन्दर्भ में लगातार साधु को बार-बार काटने वाले बिच्छू और उसे बार-बार बचाने वाले साधु की कहानी अत्यन्त लोकप्रिय है, जिसमें साधु कहते हैं कि जब बिच्छू अपना स्वभाव नहीं छोड़ता तो मैं कैसे छोड़ दूँ ?

इसका कारण हर कोई ढूँढना चाहता है, जो आज आपने अपनी कहानी में स्पष्ट कर दिया ।

इस संसार में सबको मदद लेनी और देनी पड़ती है । दूसरे को तो हम नहीं बदल सकते , कम से कम स्वयम् को कृतघ्नता के भाव से बचा सकें इसके लिये, संकल्प बद्ध होना चाहिये ।

अगर आप यश प्राप्ति की चाह में किसी की मदद करते हैं तो सही मानिए आप सहज स्वभाववश उसकी मदद नहीं कर रहे हैं बल्कि एक डील कर रहे हैं कि मैं तेरी सहायता कर रहा हूँ बदले में तू मेरे लिए यश इकट्ठा कर ।
और भाई , डील में तो नफा होता है तो नुकसान भी होता है कभी कभी फिर रोना काहे का ।
याद रखिये , सहायता तभी सार्थक है जब वो सहज स्वभाववश की जाती है । यश की इच्छा से की गई सहायता एक व्यसन ही है ।

‘I LOVE IT’ एक दृष्टिकोण….

एक महिला जो 80 वर्ष से अधिक उम्र की थी, अच्छी तरह से कपड़े पहनने, मेकअप लगाने और सुंदर पैटर्न में अपने बालों को व्यवस्थित करने की दिशा में बहुत सुरुचि थी।

उनकी और उनके पति की शादी को लगभग 60 साल हो गए थे।

अपने प्यारे साथी के जाने के बाद, उसकी देखभाल करने के लिए कोई संतान और परिवार में कोई नहीं था।
उसने एक नर्सिंग होम में जाने का फैसला किया।

उस दिन भी, जब उसने अपने घर को अच्छे के लिए खाली किया, तो उसने सुंदर कपड़े पहने और बहुत खूबसूरत लग रही थी।

नर्सिंग होम पहुंचने के बाद, उसे अपने कमरे के तैयार होने के लिए लॉबी में धैर्यपूर्वक इंतजार करना पड़ा।

जब एक परिचारिका उसे कमरे में ले जाने के लिए आई, तो उसने महिला को उस छोटे से स्थान का वर्णन किया जहां उसे रहने के लिए इस्तेमाल करना था।

“मैं इसे प्यार करती हूँ,” महिला ने आठ साल की उम्र के बच्चे को उत्साह के साथ व्यक्त किया, जिसने अभी एक नया पिल्ला उपहारस्वरूप प्रस्तुत किया था।

“श्रीमती जोन्स, आपने अभी तक कमरा भी नहीं देखा है … बस प्रतीक्षा करें,” परिचारक ने टिप्पणी की।

“ठीक है, मेरी खुशी का कमरे से कोई लेना-देना नहीं है,” महिला ने जवाब दिया।

“मुझे कमरा पसंद है या नहीं, इस बात पर निर्भर नहीं करता है कि फर्नीचर की व्यवस्था कैसे की गई है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि मैं अपने दिमाग की व्यवस्था कैसे करती हूं, खुशी ऐसी चीज है जिसे आप समय से पहले तय कर सकते हैं। और मैंने पहले ही अपने कमरे को , मेरे आसपास के लोगों को, मेरे जीवन को प्यार करने के लिए फैसला किया हुआ है । यह एक निर्णय है जो मैं हर सुबह उठने पर लेती हूं। जब आप जागते हैं, तो आप जानते हैं कि हमारे पास सबसे बड़ी संपत्ति , यह चुनने की शक्ति है कि हम कैसा महसूस करते हैं। “

