शिक्षक…..


सुन्दर सुर सजाने को साज बनाता हूँ,
नौसिखिये परिंदों को बाज बनाता हूँ!
चुपचाप सुनता हूँ शिकायतें सबकी,
तब दुनिया बदलने की आवाज बनाता हूँ!
समंदर तो परखता है हौंसले कश्तियों के,
मैं डूबती कश्तियों को जहाज बनाता हूँ !
बनाए चाहे चांद पे कोई बुर्ज ए खलीफा,
अरे मैं तो कच्ची ईंटों से ही ताज बनाता हूँ!

हम सभी को शिक्षक कई रूप में मिलते हैं, कई प्रारूप में मिलते हैं। उनके पढ़ाने से हम शून्य से मूल्य में परिवर्तित होते हैं। वे अपनी अमुल्य शिक्षा हममें गढ़ते हैं…यूँ ही नहीं हम उन्हें पूज्य कहते हैं। माता-पिता प्रारम्भिक शिक्षक होते हैं तो विद्यालय आते ही प्राथमिक शिक्षक मिलते हैं। यद्यपि, हर शिक्षक का पढ़ाने का तरीक़ा अलग अलग होता है परंतु उनके शिक्षण को हम जीवन के अलग-अलग अनुभवों में घुला हुआ पाते हैं….भिन्न परिस्थितियों के प्रश्न में खड़ा पाते हैं और हर दशा में उत्तर पाने की दिशा में प्रेरित करते पाते हैं । एक शिक्षक का महत्व जन्मदाता के सामान होता है क्यूंकि वह व्यक्ति को जीवन जीने का ज्ञान प्रदान करता है । जैसे कुछ ने हमें साहित्य का वर्ण सिखाया तो कुछ ने हमें विज्ञान की दुनिया की सैर कराई। कुछ ने गणित का मान बताया, कुछ ने हमें भूगोल, इतिहास से सजाया । स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक के अलावा ऐसे कई लोग हमारे आस पास होते हैं जिनसे हम व्यावहारिक ज्ञान की सीख लेते हैं। आज अवसर है हर छोटी या बड़ी शिक्षा देने वाले गुरुजनों को अभिवादन करने का और उनसे मिली हर उस सीख को प्रणाम करने का जिनसे जीवन का आधार बना।
मेरे अन्दर जिज्ञासा का बीज बोने और मेरी कल्पना को प्रज्ज्वलित करने के लिए ताकि मैं जीवन में आगे बढ़ सकूँ और सफलता प्राप्त कर सकूँ मैं आपकी तहे दिल से आभारी हूँ ।
गुरु अनंत तक जानिए, गुरु की ओर न छोर,
गुरु प्रकाश का पुंज है, निशा बाद का भोर।

शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं🙏🌷

सम्पूर्ण व्यक्तित्व भगवान श्रीकृष्ण


जीवन की समग्रता और जीवन की परिपूर्णता ही कृष्ण हो जाना है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि केवल और केवल एकमात्र भगवान श्रीकृष्ण ऐसे देव अथवा व्यक्तित्व हैं जो चौसठ कलाओं से परिपूर्ण हैं। जीवन का चौसठ कलाओं से परिपूर्ण होने का अर्थ ही जीवन की परिपूर्णता है। जीवन में सभी गुणों की परिपूर्णता ही श्रीकृष्ण हो जाना भी है।
भगवान् श्रीकृष्ण के जीवन का सब कुछ एक आदर्श है। उन्होंने बचपन जिया तो ऐसा कि आज भी माँ अपने छोटे बच्चे को कान्हा कह कर बुलाती है, उन्होंने जवानी जी तो ऐसी कि आज भी प्रेम में पागल किसी लड़के को देख कर लोग कहते हैं कि बड़ा कन्हैया बना फिरता है, जिसने युद्ध रचाया तो ऐसा कि पाँडवों को अनंत अक्षौहिणी सेना के सामने जिता दिया और जिसने गीता का ज्ञान दिया जो आज भी उतनी ही प्रेरक है । ऐसा शायद ही कोई हुआ हो, जो कभी सारथी बना, कभी गुरु बना, कभी प्रेमी बना तो कभी दोस्त बना और न सिर्फ बना, बल्कि हर भूमिका को बखूबी निभाया ।
एक तरफ युद्ध में परिपूर्ण हैं तो दूसरी तरफ शांति में परिपूर्ण हैं। एक तरफ शस्त्र में परिपूर्ण हैं तो दूसरी तरफ शास्त्र में परिपूर्ण हैं।परिपूर्ण वक्ता हैं तो परिपूर्ण श्रोता भी हैं। परिपूर्ण नृत्यकार हैं तो परिपूर्ण गीतकार भी हैं। परिपूर्ण भगवान हैं तो परिपूर्ण भक्त भी हैं।
जिस प्रकार से संसार की सभी नदियाँ गिरकर सागर में मिल जाती हैं उसी प्रकार मनुष्य के समस्त गुणों का मिलकर परिपूर्ण मात्रा में एक जीवन में अथवा एक चरित्र विशेष में आ जाना ही श्रीकृष्ण बन जाना है। इसलिए श्रीकृष्ण ने जब भी किया और जो भी किया सदा परिपूर्ण ही किया है।प्रत्येक कार्य की स्वीकारोक्ति और उसके साथ साथ कार्य कुशलता और कार्य निपुणता वर्तमान समय में योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की सबसे प्रधान शिक्षा है।
कृष्ण अकेले ही इस समग्र जीवन को पूरा ही स्वीकार कर लेते हैं। जीवन की समग्रता की स्वीकृति उनके व्यक्तित्व में फलित हुई है। इसलिए इस देश ने और सभी अवतारों को आंशिक अवतार कहा है, लेकिन कृष्ण को पूर्ण अवतार कहा है। कृष्ण पूरे ही परमात्मा हैं। और यह कहने का, यह सोचने का, ऐसा समझने का कारण है और वह कारण यह है कि कृष्ण ने सभी कुछ आत्मसात कर लिया ।
आप सभी को लीला पुरूषोत्तम योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के मंगलमय जन्म महोत्सव “जन्माष्टमी” की बहुत-बहुत शुभकामनाएं एवं मंगल बधाइयां…!🙏🌷🌷

जीवन एक यात्रा….


हमारा जीवन एक निरन्तर चलने वाली यात्रा है । यहाँ हर किसी को अलग अलग परिस्थितियों में जीवन यात्रा करनी होती है।
इस यात्रा में यह ज़रूरी नहीं होता कि यात्रा में आने वाला हर इंसान आपका हमेशा के लिए सहयात्री बने । इस यात्रा के हर कदम पर एक नया मोड़, नया पात्र, एक नया अनुभव आपका इंतज़ार कर रहा होता है। हमें इस संपूर्ण यात्रा में अपना कर्म करना होता है।
प्रकृति के नियम के अनुसार यहाँ छोटी से छोटी घटना भी किसी कारण से होती है बगैर कारण के कुछ घटित नहीं होता ।
जैसे किताब में आने वाली घटनाओं पर लेखक के सिवा किसी का बस नहीं उसी तरह हमारे जीवन की यात्रा में आने वाली घटनाओं पर हमारा बस नहीं होता । अगर किसी चीज़ पर हमारा बस है तो वो है हमारे अनुभव , जो ज़िन्दगी ने हमें देती हुई चलती है और कुछ सबक जो हम सीखते हुए चलते हैं । हमारे इस जीवन की शुरुआत में आने वाले सहयात्री अंत तक हमारा साथ नहीं देते। कुछ हमें बीच में ही छोड़कर चले जाते हैं कुछ को हम ही पीछे छोड़ आते हैं, कुछ हमें याद आते हैं, कुछ को हम भूल जाते हैं । इस यात्रा के सफर में कहीं खुशियाँ तो कहीं पर ग़म मिलते हैं लेकिन यही इस यात्रा का आनन्द है । जीवन यात्रा में हर तरह के मौसम हमें विभिन्न प्रकार के अनुभव देते हैं ।

हमें निरन्तर चलते रहना जरूरी है ।अगर हम रुक कर एक जगह बैठ जाएंगे तो अगले पड़ाव पर मिलने वाले अनुभवों और आश्चर्यों से वंचित रह जाएंगे । जब मनुष्य सिर्फ एक जगह स्थिर होकर सोचना शुरू कर देता है तो उसकी सोच का दायरा और व्यवहार सीमित हो जाता है। सोच का दायरा सीमित होने की वजह से उसके सामाजिक चरित्र और व्यवहार में भी ठहराव आना शुरू होता है। अंततः वह स्वयं सीमित हो जाता है ।