महिला ने बोलना जारी रखा, क्योंकि उपस्थित व्यक्ति ने उसके मुखाग्र बिंदु से बोली गई बातों को ध्यानपूर्वक सुना।

“मैं अपना पूरा दिन बिस्तर में उस दर्द के बारे में सोचकर बिता सकती हूं, इससे मैं अपने शरीर के उन हिस्सों पर ध्यान केंद्रित कर रही हूं, जो अब काम नहीं कर रहे हैं या दर्द दे रहे है या मैं बिस्तर से बाहर निकल सकती हूं और उन हिस्सों के लिए आभारी हो सकती हूं जो काम करते हैं। प्रत्येक काम एक उपहार है, और जब तक मेरी आँखें अभी भी खुली हुई हैं, मैं आज पर ध्यान देना जारी रखूंगी और उन सभी सुखद यादों को जो मैंने मेरे जीवन में अपने दिमाग में इस समय के लिए संजो कर रखी हैं । “

उपस्थित महिला बुजुर्ग महिला के सकारात्मक दृष्टिकोण से चकित थी, जिसका जीवन एक बाहरी दृष्टिकोण से, केवल समस्याओं और निराशा से भरा था।

वास्तव में,
समस्याएं एक और सभी को आती हैं।
संघर्ष करते समय आनंदित रहना हमारी पसंद है ।

घृणा बार-बार आती है।
जो हमें करना चाहिए वह प्यार है….

नकारात्मकता हमारे दरवाजे पर प्रतिदिन दस्तक देती है।
सकारात्मक दृष्टिकोण हमारा लक्ष्य होना चाहिए।

शिकायत अपने आप आती है।
कृतज्ञता एक विकल्प है जिसे हम सभी को अपनाना है।

यह कहना ‘I LOVE IT’ एक दृष्टिकोण है जो आपमें पहले से मौजूद जीने के तरीके को और बेहतर बनाता है।

मैं इतना गरीब क्यों हूँ……

एक आदमी ने गुरू नानक से पूछाः मैं इतना गरीब क्यों हूँ?

गुरू नानक ने कहा : तुम गरीब हो क्योंकि तुमने देना नहीं सीखा…

आदमी ने कहा : परन्तु मेरे पास तो देने के लिए कुछ भी नहीं है।

गुरू नानक ने कहा : तुम्हारा चेहरा, एक मुस्कान दे सकता है.. तुम्हारा मुँह, किसी की प्रशंसा कर सकता है या दूसरों को सुकून पहुंचाने के लिए दो मीठे बोल बोल सकता है…तुम्हारे हाथ, किसी ज़रूरतमंद की सहायता कर सकते हैं…और तुम कहते हो तुम्हारे पास देने के लिए कुछ भी नहीं…।।

आत्मा की गरीबी ही वास्तविक गरीबी है… पाने का हक उसी को है.. जो देना जानता है।


कार्तिक पूर्णिमा , देव दीपावली और गुरुनानक जयंती की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं….!!

चौंसठ योगिनी मंदिर, भेड़ाघाट

कल दोपहर बाद हमारा भेड़ाघाट देखने का कार्यक्रम बना । वहीं भेड़ाघाट व धुआंधार जलप्रपात के नजदीक एक ऊंची पहाड़ी के शिखर पर स्थापित “चौंसठ योगिनी मंदिर” दिखा और उसे देखने की इच्छा मन में जागी तो सीढियां चढ़कर पसीने से लथपथ जब ऊपर पहुंचे तो वहां शिखर से हरी भरी भूमि और बलखाती नर्मदा नदी के विहंगम दृश्य ने मन मोह लिया ।
चौंसठ योगिनी मंदिर” जबलपुर की ऐतिहासिक संपन्नता में एक और अध्याय जोड़ता है। प्रसिद्ध संगमरमर चट्टान के पास स्थित “चौंसठ योगिनी मंदिर” का निर्माण सन् 1000 के आसपास “कलीचुरी वंश” ने करवाया था। शिल्पकला तभी विकसित हो गई थी, जब मानव सभ्यता का विकास हुआ लेकिन कलचुरि काल की पाषाणकला दूसरी शिल्पकला से एकदम हटकर है। इस काल की मूर्तियां महज एक कलाकृति नहीं बल्कि मूर्तियों के पार्श्व में किसी घटना, गूढ़ रहस्य अथवा ब्रह्मांड के किसी दर्शन के संकेत मिलते हैं।
मंदिर में प्रवेश के लिए केवल एक तंग द्वार बनाया गया है। चारदीवारी के अंदर खुला प्रांगण है, जिसके बीचों-बीच एक चबूतरा बनाया गया है। चारदीवारी के साथ दक्षिणी भाग में मंदिर का निर्माण किया गया है।