जीवन चलने का नाम , चलते रहो सुबह- शाम …….. यह फिल्मी गीत जीवन की गति की ओर इशारा करता है। जीवन में उतार- चढ़ाव तो आते रहते हैं पर हम जो भी दिशा चुनते हैं उस पर चलने का अर्थ हो – अपनी शक्तियों का सदुपयोग करना। उन्नति के लिए निरन्तर कर्म करते करना, विकास की ओर उन्मुख होना और सुव्यवस्थित जीवन बिताना ।
इस यात्रा में मिलने वाले हर किरदार और घटना की भी अपनी अहमियत है,ना कोई किसी से ज़्यादा ज़रूरी है और ना कोई किसी से कम । हर सहयात्री का अपना किरदार और समय होता है । हमारी जीवन यात्रा में वह अपनी भूमिका निभाता है और भूमिका खत्म होने के बाद उसे हमारी यात्रा से जाना होता है। ना हम उसके आने का वक़्त तय करते हैं और ना जाने का । जीवन में उसकी आवश्यकता ही उसका निर्धारण करती है। ज़रूरी ये नहीं कि कब तक और किसके साथ आपकी यात्रा जारी रही । पर ज़रूरी ये है कि आपने इस यात्रा में अपने किरदार को पूर्णतः जिया या नहीं। इस यात्रा में कितने ही सफर हमें सिर्फ अकेले ही तय करने होते हैं। नई राहें अपनानी होती हैं । उन राहों पर हमें हमारी सकारात्मक सोच से आगे बढ़ने की शक्ति मिलती है । इस यात्रा में जब तक आप चल रहे हैं तब तक आप खुलकर इस यात्रा का आनंद भी उठाते चलें वरना समय का क्या भरोसा और हमारी जीवन यात्रा कहाँ जाकर रुक जाए।
कभी कभी तो मुझे यह महसूस होता है कि जीवन यात्रा के सफर में आए मुकामों को तय कैसे किया जाए इसका ज्ञान जब होता है तब तक यह सफर समाप्ति की ओर आ गया होता है । आपकी पद प्रतिष्ठा के कारण आपको जीवन में बहुत सारे लोग सम्मान और आदर देंगे परन्तु हमारे इस जीवन की यात्रा समाप्त होने के बाद हमारे कर्म ही याद रखें जाएंगे । हम समय के साथ विलीन हो जाएंगे लेकिन जो भूमिका हमने निभाई और उसके कारण मिलने वाला सम्मान और आदर ही हमारे जीवन की शाश्वतता का प्रमाण है ।

पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार किसी एक की जीवन यात्रा सिर्फ वर्तमान एक जन्म की नहीं अपितु कितने ही बीते हुए जन्मों और आने वाले जन्मों की यात्रा होती है। हमारी यात्रा अनन्त है ।

आपके जीवन की इस यात्रा पर आप सकारात्मक सोच के साथ उन्नति के लिए निरन्तर कर्म करते रहें , विकास की ओर उन्मुख रहकर अपना जीवन सुव्यवस्थित बिताएं , ऐसी मेरी शुभकामनाएं है…….।

ऋतु नायक

रविन्द्र नाथ टैगोर…

जन्मदिवस विशेष…..

रवीन्द्रनाथ टैगोर विलक्षण प्रतिभा के व्यक्ति थे। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे एक साथ महान साहित्यकार, समाज सुधारक, अध्यापक, कलाकार एवं संस्थाओं के निर्माता थे । ऐसे महान शिक्षक, कहानीकार, चित्रकार, नाटककार, गायक,कवि और दार्शनिक गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर को उनके जन्मदिवस पर सादर प्रणाम!


रवींद्रनाथ टैगोर ने बहुत सी कविताएं , नाटक और कहानियां लिखी हैं उनमें से पोस्टमास्टर, स्वामी का पता ,अपरिचिता, भिखारिन और काबुलीवाला कहानियां आज भी हृदय पटल पर अंकित है।इन्हें आज भी पढ़कर आँखे नम हो जाती हैं । मैने इनको जितना पढा उसमें यह पाया है कि इनकी रचनाओं एवं जीवन दर्शन में मानव करूणा, गरीबी का महत्वपूर्ण स्थान है।उनकी नोबेल पुरस्कार प्राप्त काव्य रचना “गीतांजलि” ईश्वर के प्रति निष्ठा, प्रकृति प्रेम और मानवता वादी मूल्यों पर आधारित है ।