मंदिर के चारों तरफ़ करीब ऊंची गोलाई में चारदीवारी बनाई गई है, जो पत्थरों की बनी है । गोलाकार आकृति में बने इस मन्दिर की बाहरी दीवालों पर चौसठ योगिनियों की अद्भुत प्रतिमाएँ बनी हुई है । यह देखकर दुख हुआ कि सभी प्रतिमाएँ खण्डित है । कहानी वही मुस्लिम आक्रमण कारियों द्वारा इन प्रतिमाओं को खंडित किये जाने की ।
ये सभी चौंसठ योगिनी बहनें थीं तथा तपस्विनियां थीं, जिन्हें महाराक्षसों ने मौत के घाट उतारा था। राक्षसों का संहार करने के लिए यहां स्वयं दुर्गा को आना पड़ा था। इसलिए यहां पर सर्वप्रथम मां दुर्गा की प्रतिमा कलचुरी के शासकों द्वारा स्थापित कर दुर्गा मंदिर बनाया गया था तथा उन सभी चौंसठ योगिनियों की मूर्तियों का निर्माण भी मंदिर प्रांगण की चारदीवारी पर किया गया। लोगों का मानना है कि यह स्थली महर्षि भृगु की जन्मस्थली है, जहां उनके प्रताप से प्रभावित होकर तत्कालीन कलचुरी साम्राज्य के शासकों ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था । कालांतर में मां दुर्गा की मूर्ति की जगह भगवान शिव व मां पार्वती की मूर्ति स्थापित की गई है, ऐसा जानकारी एकत्र करने में पाया ।
मंदिर के अंदर भगवान शिव व मां पार्वती की नंदी बैल पर वैवाहिक वेशभूषा में बैठे हुए पत्थर की मनमोहक प्रतिमा स्थापित है।
इसके आगे एक बड़ा-सा बरामदा है, जो खुला है। बरामदे के सामने चबूतरे पर शिवलिंग की स्थापना की गई है । यहां नियमित पूजा होती है । यह मूल प्रतिमा खण्डित नही है । मन्दिर के पुजारी के अनुसार यह विश्व में इस तरह की एकमात्र ऐसी प्रतिमा है । मैंने भी कभी इस तरह नन्दी पर विराजमान शिव पार्वती की प्रतिमा देखी या सुनी नहीं है । सामान्यतः शिव मंदिर में शिवलिंग ही प्रतिष्ठित होते है । प्रतिमा भी बड़ी आकर्षक है । मेरी तो नज़र ही नहीं हट रही थी उस प्रतिमा से । शिव-पार्वती के बगल में ही कार्तिकेय और गणेश की प्रतिमाएं विराजमान हैं, मतलब पूरा शिव परिवार ही विराजमान है यहाँ।

मंदिर को बाहर से जब आप देखते हैं तब मालूम होता है कि यह मंदिर एक विशाल परिसर में फैला हुआ है और इसके हर एक कोने से भव्यता झलकती है। फोटोग्राफी के लिए भी बहुत सुंदर जगह है । मैं इतनी बार भेड़ाघाट गई हूं पर कभी भी यह मंदिर नहीं क्यो नही देखा इसका अफसोस हुआ।
शाम हो चली थी हमे लौटना पड़ा पर मन नहीं भरा सो जल्द ही अगली बार आने का निर्णय भी ले लिया । अगर आप जबलपुर आ रहे हैं तो इस मंदिर में ज़रूर जाएं।

सम्पूर्ण व्यक्तित्व भगवान श्रीकृष्ण


जीवन की समग्रता और जीवन की परिपूर्णता ही कृष्ण हो जाना है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि केवल और केवल एकमात्र भगवान श्रीकृष्ण ऐसे देव अथवा व्यक्तित्व हैं जो चौसठ कलाओं से परिपूर्ण हैं। जीवन का चौसठ कलाओं से परिपूर्ण होने का अर्थ ही जीवन की परिपूर्णता है। जीवन में सभी गुणों की परिपूर्णता ही श्रीकृष्ण हो जाना भी है।
भगवान् श्रीकृष्ण के जीवन का सब कुछ एक आदर्श है। उन्होंने बचपन जिया तो ऐसा कि आज भी माँ अपने छोटे बच्चे को कान्हा कह कर बुलाती है, उन्होंने जवानी जी तो ऐसी कि आज भी प्रेम में पागल किसी लड़के को देख कर लोग कहते हैं कि बड़ा कन्हैया बना फिरता है, जिसने युद्ध रचाया तो ऐसा कि पाँडवों को अनंत अक्षौहिणी सेना के सामने जिता दिया और जिसने गीता का ज्ञान दिया जो आज भी उतनी ही प्रेरक है । ऐसा शायद ही कोई हुआ हो, जो कभी सारथी बना, कभी गुरु बना, कभी प्रेमी बना तो कभी दोस्त बना और न सिर्फ बना, बल्कि हर भूमिका को बखूबी निभाया ।
एक तरफ युद्ध में परिपूर्ण हैं तो दूसरी तरफ शांति में परिपूर्ण हैं। एक तरफ शस्त्र में परिपूर्ण हैं तो दूसरी तरफ शास्त्र में परिपूर्ण हैं।परिपूर्ण वक्ता हैं तो परिपूर्ण श्रोता भी हैं। परिपूर्ण नृत्यकार हैं तो परिपूर्ण गीतकार भी हैं। परिपूर्ण भगवान हैं तो परिपूर्ण भक्त भी हैं।
जिस प्रकार से संसार की सभी नदियाँ गिरकर सागर में मिल जाती हैं उसी प्रकार मनुष्य के समस्त गुणों का मिलकर परिपूर्ण मात्रा में एक जीवन में अथवा एक चरित्र विशेष में आ जाना ही श्रीकृष्ण बन जाना है। इसलिए श्रीकृष्ण ने जब भी किया और जो भी किया सदा परिपूर्ण ही किया है।प्रत्येक कार्य की स्वीकारोक्ति और उसके साथ साथ कार्य कुशलता और कार्य निपुणता वर्तमान समय में योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की सबसे प्रधान शिक्षा है।
कृष्ण अकेले ही इस समग्र जीवन को पूरा ही स्वीकार कर लेते हैं। जीवन की समग्रता की स्वीकृति उनके व्यक्तित्व में फलित हुई है। इसलिए इस देश ने और सभी अवतारों को आंशिक अवतार कहा है, लेकिन कृष्ण को पूर्ण अवतार कहा है। कृष्ण पूरे ही परमात्मा हैं। और यह कहने का, यह सोचने का, ऐसा समझने का कारण है और वह कारण यह है कि कृष्ण ने सभी कुछ आत्मसात कर लिया ।
आप सभी को लीला पुरूषोत्तम योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के मंगलमय जन्म महोत्सव “जन्माष्टमी” की बहुत-बहुत शुभकामनाएं एवं मंगल बधाइयां…!🙏🌷🌷

जीवन एक यात्रा….