मेरी रक्षा करो विपत्ति में, मेरी यह प्रार्थना नहीं है ।
मुझे नही हो भय विपत्ति में, मेरी चाह यही है ।।
….गीतांजलि से बहुत सुंदर लाइनें ।


हालांकि कोई भी रचना अपने मूल स्वरूप में ही उत्कृष्ट होती है । इसे बांग्ल भाषा में लिखा गया परन्तु मैने इसे हिंदी अनुवाद स्वरूप में ही पढा है । इस उत्कृष्ट रचना को पढ़कर मन आध्यात्मिक हो जाता है । इसके अलावा रवींद्रनाथ टैगोर जी के द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन के समय सुउद्देश्यपूर्ण लिखित अंग्रेज़ी कविता जिसमे स्वाधीनता की सार्थकता बताते हुए नए भारत की तस्वीर रखी गई थी, वह आज के परिपेक्ष्य में भी अपना स्थान रखती है ।


Where the mind is without fear.

and the head is held high,

where knowledge is free.

Where the world has not been broken up

into fragments by narrow domestic walls.


Where words come out from the depth of truth


Where tireless striving stretches its arms towards perfection


Where the clear stream of reason has not lost its way


Into the dreary desert sand of dead habit


Where the mind is led forward by thee


Into ever-widening thought and action


Into that heaven of freedom, my Father, let my country awake.


कवि और लेखकों का यह कर्तव्य और उत्तरदायित्व होता है कि वो जनमानस को उत्थान की ओर उन्मुख करें ।टैगोर जी का जीवन भी इसी दिशा में समर्पित था ।
आज उनके जन्मदिवस के अवसर पर सादर नमन और श्रद्धान्जलि अर्पित करती हूं

07.05.2020

ख्याल….

ये ख्याल भी दबे पांव अपनी रफ्तार से ऐसे आते हैं कि…

अक्सर, ये मेरा जहन, भी थक जाता है पर , रफ़्तार ख़यालों की कभी नहीं थमती !!

ये ख्याल भी इतने अजीब होते हैं कि कभी भी कहीं से भी आ जाते हैं और कौन सा ख्याल कब और कहाँ से आयेगा ये तो उन्हें भी पता नहीं होता…!!

कुछ कह लें हम .. या कुछ .. सुन ही लें,
कह दो, जो रह गया .. कुछ कहा या अनकहा सा !!

वैसे एक बात जो हर किसी में समान है, वो ये कि, उनके सबसे बेहतरीन ख्याल उन्हें तब आते हैं जब उन्हे शब्दों में पिरोना उस वक्त उनके लिए संभव ना हो| और जब तक आप कागज और कलम का साथ पाते हैं तब तक ये ख्याल आपका साथ छोड़ के कहीं दूर जा चुके होते हैं… और वो शब्द जो आपने अपने दिमाग में करीने से सजा कर रखे थे वो आपके विचारों के पिंजरे से आजाद हो अपनी ऊँची उड़ान भर चुके होते हैं| अब बचे हुए आधे अधूरे ख्यालों को उन दूर जा चुके शब्दों में वापस पिरोना उतना ही जटिल हो जाता है जितना इंसान के लिए अपनी गलती तलाशना और फिर उसे सुधारना…!!

जब आप उन ख्यालों को शब्द देते हैं जिनको आपने महसूस किया होता है तब आप एक अनुभव को अपनी अभिव्यक्ति का रूप देते हैं.! जब हम अपने ख्यालों के एहसास को लपेट कर कागज़ी लिबास में सजाकर पल-पल परिवर्तित होते भावों को शब्दों की गति में बाँधकर पिरोते हैं तो यह करना आसान नहीं होता है पर अद्भुत एहसास ज़रूर होता है..!!

अपने ख्यालों को कागज पर उतारने का ख्याल तो अक्सर आता ही रहता है और अगर गलती से आपने अपनी पूरी कोशिश के बाद कुछ शब्द कागज पर लिखे भी तो वो वैसे नहीं दिखते ज़िसकी आपने कल्पना की थी …. !

इसके बावजूद आपको लिखना बंद नहीं करना है ……क्योंकि अगर वैसा नहीं लिख पाए जैसा लिखना चाहते थे … तो उससे कुछ बेहतरीन ही लिखने का प्रयास किया जाए…..!! यही प्रयास में आरम्भ कर रही हूँ…. ।