हमारा जीवन एक निरन्तर चलने वाली यात्रा है । यहाँ हर किसी को अलग अलग परिस्थितियों में जीवन यात्रा करनी होती है।
इस यात्रा में यह ज़रूरी नहीं होता कि यात्रा में आने वाला हर इंसान आपका हमेशा के लिए सहयात्री बने । इस यात्रा के हर कदम पर एक नया मोड़, नया पात्र, एक नया अनुभव आपका इंतज़ार कर रहा होता है। हमें इस संपूर्ण यात्रा में अपना कर्म करना होता है।
प्रकृति के नियम के अनुसार यहाँ छोटी से छोटी घटना भी किसी कारण से होती है बगैर कारण के कुछ घटित नहीं होता ।
जैसे किताब में आने वाली घटनाओं पर लेखक के सिवा किसी का बस नहीं उसी तरह हमारे जीवन की यात्रा में आने वाली घटनाओं पर हमारा बस नहीं होता । अगर किसी चीज़ पर हमारा बस है तो वो है हमारे अनुभव , जो ज़िन्दगी ने हमें देती हुई चलती है और कुछ सबक जो हम सीखते हुए चलते हैं । हमारे इस जीवन की शुरुआत में आने वाले सहयात्री अंत तक हमारा साथ नहीं देते। कुछ हमें बीच में ही छोड़कर चले जाते हैं कुछ को हम ही पीछे छोड़ आते हैं, कुछ हमें याद आते हैं, कुछ को हम भूल जाते हैं । इस यात्रा के सफर में कहीं खुशियाँ तो कहीं पर ग़म मिलते हैं लेकिन यही इस यात्रा का आनन्द है । जीवन यात्रा में हर तरह के मौसम हमें विभिन्न प्रकार के अनुभव देते हैं ।

हमें निरन्तर चलते रहना जरूरी है ।अगर हम रुक कर एक जगह बैठ जाएंगे तो अगले पड़ाव पर मिलने वाले अनुभवों और आश्चर्यों से वंचित रह जाएंगे । जब मनुष्य सिर्फ एक जगह स्थिर होकर सोचना शुरू कर देता है तो उसकी सोच का दायरा और व्यवहार सीमित हो जाता है। सोच का दायरा सीमित होने की वजह से उसके सामाजिक चरित्र और व्यवहार में भी ठहराव आना शुरू होता है। अंततः वह स्वयं सीमित हो जाता है ।

जीवन चलने का नाम , चलते रहो सुबह- शाम …….. यह फिल्मी गीत जीवन की गति की ओर इशारा करता है। जीवन में उतार- चढ़ाव तो आते रहते हैं पर हम जो भी दिशा चुनते हैं उस पर चलने का अर्थ हो – अपनी शक्तियों का सदुपयोग करना। उन्नति के लिए निरन्तर कर्म करते करना, विकास की ओर उन्मुख होना और सुव्यवस्थित जीवन बिताना ।
इस यात्रा में मिलने वाले हर किरदार और घटना की भी अपनी अहमियत है,ना कोई किसी से ज़्यादा ज़रूरी है और ना कोई किसी से कम । हर सहयात्री का अपना किरदार और समय होता है । हमारी जीवन यात्रा में वह अपनी भूमिका निभाता है और भूमिका खत्म होने के बाद उसे हमारी यात्रा से जाना होता है। ना हम उसके आने का वक़्त तय करते हैं और ना जाने का । जीवन में उसकी आवश्यकता ही उसका निर्धारण करती है। ज़रूरी ये नहीं कि कब तक और किसके साथ आपकी यात्रा जारी रही । पर ज़रूरी ये है कि आपने इस यात्रा में अपने किरदार को पूर्णतः जिया या नहीं। इस यात्रा में कितने ही सफर हमें सिर्फ अकेले ही तय करने होते हैं। नई राहें अपनानी होती हैं । उन राहों पर हमें हमारी सकारात्मक सोच से आगे बढ़ने की शक्ति मिलती है । इस यात्रा में जब तक आप चल रहे हैं तब तक आप खुलकर इस यात्रा का आनंद भी उठाते चलें वरना समय का क्या भरोसा और हमारी जीवन यात्रा कहाँ जाकर रुक जाए।
कभी कभी तो मुझे यह महसूस होता है कि जीवन यात्रा के सफर में आए मुकामों को तय कैसे किया जाए इसका ज्ञान जब होता है तब तक यह सफर समाप्ति की ओर आ गया होता है । आपकी पद प्रतिष्ठा के कारण आपको जीवन में बहुत सारे लोग सम्मान और आदर देंगे परन्तु हमारे इस जीवन की यात्रा समाप्त होने के बाद हमारे कर्म ही याद रखें जाएंगे । हम समय के साथ विलीन हो जाएंगे लेकिन जो भूमिका हमने निभाई और उसके कारण मिलने वाला सम्मान और आदर ही हमारे जीवन की शाश्वतता का प्रमाण है ।

पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार किसी एक की जीवन यात्रा सिर्फ वर्तमान एक जन्म की नहीं अपितु कितने ही बीते हुए जन्मों और आने वाले जन्मों की यात्रा होती है। हमारी यात्रा अनन्त है ।

आपके जीवन की इस यात्रा पर आप सकारात्मक सोच के साथ उन्नति के लिए निरन्तर कर्म करते रहें , विकास की ओर उन्मुख रहकर अपना जीवन सुव्यवस्थित बिताएं , ऐसी मेरी शुभकामनाएं है…….।

ऋतु नायक

रामायण सीरियल का पुनः प्रसारण…

हरि अनन्त, हरि कथा अनन्ता।

कहहिं, सुनहिं, बहुबिधि सब संता।।

दूरदर्शन द्वारा 33 वर्षों बाद लॉकडाउन अवधि में रामायण सीरियल का पुनः प्रसारण किया गया । लॉकडाउन के 40 दिन कैसे निकल गए पता ही नही चला। पूरी दिनचर्या प्रसारण समय के अनुसार सेट हो गई । उत्तर रामायण के सभी एपिसोड रिपीट किए गए वो सभी रिपीट एपीसोड भी उतनी ही शिद्दत के साथ देखे और हमेशा ऐसा लगता रहा कि इसका प्रसारण अनवरत चलता रहे । सीरियल खत्म होने पर मन बहुत भावविभोर हो रहा है ।
रामायण को तब और अब देखने में बहुत बड़ा फर्क लगा वो यूँ कि तब मैं कॉलेज में पढ़ रही थी और संस्कृति की इतनी समझ भी न थी । अभी भी सब वही है पर उम्र के साथ देखकर समझने , आत्मसात करने की क्षमता बढ़ गई है । कुछ प्रसंग और पात्र जैसे पुष्प वाटिका में सीता जी का राम को देखने जाना, रामविवाह, केवट प्रसंग, निषादराज, भरत मिलाप, पुष्पक विमान में सीता हरण के वक्त जटायु द्वारा बचाने का प्रयास , लक्ष्मण और हनुमान जी की भक्ति, वाल्मीकि आश्रम में सीता जी का रहना,लव कुश तो मानस पटल पर सदा के लिए अंकित हो गए ।इसके साथ ही मेघनाद, कुम्भकर्ण के पात्रों ने भी छाप छोड़ी।
आज लव कुश द्वारा भगवान श्रीराम जी के समक्ष एक गीत के माध्यम से रामायण का कुछ भाग और अपना परिचय देने का जो सजीव चित्र रखा गया उसने आंखे सजल कर दी …. !! इस अत्यन्त भावुक कर देने वाले दृश्य के साथ ही धारावाहिक “रामायण” का अन्त हुआ लेकिन अपने पीछे छोड़ गया
एक ‘पाठ’ ……
पाठ हमारी संस्कृति का ,
धर्म का ,मर्यादा का ,
परम्परा का ,मान सम्मान का , आचरण का …..!!
हमारी सम्पूर्ण शिक्षा का सार हमारे रामायण महाकाव्य में है । रामानंद सागर जी ने टीवी सीरियल के जरिए जिस प्रकार जन जन तक इसे पहुंचाने का काम किया वह बेहद सराहनीय है । सागर जी ने हर एक पात्र को सांचे में ढालकर बहुत ही गज़ब प्रस्तुति दी है ।रामायण का ऐसा सुंदर फिल्मीकरण दोबारा कभी नहीं हो सकता। आज बेहतर तकनीक है और भी कई चीजें बेहतर है 1987 की तुलना में सब कुछ बेहतर है लेकिन आज आपको न तो पात्रों के चयन के लिए अरुण गोविल मिलेंगे, न दीपिका चिखलिया मिलेंगी… न दारा सिंह और न अरविन्द त्रिवेदी… न सुनील लाहिरी और न विजय अरोड़ा… न ललिता पवार और न ही रवीन्द्र जैन मिलेंगे… और भी जाने क्या-क्या रामायण के इस रूप के साथ सम्पूर्ण है… इसे बेहतर करने की कोशिश इसे खराब करना ही होगी…।
आज रामायण सीरियल तो खत्म हुआ पर लॉक डाउन के इस समय में रामायण का आना और नई पीढ़ी द्वारा भी इस रामायण को देखना, इससे हमारी नई पीढ़ी भी बहुत लाभान्वित हुई । साथ ही यह सीरियल नयी युवा पीढ़ी के लिए यह एक जिम्मेदारी भी छोड़ गया है , जिम्मेदारी……..
अपनी संस्कृति को इसी प्रकार बनाए रखने की …
धर्म, परम्परा ,मान मर्यादा , प्रतिष्ठा को समझने की …
उसी के अनुकूल अपना आचरण करने की …..
आने वाली पीढ़ियों को सनातन संस्कृति के इस मार्ग पर चलने की …..।
जैसे घर को साफ रखने के लिये नित्य ही झाडू-पोछा करना पडता है अन्यथा कुछ ही दिनों में घर धूल-धक्कड से भर जाता है वैसे ही मानव मस्तिष्क को सदैव परिष्कृत करते रखने की आवश्यकता होती है जिसके लिये अच्छा देखना,सुनना और पढना बहुत आवश्यक होता है । रामायण देखकर एक बार फिर उच्च आदर्शों के साथ जीवन जीने की प्रेरणा मिली ।
धन्यवाद दूरदर्शन को जिसने इस विपदा के समय सभी भारतीयों को साक्षात श्री राम के सम्पूर्ण जीवन का दर्शन कराया । उम्मीद है समय-समय पर यूँ ही पुनः प्रसारण होता रहेगा ताकि हमें अपने जीवन में इसका सदैव स्मरण रहे ।
धन्यवाद पूरी रामायण की टीम को जिनके द्वारा प्रभु राम , माता सीता एवं अन्य का साक्षात रुप धारण कर आलौकिक दर्शन कराया ।
धन्यवाद श्री अरुण गोविल जी को भी, जिन्होंने अपने पेज पर रामायण के हर एपिसोड के प्रसारण के बाद उस एपिसोड की 5 मिनिट की विवेचना में उस एपिसोड का सार और उसमे निहित अर्थ बताए । जिससे सीरियल देखने में और रोचकता बढ़ी और समझने में सरलता आई।
रामायण भारतीय संस्कृति का सबसे मजबूत और प्रामाणिक दस्तावेज है। इस दस्तावेज़ को रामानंद सागर जी द्वारा धाराविक रूप में चित्रण करना वाकई प्रेरणादायक है और इसकी सजीव छाया हमारे मन में हमेशा जिंदा रहेगी ।
03.05.2020 ऋतु नायक